लंबी बीमारी के बाद भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी का 93 वर्ष की आयु में निधन होने से देश ने एक लोकप्रिय नेता खो दिया. भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा को दूसरे दलों के लिए सहज बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी का बहुत बड़ा योगदान रहा. भारतीय जनसंघ का स्वरूप असल में कट्टरवादी हिंदू का था जिसे कम्युनिस्ट, समाजवादी तो छोडि़ए, स्वतंत्र पार्टी जैसी पार्टियां भी सहज न ले पाती थीं पर अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सौम्य व मिलनसार व्यवहार से भारतीय जनसंघ के नए अवतार भारतीय जनता पार्टी को सब के लिए सहयोग करने योग्य बना दिया.

1977 में अटल बिहारी वाजपेयी के कारण ही कांग्रेस का एक हिस्सा, कम्युनिस्ट, समाजवादी, लोकदल और दूसरे कई एक मंच पर आए और उन्होंने इंदिरा गांधी को हराया ही नहीं, बल्कि आपातस्थिति को इस्तेमाल करने के संवैधानिक हथियार को सदासदा के लिए दफना भी दिया.

1977 से 1981 के दौरान राज में भागीदार होने के बाद भाजपा को 18 वर्षों तक इंतजार तो करना पड़ा पर अगर वह इन 18 वर्षों तक विपक्षी धुरी बनी रही तो अकेले अटल बिहारी वाजपेयी के ही कारण. वाजपेयी कट्टरवादी हिंदू संघ के होने के बावजूद दूसरों को भी सहज लेने में विश्वास करते थे और उन का व्यवहार दोस्ताना था.

आज जो भारतीय जनता पार्टी अपनेआप में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को समेट पा रही है उस में बड़ी भूमिका अटल बिहारी वाजपेयी की डाली नींव की है. भाजपा नेता व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असल में इसी का लाभ उठा रहे हैं. नरेंद्र मोदी तो वास्तव में अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को नष्ट करने में लगे हैं. मौजूदा भाजपा व मोदी की नीतियों के चलते मुसलमान तो भयभीत हैं ही, दलित और पिछड़े भी रुष्ट हो चले हैं.

‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा’ के सिद्धांत को मानने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदूवादी पार्टी को बाधकों की पार्टियों के कट्टर चोले से निकाल कर उसे सब के लायक बनाया था और 1984 में केवल 2 सीटें लोकसभा में जीतने के बावजूद हार नहीं मानी और 1998 में फिर सत्ता पा ली, उस बार अपने दम पर.

2005 के बाद सक्रिय न रह कर अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय राजनीति को कट्टरवादियों के हाथों में फिसल जाने दिया. 2004 में पार्टी की हार का मुख्य कारण अटल बिहारी वाजपेयी नहीं, वे कट्टरवादी थे जो

‘जरूरी यह है कि ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो, जिस से मनुष्य ठूंठ सा खड़ा न रहे, औरों से घुलेमिले, किसी को साथ ले, किसी के संग चले’ के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते. पार्टी के दूसरे नेताओं के अहं व अहंकार के कारण व रार पालने अर्थात बदले की भावना से काम करने की प्रवृत्ति ने पार्टी को 2004 व 2009 में पराजय दिलाई.

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के लिए विरासत में बहुत सारी सोच दे गए हैं पर उन्हें उन के पीछे पैदल चलने वाले बंद संदूक में रखेंगे, यह पक्का है.