सरिता विशेष

वर्ष 2008 में बैंकों की बेवकूफी के कारण अमेरिका को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा था, अब वह उस से धीरेधीरे उबरने लगा है. अमेरिका का अपना उत्पादन बढ़ने लगा है. आयात पर हलकी सी रोक लगी है. तेल का आयात बंद सा होने लगा है क्योंकि वह भूमिगत गैस का इस्तेमाल ज्यादा करने लगा है. वहां सरकार ने अर्थव्यवस्था को डगमगाने से रोकने के लिए दिए जाने वाले डौलर कम कर दिए हैं जिस से डौलर मजबूत होने लगा और दूसरे देशों की मुद्राओं की हालत पतली होने लगी.

अमेरिका की खासीयत यही है कि वहां की जनता चाहे जितना आपस में तूतू मैंमैं करती नजर आए, अपने काम और लक्ष्य को नहीं भूलती. अमेरिकियों की हिम्मत कभी कमजोर नहीं पड़ती. वे हर कठिन स्थिति स?े उबरने का हल ढूंढ़ लेते हैं.

पिछले 50 सालों से अमेरिका यदि दुनिया का चुंबक बना हुआ है तो इसीलिए कि उस का खुलापन, उस की साफगोई, उस की स्वतंत्रताएं और वहां के निवासियों की कर्मठता का कोई मुकाबला नहीं. अमेरिका ने सिद्ध कर दिया कि हजार खामियों के बावजूद उस की स्वतंत्रताएं ही उस का असली बल हैं और 2008 के संकट के बाद बजाय दूसरों के आगे भीख का कटोरा ले कर खड़ा होने के, उस ने अपने आप को खुद संकट से निकाल लिया.

दुनिया के बाकी देश आमतौर पर बाहरी मदद से, जिस में अमेरिका से ही ज्यादा मदद होती थी, ऐसे संकटों से निकल पाए हैं. जब दुनिया के दूसरे देश हायहाय करते अमेरिका की ओर भागते हैं तो अमेरिका ने अपने संकटों के बारे में एकएक करके सोचा, कुछ बलिदान किया, कुछ मेहनत की, कुछ कठोर कदम उठाए और आज वह न मुसलिम आतंकवाद से डरा हुआ है, न तेल उत्पादकों से.

यह वह अमेरिका है जिस ने एक अश्वेत को 1 बार नहीं 2 बार राष्ट्रपति चुना. यह अमेरिका ही है जो हर देश, हर धर्म, हर जाति और हर रंग के लोगों का तहेदिल से स्वागत करता है. अगर भारत को अमेरिका का मुकाबला करना है तो क्या हम में ऐसा कुछ करने का माद्दा है? हम तो आज भी हजारों साल की दुश्मनी पर देश को चलाने की कोशिश कर रहे हैं.