सरिता विशेष

सरकार को उन कैदियों को छोड़ देने का फैसला जिन की उम्र ज्यादा हो, जिन्होंने सजा के आधे दिन गुजार दिए हों और जो बीमार हों, अच्छा है. कैद समाज को ज्यादा साफसुथरा रखती है, यह गलतफहमी है. पकड़े जाने पर और जेल में कैद काटने से कोई सुधरता है या नहीं, समाज में अपराध तो कम बिलकुल नहीं होते.

अमेरिका आजकल बदनाम हो गया है कि उस ने बहुत ज्यादा लोगों को जेलों में भर रखा है. वहां जेलों का निजीकरण हो गया है और प्राइवेट ठेकेदार हल्ला मचवाते रहते हैं कि यदि अपराधी जल्दी छोड़ दिए गए तो वे समाज को तहसनहस कर देंगे. फिर भी वहां समाज में अपराध कम नहीं हो रहे.

हमारे देश में जेलों में आमतौर पर वही बंद हैं जो अदालतों में महंगे वकील नहीं कर पाए. कुछ मोटे मामलों को छोड़ कर महंगे वकीलों के सहारे आरोपी आमतौर पर बच ही निकलते हैं. यदि वे लोग जो अपराध के शिकार हुए हों चुप बैठ जाएं तो हमारे यहां सजा मिलना कम ही होता है इसलिए जेलें या तो ऐसे लोगों से भरी हैं जो पुलिस से भिड़ गए होते हैं या जो गरीब होते हैं पर कोई जुर्म कर बैठे हों. उन्हें छोड़ने का फैसला ठीक है क्योंकि अब उन्हें पता चलेगा कि जेल से बाहर की जिंदगी भी आसान नहीं.

जेल काट कर आए लोगों को न घर वालों का प्यार मिलेगा, न दोस्तों का. आजकल जिस तरह की बेरोजगारी है, उन्हें रोजगार मिलेगा इस के भी मौके कम हैं. उन्हें हकीकत का पता अब चलेगा. जेल से बाहर रह कर भी वे अपनी खुद की बनाई कैद में रहेंगे.

सदियों से कानून को समझने वाले बहस करते रहे हैं कि सजा क्या किसी को सुधारती है. कई बार तो कैद से सजा पूरी कर के आए और ज्यादा खूंख्वार हो जाते हैं क्योंकि जेलों की दुनिया में अपराध ज्यादा होते हैं क्योंकि वहां तो सभी बेईमान, हत्यारे होते हैं. विदेशों में जहां जेलों में सुविधाएं मिलनी शुरू हो गई हैं वहां भी जेल से बाहर आने तक लोग और ज्यादा अपराध करने के गुर सीख जाते हैं.

जेलों में न रख कर आजकल पैर में खास बिजली की चेन पहना कर घर तक रहने की सजा दी जा रही है. कैदी केवल अपने घर में रह सकता है, बाहर जाते ही सायरन बज जाता है. सरकार को इस तरह के कैदी पर खर्च नहीं करना पड़ता.

समाज गुनाहगारों को सजा देने के लिए रोजदररोज खर्च करे यह भी कोई अच्छा नहीं. उन्हें छोड़ना गलत न होगा. अगर कुछ शिकायती काम करेंगे तो फिर पकड़े जा ही सकते हैं.