सरिता विशेष

पिछले कई महीनों से राष्ट्रीयता की बहस और देशभक्ति के नाम पर किसी को भी बुरा भला कह देने या देशद्रोह के नाम पर किसी को भी महीनों तक जेल में रख देने का नतीजा गंभीर होना ही था. जब देश का काफी हिस्सा कभी जाट आंदोलन, कभी पाटीदार आंदोलन, कभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विवाद और कभी हैदराबाद या वर्धमान विश्वविद्यालयों के विवाद से जैसेतैसे निबट रहा हो, ऐसे में कश्मीर जैसे नाजुक मामले में दूरदर्शिता का अभाव महंगा तो पड़ेगा ही. महबूबा मुफ्ती ने वैसे तो फूंक फूंक कर भारतीय जनता पार्टी के साथ समझौता कर सरकार बनाई पर कश्मीर की असंतुष्ट जनता को वे पसंद नहीं आएंगी, यह महबूबा को भी मालूम था और भाजपा को भी. भाजपा भी अपनी तरफ से मामले को चिंगारी देने से बच रही थी पर 23 वर्षीय बुरहान वानी की सुरक्षाबलों के हाथों मौत ने अलगाववादियों को एक नया नाम दे दिया.

भारत की कोई सरकार कश्मीर में अलगाववादियों को पनपने नहीं दे सकती. पर यह भी पक्का है कि कश्मीर को हर समय बंदूकों के साए में रखना आसान नहीं है. कश्मीर के हर विवाद पर भारत पर विश्वभर में आरोप लगने शुरू हो जाते हैं और अब रूस भी उस तरह भारत का साथ नहीं देता जैसा शीत युद्ध के समय देता था. बुरहान वानी का मामला कश्मीरी जनता के लिए एक नया बहाना हो गया है जिसे महबूबा मुफ्ती आसानी से नहीं सुलझा पाएंगी. 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने विकास करने और भ्रष्टाचार रहित सरकार देने का वादा किया था पर जनता तक उस का असर नहीं पहुंचा. कश्मीर में भी न विकास हुआ, न भ्रष्टाचार खत्म हुआ. कश्मीरी जनता ने पहले मुफ्ती मोहम्मद सईद और फिर महबूबा मुफ्ती का शासन काफी धैर्य से स्वीकार लिया था हालांकि राख के नीचे अंगारे पनप रहे थे. पर देश के कट्टरवादियों ने जो माहौल बनाया उस से हर कोई संशय में है कि भारतीय जनता पार्टी का विकास का एजेंडा प्राथमिक है भी या नहीं. देश के अन्य युवाओं की तरह कश्मीर के युवा भी एक सुखद भविष्य चाहते हैं.

वहां तेजी से बढ़ते कोचिंग व्यवसाय और कश्मीरियों की नौकरियों व व्यवसायों की ललक से लग रहा था कि युवाओं को अपने भविष्य से ज्यादा प्रेम रहेगा न कि राज्य की राजनीति से. इस मामले को गलत तरीके से हैंडल करने के चलते यह लग रहा है कि कश्मीर को एक बार फिर असंतोष के कगार पर ला खड़ा कर दिया गया है. बुरहान वानी जैसे अलगाववादियों को पनपने न देने का फर्ज हर सरकार का है और सरकार को हर संभव कदम उठाना पड़ेगा, पर यह भी नहीं भूला जा सकता कि इसलामी जिहाद के खूनी पंजे अब और पैने व खूंखार हो गए हैं. इसलामिक स्टेट का असर दुनियाभर में महसूस किया जा रहा है और सुन्नी मुसलिम देश भी इस की वारदातों से अछूते नहीं हैं. ऐसे में बारूद में ऐसी आग न लग जाए कि हमारा विकास का सपना आंतरिक विवादों में धूधू कर के जलने लगे.