सरिता विशेष

बलात्कार पर देश का कानून तो सख्त बना ही दिया गया है, पुलिस व अदालतें भी आरोपियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रख रहीं. बलात्कार का आरोप लगने का अर्थ है कि महीनों की जेल तो पक्की ही है चाहे आरोप सही हो या न हो.

दिल्ली की एक अदालत ने एक अभियुक्त को निर्दोष करार देते हुए कहा कि बलात्कार के मामलों में झूठे मामलों के प्रति सचेत रहना होगा. इस मामले में प्लेसमैंट एजेंसी से आई 19 वर्षीया लड़की को जब चोरी करते पकड़ा गया तो उस ने पलट कर घर के एक सदस्य पर बलात्कार का केस जड़ डाला.

बलात्कार के मामलों में आरोप लगाने में कुछ ज्यादा तो करना नहीं होता. कहना ही काफी होता है और बाकी पुलिस, डाक्टर अपनेआप कर लेते हैं. इस में मोटी कमाई हरेक को दिखती है. अभियुक्त को छुटकारा 4 साल बाद मिला. उस ने क्या कीमत दी होगी यह कोई पता नहीं कर सकता.

बलात्कार की पीडि़ताओं को जो झेलना पड़ता है, वह लोमहर्षक है, वहीं अब झूठे आरोपों के चलते फंसते पुरुषों का दर्द भी तीखा होता जा रहा है. छेड़खानी, इज्जत हनन और बलात्कार जैसे आरोप आज समाज को एक नए दलदल में फंसा रहे हैं. औरतों को अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के नाम पर पुरुषों को कठघरों में खड़ा करना भी गलत होगा क्योंकि पुरुष के साथ उस के मातापिता, पत्नी, बच्चे सब समाज की निगाहों में ऐसे ही गिर जाते हैं जैसे बलात्कार की शिकार युवती गिर जाती है.

इस विडंबना का कोई आसान हल नहीं है पर कोशिश तो करनी चाहिए. इसीलिए इस मामले में न्यायाधीश निवेदिता अनिस शर्मा ने आदेश दिया कि निर्णय की प्रतियां कानून मंत्रालय, केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार व महिला आयोग की अध्यक्ष को भेजी जाएं ताकि वे मामले के दूसरे पक्ष को भी देख सकें.