पाकिस्तान में चुनावों के जरिए सत्ता बदली, टैंकों और बंदूकों के बल पर नहीं, यही इस चुनाव की खासीयत रही है जिस में नवाज शरीफ की पार्टी बहुमत के करीब पहुंची. आखिरी दिन तक लग रहा?था कि कहीं कोई ऐसी बात न हो जाए कि चुनावों का रंग बेरंग हो जाए जैसे पिछले चुनावों से पहले बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी. चुनावों में आम लोगों की हत्याएं तो हुईं पर नेताओं में से सिर्फ इमरान खान के एक स्टेज से खुदबखुद गिर कर गहरी चोट लगने से थोड़ी चिंता हुई.

भारत के लिए पाकिस्तान में शांति और लोकतंत्र बहुत जरूरी है क्योंकि वर्ष 1947 के विभाजन के बाद दोनों देशों की राजनीति की धुरी में पाकिस्तान रहा है. कश्मीर का मसला तो गंभीर है ही, पाकिस्तान का लगातार भारत में आतंकी भेजना भारत की शांति के लिए खतरा बना हुआ है. लोकतंत्रों में आमतौर पर शासकों के अपने खुद के ही इतने पचड़े होते हैं कि वे दूसरों के कामों में दखल कम देते हैं.

पाकिस्तान में लोकतंत्र और कानून का राज होने का मतलब है कि वहां सेना और मुल्ला की ताकत कम होना जो दोनों ही भारत के बहाने अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. इस बार के चुनावों में न तो भारत को ज्यादा कोसा गया और न ही कश्मीरी लौलीपौप दिलाने की लंबीचौड़ी बात की गई. लोगों की मांग बिजली, व्यवस्था, गरीबी, नौकरियां आदि की रही.

जब जनता की सुनी जाने लगे तो सरकार के हाथ निरर्थक कामों से हट जाते हैं. रिश्वतखोरी तो चलेगी, बेईमानी भी होगी पर देश का पैसा बेकार में अफगानिस्तान या भारत में आग लगाने में इस्तेमाल न होगा. अगर नवाज शरीफ अपने वादे के अनुसार देश में प्रधानमंत्री का राज चला सकें और सेना को दखल न देने दें तो दुनिया का सब से खतरनाक देश कुछ चमक दे सकेगा और भारत राहत की सांस ले सकेगा.

 

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