संवैधानिक अधिकारों के नाम पर केंद्र सरकार दिल्ली के उपराज्यपाल का अनुचित प्रयोग कर के अरविंद केजरीवाल की सरकार को उस दिन से तंग कर रही थी जिस दिन से अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, मई 2014 के आम चुनावों के बाद हुए दिल्ली के चुनावों में 70 में से 67 सीटें पा कर विधानसभा में काबिज हो गई थी. लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केजरीवाल की जीत कहीं गहरे खा गई. उन्होंने संविधान में उपराज्यपाल को मात्र निगरानी के लिए दिए गए अधिकारों का दुरुपयोग करा कर उपराज्यपाल को चौकीदार से मालिक बना दिया था.

यह भगवा सोच का पुराना तरीका था. हमारा पौराणिक इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है जहां सत्ता पर पंडित या गुरुओं का इतना अधिक कंट्रोल होता था कि राजा असहाय रह जाता था. नरेंद्र मोदी उन्हीं पौराणिक गुरुओं की तरह उपराज्यपाल अनिल बैजल के माध्यम से दिल्ली सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर रहे थे ताकि अरविंद केजरीवाल खुद भारतीय जनता पार्टी के चरणों में झुक जाएं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की सही व्याख्या करते हुए नरेंद्र मोदी और अनिल बैजल के पर अब कुतर डाले हैं.

अरविंद केजरीवाल कुशल प्रशासक हैं या कुशल ऐक्टिविस्ट, कहना कठिन है पर दिल्ली का शासन, जो अरविंद केजरीवाल के हाथों में आया है, खासा ठीक चला है. लोगों को जो शिकायतें हैं वे उन के काम के तरीकों से हैं, काम से नहीं. महल्ला क्लिनिक, राशन, शिक्षा आदि के मामलों में अरविंद केजरीवाल की नीतियां लीक से हट कर रही हैं और लोगों को उन से शिकायत नहीं है. इसीलिए वे विधानसभा उपचुनाव जीतते रहे, चाहे नगर निगम पर कब्जा न कर पाए हों.

राजनीति में अरविंद केजरीवाल की आप जैसी छोटी पार्टियों के होने से बहुत फायदे होते हैं क्योंकि इन से बड़ी पार्टियों पर अंकुश बना रहता है, उन का अहंकार टूटता रहता है. अखिल भारतीय बड़ी पार्टियों को शहरों की गलियों और आम लोगों की कठिनाइयों का एहसास नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की सरकार को अधिकार दे कर देश में लोकतंत्र को बचाने का सही कदम उठाया है. उम्मीद करें कि नरेंद्र मोदी अब कोई और बहाना न बनाएं.