देश की सरकार चाहे कितना कहे कि कानूनों का आदर हो और अदालतें कितना ही कानून के सम्मान की बात करें, असल में देश में कानून केवल अफसरों, नेताओं, अमीरों और पहुंच वालों का गुलाम है. कानून तोड़ कर अपराधी बनना तो एक बात है, यहां कानून तोड़ कर कानून बदलवाना और किसी को अपराधी बताने के लिए कानून का बदलना बाएं हाथ का खेल है. नागरिक कानूनों की अवहेलना कर अपना काम निकालने की जुगत भिड़ाते हैं, जबकि अफसर और नेता कानूनों के नाम पर आम नागरिकों को परेशान कर लूटते हैं.

दिल्ली में शहरी मकानों के बारे में बहुत से कानून अरसे से बने हैं जब दिल्ली एक बड़ा गांव  सी थी. ये कानून दिल्ली को साफसुथरा रखने के लिए जरूरी थे. हर व्यक्ति को भरोसा था कि कानून ऐसा है जिस से हरेक को लाभ होता है. पर धीरेधीरे लोगों की जरूरतें बढ़ने लगीं. ज्यादा लोग उसी जगह में छिपने की कोशिश करने लगे. बजाय कानूनों को सभी के लिए सामयिक व सहायक बनाने के, अफसरों और नेताओं ने पुराने कानूनों को सोने की खान समझ कर उन्हीं को मनचाहे ढंग से थोपना शुरू कर दिया.

कानून का जोर से उल्लंघन हुआ. नेताओं और अफसरों ने अनुमतियां देने या अवैध निर्माण की ओर से नजर हटाने के एवज में अरबों नहीं शायद खरबों कमाए. जब बहुत हल्ला हुआ तो अदालतों ने कानूनों का पालन करने पर जोर दिया पर न जाने क्यों, कानूनों को सरल बनाने की सिफारिश नहीं की. जब तोड़फोड़ की जाने लगी तो सभी अपराधों और अपराधियों को माफी देने वाला कानून बना डाला. पहले वाले कानून का कचरा हो गया.

वर्षों से बनी शहरभर की उन बस्तियों को अब अवैध से वैध किया जा रहा है जो उन जमीनों पर बनी हैं जिन्हें सरकार द्वारा कानूनों के अंतर्गत मामूली मुआवजे पर किसानों से छीना गया था पर चूंकि वर्षों खाली पड़ी रहीं, लोगों ने कब्जा कर मकान बना डाले. कुछ किसानों के अपने खेत थे जो उन्होंने फार्म हाउस बनाने के लिए बेचे, धीरेधीरे वहां बस्ती बन गई.

अवैध काम को कानूनी करना वैसा ही है जैसे संजय दत्त को 20 साल पहले के गुनाह के लिए माफ करना है. पर जैसे संजय दत्त के मामले में सरकार की गलती है कि उस ने सजा 20 साल पहले क्यों नहीं दिलाई, वैसी ही इस मामले में सरकार की है कि 20-25 साल पहले क्यों नहीं रोका गया, ये काम ऐसे नहीं कि रातोंरात हो रहे हैं.

असल में कानूनों की अवहेलना किए जाने में सरकारी अफसरों को बहुत पैसा मिलता है. वे कानून बनाते ही इसलिए हैं कि उन्हें तोड़ा जाए. ये वे कानून हैं जिन के टूटने से समाज को सीधा नुकसान नहीं होता. इसीलिए तो जब सड़क के किनारे पटरी पर पहली दुकान लगती है, लोग उस से खरीदारी कर उसे मान्यता देते हैं. बाद में वह हक बन जाती है. कानून का आदर सिर्फ चंद?रुपयों तक रह जाता है.