5 जून के समाचारपत्र बड़ेबड़े विज्ञापनों से भरे थे जिन में युवा चेहरे झांक रहे थे. ये विज्ञापन कोचिंग इंस्टिट्यूट्स के थे जिन के छात्रों ने नीट की परीक्षा में अच्छे रैंक्स पाए हैं. जाहिर है इन विज्ञापनों का पैसा उसी फीस से आया जो इन छात्रों ने इन कोचिंग इंस्टिट्यूट्स को दी थी.

12 लाख से ज्यादा छात्रछात्राएं नीट की परीक्षा में शामिल हुए. उन्होंने निजी तौर पर लाखों नहीं, हजारों तो कोचिंग क्लासों पर खर्च किए ही होंगे. फिर उन्होंने हजारों रुपए एक्जामिनेशन सैंटर में जाने या वहां रहने पर खर्च किए होंगे. मातापिता ने उन पर जीभर कर पैसा लुटाया होगा ताकि वे 66 हजार सीटों में से कोई एक पा सकें और डाक्टरी की पढ़ाई शुरू कर सकें.

12वीं की परीक्षा के बाद मैडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए एक नीट की परीक्षा थोप दी गई है. इंजीनियरिंग में भी इसी तरह की एक अतिरिक्त परीक्षा है. कई जगह दाखिलों में इस तरह की प्रवेश परीक्षाएं हैं ताकि अलगअलग बोर्डों के मार्क्स का संतुलन बैठाया जा सके और सभी विद्यार्थियों को एक पैमाने पर तोला जा सके.

यह असल में, शिक्षा उद्योग को बढ़ावा देने की साजिश है. इन परीक्षाओं के लिए कोई अतिरिक्त पढ़ाई नहीं होती. जो होती है वह कोचिंग इंस्टिट्यूट्स में होती है. प्रश्नपत्र इतने कठिन बनाए जा रहे हैं कि स्टूडैंट्स को कोचिंग क्लासों में जबरन जाना पड़े. 12वीं तक की कक्षाओं में जो सीखा, उस का इस तरह की परीक्षाओं से लेनादेना नहीं होता. योग्यता या मैरिट परखने के नाम पर कोचिंग उद्योग को पनपा दिया गया है और देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह कोचिंग सैंटर उग आए हैं. ये लौबी बना कर सरकार पर दबाव डालते हैं कि ऐसे टेढ़ेसीधे नियम बनें कि कोचिंग क्लासें जरूरी हो जाएं. ये कोचिंग संस्थान लाखों रुपए रिश्वत दे कर पेपर भी खरीदते हैं जो कई बार लीक होने पर हंगामा मचवा देता है.

अच्छी पढ़ाई आज इतनी महंगी कर दी गई है कि इस से मातापिता का पैसा और युवाओं के कीमती साल बरबाद हो रहे हैं. यह धंधा नहीं, गोरखधंधा है.