खिचड़ी सरकार का भय दिखा कर भारतीय जनता पार्टी 2019 के आम चुनावों में जीत हासिल करना चाहती है. कर्नाटक विधानसभा और 10 राज्यों में हुए उपचुनावों के परिणामों से यह तो साफ है कि 1977 के बाद कांग्रेस के पर्याय के रूप में खिचड़ी सरकारों का जैसा दौर रहा वैसा ही 2019 के बाद भी संभव है जिस में दालचावल का शोरवा नहीं रहेगा, दाल अलग दिखेगी, चावल अलग. सवाल है कि इस में बुराई क्या है.

कांग्रेस के बाद देश कोई अराजकता में तो नहीं डूबा. कइयों की सहमति से फैसले होते थे. कुछ फैसले ढंग के होते थे, कुछ बेढंगे. इस के विपरीत कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की जबजब अकेली सरकारें बनी हैं तब दाल तो अकेली थी लेकिन चावलों का पता ही नहीं था. यही नहीं, दाल में कंकर ज्यादा थे, दाल कम. दोनों सरकारों ने जनता के हितों से जम कर खेला. अगर अदालतें न होतीं तो देश का लोकतंत्र इंदिरा गांधी के युग में भी और नरेंद्र मोदी के युग में भी हवा हो चुका होता. अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की मिलीजुली सरकारों को मंत्रिमंडल की बैठकों में आम सहमति से फैसले लेने पड़े और वे सही थे. यह देश अपनेआप में एक खिचड़ी है. यह न जरमनी है, न चीन जहां लगभग पूरी जनता एक परंपरा, एक इतिहास, एक बोली और एकतरह के विचारों वाली हो. पर इसी एकतरह में हिटलर और माओ पैदा हुए हैं, जिन्होंने लाखों अपनों को मरवाया और परायों को भी जम कर मारा.

भारत को विभिन्नता चाहिए. भारत को ऐसा एकाधिकार नहीं चाहिए. खिचड़ी सरकारों में 10-15 सांसदों वाली पार्टी भी अपनी बात कह सकती है. आज नरेंद्र मोदी को उन की पार्टी के 50 सांसद भी कुछ कहना चाहें तो कह नहीं सकते. नरेंद्र मोदी ने तो अपने मंत्रिमंडल के मंत्रियों के भी पर कुतर रखे हैं और सारे असंवैधानिक, अनैतिक व अतार्किक फैसले पीएमओ यानी प्राइम मिनिस्टर औफिस कर रहा है.

मोदी के नेतृत्व की यह सरकार न संविधान को मानती है न मानव अधिकारों को. इस ने तो भरी अदालत में यहां तक कह दिया कि हर नागरिक के शरीर पर सरकार का हक है, उस का खुद का नहीं. आज जनता अगर कुछ खुली सांस ले पा रही है तो इसलिए कि देश की राजनीति में कई दालें, सब्जियां, कई तरह के चावल और तरहतरह के मसाले हैं. बढि़या खिचड़ी बनती है. यह स्वादिष्ठ भी होती है और हाजमा भी ठीक रखती है.