सरिता विशेष

भाजपा सरकारें बारबार यह जताने में लगी हैं कि देश में उन की और ऊंची जातियों की मेहरबानी से पिछड़े (शूद्र) व दलित (अछूत) जिंदा हैं और उन्हें थोड़ीबहुत जगह समाज में दी जा रही है. यह जताने का मतलब सिर्फ इतना समझाना है कि जो मिल रहा है उसे ऊपर वाले और ऊंचों की कृपा समझो वरना वैसी पिटाई होगी जैसी ऊना या राजकोट में हुई.

अभी मध्य प्रदेश के शिक्षा बोर्ड ने 10वीं व 12वीं क्लासों के नतीजे जारी करते हुए कहा कि सवर्ण ऊंचे जनरल कैटीगरी में कितने पास हुए, अन्य पिछड़ी जातियों के कितने और शैड्यूल कास्ट के कितने. यह सोच हर सरकारी विभाग में ठूंसठूंस कर भरी हुई है जबकि हर सरकारी विभाग में काफी पिछड़े व दलित आरक्षण की बदौलत पहुंच चुके हैं. वे इस कदर डरे रहते हैं कि ऐसे जातिवादी फैसले पर विभाग में रोकटोक नहीं कर सकते.

बुरा हो लिबरल मीडिया का जिस ने इस बात को पकड़ लिया और हल्ला मचा दिया. इस पर बोर्ड के अफसर सफाई देते हैं कि इस से तो इन बच्चों को आगे पढ़ने में सहूलियत होगी. उन्हें दाखिले आसानी से मिलेंगे. उन की सोच पर दया आती है कि इन आंकड़ों को इकट्ठा कर के जारी कर के क्याकैसे मिलेगा, यह मालूम न होते हुए भी वे अपनी बात को सही साबित करने में लगे हैं.

असल में ऊंची ही नहीं नीची जातियों के मन में गहरा बैठा है कि यह भेदभाव तो खुद भगवान ने दिया है. बारबार पुराणों का उल्लेख करा जाता है कि आदि पुरुष के मुंह से ब्राह्मण, हाथों से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य व पैरों से शूद्र पैदा हुए थे. जो दलित हैं तो वे शायद कहीं पैरों के नीचे की धूल से जन्मे थे क्योंकि उन का पौराणिक साहित्य में न के बराबर जिक्र है. नीची जातियां पीढ़ी दर पीढ़ी इस बात को मानती रही हैं और धर्मकर्म से अपना अगला जन्म सुधारने में लगी रहती हैं. अब वे पढ़नेलिखने लगी हैं पर आमतौर पर पिछड़ी रहती हैं. हालांकि अब बड़े शहरों में, जहां जातिवाद कुछ कम है, वहां के बच्चे बराबरी का दर्जा पाने लगे हैं.

बोर्ड की यह जलील करने वाली हरकत एक आम बात है. पढ़नेपढ़ाने वाले इन वर्गों के लोगों को हिकारत से देखते हैं. भेदभाव रखते हैं. कहीं नौकरी मिल जाए तो भी चूंचूं करने से बाज नहीं आते. पीठ पीछे तो न जाने क्याक्या बोल जाते हैं और वे बातें कई दफा मुंह से निकल आती हैं. जाति का भूत अभी तो दमदार तरीके से सिर पर सवार है.