सरिता विशेष

पहले गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी के कहने पर तारीखें देने में ढीलढाल कर और उस से पहले दिल्ली के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द करने में जल्दबाजी दिखा कर चुनाव आयोग ने अपनी साख को गहरा धक्का लगा लिया है. सरकार की आंखों का तारा बने रहने की इच्छा हरेक

की होती है और अकसर लोग अपने महत्त्वपूर्ण पद की गरिमा का ध्यान न रखते हुए भी किसी पक्ष का साथ दे देते हैं.

चुनाव आयोग ने 2016 में दिल्ली के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी कि अरविंद केजरीवाल की सरकार ने उन्हें संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया था. चुनाव आयोग के इस फैसले से भाजपा को लाभ होना था क्योंकि नरेंद्र मोदी की 2014 के लोकसभा चुनाव में भारी जीत के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल ने 67-3 से विधानसभा चुनाव जीत कर भाजपा के रंग में भंग डाल दिया था.

अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग का फैसला पलट दिया है और चुनाव आयोग को मनमानी करने पर फटकार भी लगाई है. मामला हालांकि फिर चुनाव आयोग की गोद में चला गया है पर पूरी प्रक्रिया जब तक चलेगी तब तक 2019 के लोकसभा चुनाव आ जाएंगे और 20 विधायकों पर फैसला चाहे जो भी हो, वह बेकार हो जाएगा.

इस मामले में अफसोस इस बात का है कि जिस चुनाव आयोग ने बड़ी मुश्किल से संवैधानिक स्वतंत्रता पाई थी उस ने यह स्वतंत्र छवि अपने हाल के फैसलों से खो दी और लगने लगा है कि यह संस्था अब केंद्र की भाजपाई सरकार के इशारे पर नाच रही है.

सुप्रीम कोर्ट पर आज वैसे भी शक हो रहा है क्योंकि 4 जजों ने खुल्लमखुल्ला प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पहली बार न्यायिक तंत्र के अन्यायपूर्ण रवैए को जनता के सामने खोल डाला है.

लोकतंत्र में भारी विजय एक बात है पर इस विजय का दुरुपयोग करते हुए देश की विश्वसनीय संस्थाओं को कमजोर कर रूस और चीन की तरह देश में लोकतंत्र की हत्या करना किसी तरह

से भी ठीक नहीं है. ये संस्थाएं केवल कुशल, लोकप्रिय प्रशासनिक प्रबंध के लिए जरूरी ही नहीं हैं, बल्कि इन्हीं के सहारे देश की प्रगति संभव है.

चुनाव आयोग और न्यायालय जैसी स्वतंत्र संस्थाओं पर सरकार अंकुश लगाएगी तो उन की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी. ऐसे में देशवासी इन संस्थाओं पर भी विश्वास नहीं कर सकेंगे. सो, वे पूरा काम न करेंगे, न पूरा टैक्स देंगे, न भविष्य की सोचेंगे.

जब भी किसी समाज या देश में कल के बारे में संदेह होता है, तो लोग 5, 10 या 15 साल में परिणाम देने वाले काम नहीं करते. सोवियत संघ लगातार पिछड़ता चला गया था क्योंकि भारी जनशोषण के चलते वहां के नागरिक अपनी पूरी क्षमता, पूरे विश्वास से काम न कर सके थे.

चीन का नागरिक फिलहाल मेहनत कर रहा है क्योंकि उसे यह विश्वास है कि सरकार चीन को गरीब, पिछड़े, भिखारी देश के अपमानित स्थान से निकाल रही है. चीनी 10-15 या 20 सालों की सोच रहे हैं क्योंकि उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की निष्ठा पर भरोसा है. हम भारत में सत्तारूढ़ पार्टी की निष्ठा पर विश्वास नहीं कर सकते कि वह हर नागरिक को बराबर समझती है, बराबर के अवसर देने को तैयार है.

हमारा विश्वास देश की स्वतंत्र संस्थाओं में है और इसीलिए सत्तारूढ़ पार्टी कोशिश कर रही है कि ये संस्थाएं कमजोर हों. यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन, आर्केयोलौजिकल सर्वे औफ इंडिया हो, साहित्य अकादमी हो, चुनाव आयोग हो या अदालतें, आज सब पर प्रश्नचिह्न लग रहा है तो भारत जैसे विविध जातियों वाले देश में असुरक्षा का एहसास होगा ही.

उच्च न्यायालय के फैसले से चुनाव आयुक्त और राष्ट्रपति जैसे सम्मानित पदों की छवि को धक्का लगा है. आज ये दोनों मोहरे नजर आ रहे हैं, अंधे मोहरे.

VIDEO : नेल आर्ट

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