‘लगे रहो मुन्ना भाई’ के बूढ़े पिता के बेटे का बालकनी से लटक कर अपनी बात मनवाने के स्टाइल में 4 गुंडों ने 43 माले की एक बिल्डिंग इंपीरियल हाइट से डौन को पैसा वसूलने के लिए लटका दिया. हार कर पीडि़त ने पैसा देना मंजूर कर लिया पर उस ने हिम्मत दिखा कर पुलिस में शिकायत कर दी और अब चारों जेल में हैं.

पैसे वसूलने के ये घिनौने तरीके नए नहीं हैं. इन से कहीं ज्यादा क्रूर तरीके अपनाए जाते हैं. गनीमत है कि देश में अभी भी खासा कानून का राज है और पुलिस पूरी तरह बेबस नहीं है. हां, पीडि़त को भी खासा खर्च करना पड़ता है और वर्षों परेशान रहना पड़ता है.

ये मामले आजकल आम गृहिणियों को भी झेलने पड़ रहे हैं. घरों के नौकरनौकरानियां, छोटीमोटी सेवा देने वाले पेंटर, बढ़ई, माली, आदि काम करने के दौरान या खराब काम करने पर कटौती करने पर धमकियों पर उतर आते हैं और उन से निबटना बड़ा मुश्किल काम हो जाता है. घरेलू नौकरानियां तो अकसर मालकिन के पति पर सैक्सुअल हैरेसमैंट का झूठा मुकदमा दायर कर देती हैं. कानूनों की भरमार ऐसी है कि हर छोटी चीज का विवाद बनाया जा सकता है और यदि कोई थोड़ा हिम्मत वाला हो तो जराजरा से मामले में यारोंदोस्तों को बुला कर धमकियां दे सकता है या पुलिस बुलवा सकता है.

वैसे तो बुद्धिमानी इसी में है कि लेनदेन में जितना हो पहले ही बात साफ कर ली जाए और कुछ खो देने को तैयार रहें. यह कमजोरी नहीं, बल्कि शांति खरीदना है. अपनी जिद पर अड़ कर नौकरानी के क्व200 काट लेना या फ्रिज बेचने वाले के यहां सिर पटकने से अच्छा है कि जो जैसा है उसे सह लिया जाए और आगे चल दिया जाए.

पर इस का अर्थ यह नहीं कि तर्क, अधिकार, स्पष्टता, नैतिकता को नाली में बहा दिया जाए. जहां जरूरत हो वहां हर तरह से अड़ना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि दूसरे पक्ष को समझाया जा सके कि इस की सेवा में कमी है, इसलिए पैसे काटे जा रहे हैं. जबरदस्ती नहीं. मगर दिक्कत यह है कि हमारे यहां तर्क की भाषा का इस्तेमाल न तो पतिपत्नी में होता है, न रिश्तेदारों में और न ही सामान्य बाहरी लोगों से व्यवहार में.

आम नौकर, सब्जी वाला, प्लंबर या दुकानदार भी वास्तव में झगड़ा नहीं चाहता. वह भी काम कर के अपने रास्ते चले जाना चाहता है. झगड़े में उस का भी नुकसान होता है. समय लगता है, वह काम पर नहीं जा पाता. तकादों के लिए आनेजाने पर खर्च करता है. वह भी चाहता है कि उस के भविष्य पर आंच न आए. लोग उसे झगड़ालू न समझें. सभ्य समाज का तकाजा है कि बिना हल्ला किए विवाद हल करें पर अपना हक हरगिज न खोएं.