जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर से आम व्यापारियों की परेशानियां दिखाई दे रही हैं. सरकार का दावा, इस से वस्तुओं पर लगने वाला दोहरातिहरा कर और कर पर कर लगना बंद हो जाएगा व देश में सामान आसानी से इधर से उधर जा सकेगा, निरर्थक साबित हो रहा है.

कुछ चीजों के दामों में चाहे मामूली फर्क आया हो पर ज्यादातर वस्तुओं के दाम वही हैं और बहुतों पर तो ज्यादा कर मांगा जा रहा है. एक देश का व्यापार उस के जंगलों की तरह अपनेआप उगता है. जंगलों को मनमरजी से उगाएंगे तो न जाने कितनी प्रजातियां मर जाएंगी, जंगल मरुस्थल बन सकते हैं या विषैले.

जीएसटी एक ऐसी ही प्रणाली है, जो थोपी जा रही है.  व्यापार को स्वत: अपनाने की छूट नहीं दी जा रही. इस में लचीलापन नहीं है. जीएसटी काउंसिल भाग्यविधाता बन गई है. वह कुंडलीनिर्धारक सी दिख रही है. आप से कहा जा रहा है कि यह तो आप का भाग्य है, डैस्टिनी है, कर्मों का फल है, और जो है, उसे मान लो. जो कुछ नया तय होगा, वह आम जनता नहीं, सरकार के पंडित देखेंगे और तय करेंगे. और यह जनता के दिए चढ़ावे पर निर्भर करता है कि कहां, क्या छूट दी जाए.

जैसे पंडित, मौलवी और पादरी कोई छूट नहीं देता, वैसे ही काउंसिल में कोई दलील नहीं चलेगी. दाम वही रहेंगे जो बोर्ड पर लिखे हैं. गौदान मरने पर भी करना होगा, मृत्युभोज देना ही होगा. जो चाहे मरजी कर लो, कफन से भी कर वसूला जाएगा.

दाम इसलिए नहीं घट रहे क्योंकि व्यापारी नहीं चाहते कि अगर 4 पैसे बच रहे हैं तो वे ग्राहकों को दे दिए जाएं क्योंकि कल को न जाने रिटर्न भरते समय क्या अड़चन आ जाए, असैस्मैंट कराते समय कितना अतिरिक्त पैसा मांग लिया जाए. उस समय ग्राहक से मांगने तो नहीं जाएंगे.