अनाथालयों की हालत देश में बहुत बुरी है. एक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अनाथ बच्चे सरकारी अनाथालयों में ही खतरे में रहते हैं. उन से मारपीट तो होती ही है, उन्हें देशीविदेशी ग्राहकों के सैक्स के लिए भी भेजा जाता है और अनाथालयों के संचालक सरकारी ग्रांट का भी फायदा उठाते हैं और इस तरह की ऊपरी आमदनी का भी.

सरकारी अफसरों की लापरवाही और मिलीभगत के शिकार अनाथालय ही नहीं, बल्कि अनाथ, बेबस, भोले, बेगुनाह बच्चे होते हैं और वे इस तरह अपना बचपन बिताते हैं कि उन के पास अपराधी बनने के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं बचता. उन्हें बेचा भी जाता है और गोद देने के नाम पर मोटी वसूली भी की जाती है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सारे पहलुओं पर तो नहीं आदेश दिया है. इस मामले में यह भी साफ हुआ है कि सरकारी विभागों का निकम्मापन इतना है कि वे तय की गई ग्रांट भी इस्तेमाल नहीं करते और 2013-14 में 65 करोड़ रुपए खर्च किए बिना रह गए. जहां जितना खर्च हुआ, उस में से कितना बच्चों के लिए गया, कितना जेबों में, यह दूसरी बात है.

सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश दिए हैं, पर यह कहीं नहीं कहा कि अगर इन निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो कौन सजा पाएगा. सरकारी कानूनों में नागरिक को हर गलती के लिए जुर्माना भरना पड़ता है या फिर लंबी अदालती लड़ाई के बाद छुटकारा मिलता है. कई बार जेल भी हो जाती है.

असल में अनाथ बच्चों के बारे में समाज का रूखा बरताव इस सोच के कारण है कि वे अपने पिछले जन्मों का फल भुगत रहे हैं. पुनर्जन्म में भरोसा रखने वाले भारतीय समझते हैं कि अगर मातापिता नहीं हैं, तो यह बच्चे का दोष है और उसे भुगतना होगा. इस के लिए दूसरों को परेशान होने की क्या जरूरत है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहीं भी इस सोच पर कोई टिप्पणी नहीं की है. अगर इस मूल बात को समझा जाए कि अनाथ बच्चे सरकार और समाज की जिम्मेदारी हैं, क्योंकि उन के मातापिता के न रहने पर वही उन की जगह लेंगे, तो बात दूसरी होती. अब सरकार और समाज एक दया के रूप में टुकड़े अनाथों को फेंकते हैं, जैसे जानवरों को फेंके जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में तरहतरह की कमेटियां तो बनवाई हैं, पर अगर वे कमेटियां वर्षों से कुछ नहीं कर पाईं, तो बच्चे क्या करेंगे?

सुप्रीम कोर्ट के पास यह मामला एक समाचार के सहारे 2007 में आया था, पर फैसला सुनातेसुनाते 2017 हो गया. बच्चे 10 साल वैसे ही रहे, जैसे 2007 में थे. यह कैसा न्याय है? देश का कानूनी ढांचा भी सरकारी ढांचे की तरह लचर है और समाज तो उस से भी गयागुजरा है. अनाथ बच्चों के लिए लोग अपने सप्ताह के 2 घंटे भी लगाने को तैयार नहीं होते. अनाथालयों में अगर सेवा करने वाले युवा ही मिल जाएं, तो उन का कायापलट हो जाए. फेसबुक और ह्वाट्सअप पर घंटों लगाने वाले कुछ घंटों से बहुतकुछ कर सकते हैं, पर यहां तो डारडार पर निकम्मापन है, भाग्य है.

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