सरिता विशेष

नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी का मुख्यतम नेता मान लेने में ही जिन्हें भलाई दिख रही है उन्होंने जिस तरह का हंगामा खड़ा किया वह आने वाले दिनों का संकेत दे रहा है. नरेंद्र मोदी का बुलडोजर भारतीय जनता पार्टी के रहेसहे देश के प्रति चिंता करने वाले नेताओं को रौंद कर धार्मिक संकीर्णता की कंटीली झाडि़यों के लिए जगह खाली करने को चल पड़ा है.

वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भांप लिया कि नरेंद्र मोदी फैक्टर न भारतीय जनता पार्टी के लिए हितकारी है न देश के लिए और न ही उन के बचेखुचे दिनों के लिए. नरेंद्र मोदी को इस समय भारतीय जनता पार्टी के लिए पार्टी सौंपना अनिवार्य है क्योंकि 2014 के चुनाव के लिए जो पैसा चाहिए वह सिवा गुजरात के और कहीं से नहीं मिल सकता और धर्मभीरु गुजराती सेठ नरेंद्र मोदी जैसे कट्टरवादी को पूरा समर्थन देने को तैयार हैं, खासतौर पर तब जब वे नियमकानून को ताक पर रखने की हिम्मत रखते हों.

भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली की बागडोर उन हाथों में है जो आजमाए हुए हैं पर असफल हैं. राजनाथ सिंह बेमुरव्वती से अध्यक्ष पद से हटाए जा चुके हैं और उन के राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा साफ हो चुकी है. अरुण जेटली सफल वक्ता व वकील हैं पर चुनाव नहीं लड़ सकते. सुषमा स्वराज अपने गृहराज्य हरियाणा से कोसों दूर हैं. कर्नाटक के अनंत कुमार या आंध्र प्रदेश के वेंकैया नायडू अपने राज्यों में पार्टी को 2-4 सीटें भी नहीं जिता सकते.

इन नेताओं के पास नरेंद्र मोदी के अलावा कोई चारा नहीं, चाहे उन की पैठ गुजरात के बाहर केवल उच्च वर्गों के कट्टर हिंदूपंथियों तक ही क्यों न हो. इस वर्ग का पार्टी और उस के  आका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पूरा कब्जा है और ये इस मौके को खोना नहीं चाहते कि कहीं नरेंद्र मोदी की कलई बिहार के लालू यादव की तरह न खुल जाए. नरेंद्र मोदी को हड़बड़ी में पार्टी की कमान सौंपना जरूरी है क्योंकि बाकी सभी नेता अपने कमजोर हाथों को जानतेपहचानते हैं.

लालकृष्ण आडवाणी ने 3 दिन तक मंथरानुमा नाटक किया पर इस पर जीत न मिली. नरेंद्र मोदी पार्टी की चमक बने रहे पर उन का कद थोड़ा घट जरूर गया. वे अब मुखर, रोबीले और दंभी तरीके से व्यवहार करने से कतराएंगे. यह भी स्पष्ट हो गया है कि पार्टी लालकृष्ण आडवाणी जैसों के बगैर एक नहीं रहेगी और उस का 2014 के चुनाव जीतने का सपना फिलहाल खयालीपुलाव से ज्यादा नहीं है.