शायद 13 नवंबर को पेरिस में इसलामिक स्टेट के आतंकवादियों द्वारा लगभग 150 लोगों की जान लेने का नतीजा था कि 3 सप्ताह बाद हुए पर्यावरण शिखर सम्मेलन में 195 देशों ने सर्वसहमति से एक नियत कार्यक्रम को अमलीय जामा पहनाने का वादा कर लिया. पिछले पर्यावरण सम्मेलन विफल रहे थे क्योंकि चीन और भारत जैसे देश, जो आज पर्यावरण खराब करने वाले अग्रणी देशों में से हैं, विकसित देशों के पिछली सदियों के गुनाहों के लिए आर्थिक मुआवजा देने की मांग कर रहे थे. इस बार शायद इन 150 मौतों का डर था कि दुनिया को दिखाना जरूरी हो गया था कि चाहे मामला पर्यावरण का हो या आतंकवाद का, मानवता को बचाने के लिए विश्व एक है. विश्व आज एक ग्लोबल विलेज है जहां कुछ की बदमाशी कुछ हद तक ही मंजूर है. सीमा पार की, तो सारा गांव एक हो कर लड़ने को तैयार है पुराने गिलेशिकवे भुला कर.

इस सम्मेलन के बाद विश्व कोशिश करेगा कि ग्लोबल टैंप्रेचर, जिस के 3 प्रतिशत बढ़ने का डर है, 1.5 प्रतिशत तक ही बढ़े. यह तब ही संभव है जब जमीन से निकल रहे कार्बन ईंधन, कोयला व तेल का इस्तेमाल कम हो या इस तरह हो कि पर्यावरण पर असर न पड़े. इस का मतलब यह भी है कि विश्व सोलर एनर्जी, विंड एनर्जी, हाइड्रोइलैक्ट्रिक एनर्जी आदि का इस्तेमाल करे.

सीधे शब्दों में पश्चिमी एशिया के तेल भंडारों, जिन पर इसलामिक कट्टरवादी इतरा रहे हैं, को निरर्थक बनाना है. धुएं, प्रदूषण, पानी में घुलते जहर, प्लास्टिक कचरे से परेशान देश अब आतंकवाद के कड़वे घूंट भी पी रहे हैं और इन सब का स्रोत पश्चिमी एशिया का इसलामी साम्राज्य है. उसे कमजोर करना विश्व की पहली जरूरत बन गई है. इस पेरिस समझौते में इस क्षेत्र के तेल उत्पादक देशों ने भी विश्व की भाषा समझ ली और चुपचाप सहमति दे दी.
बदलते मौसम के मिजाज ने भारत और चीन को भी झुकने को मजबूर कर दिया. भारत अभी चेन्नई में अतिवर्षा का कहर देख चुका था और उस से पहले कश्मीर व उत्तराखंड में. उसे अब एहसास है कि प्रदूषण और कार्बन गैसों को हवा में छोड़ने की कीमत महंगी पड़ रही है. पहले ही सावधानी रखो.

पेरिस समझौता एक बार फिर यह आश्वासन देता है कि दुनिया विनाश के कगार पर नहीं बैठी. दुनिया के देशों में ऐसे नेता हैं जो कुछ खो कर बहुत पाने की आशा में आम सहमति अपनाने को तैयार हैं.