हिंदू विवाह कानून 1956 में लिखा हुआ है कि यदि तलाक हो जाए तो भी 6 माह तक टूटे पतिपत्नी विवाह नहीं कर सकते और उन्हें एक बार फिर अदालत आ कर आवेदन करना होगा कि उन के तलाक पर अंतिम मुहर लगाई जाए ताकि वे नए सिरे से जिंदगी शुरू कर सकें. इस कानून की धारा के खिलाफ सहमति से तलाक पाए एक जोड़े ने सुप्रीम कोर्ट जा कर गुहार लगाई कि उन्हें 6 माह की शर्त से मुक्ति दिलाई जाए, क्योंकि युवती इंगलैंड जा कर बसना चाहती थी और वहां से फिर 6 माह बाद लौटना नहीं चाहती थी. न जाने क्यों सुप्रीम कोर्ट को इस भूतपूर्व जोड़े पर दया आ गई और उस ने युवती की गुजारिश मान ली और उन्हें तुरंत मुक्त कर दिया.

असल में भारत में आज भी विवाह कानून संस्कार है कि एक बार विवाह हो गया तो 7 जन्मों तक का साथ होगा पर यह शर्त केवल पत्नी के लिए है, पति चाहे तो दूसरा विवाह कर सकता था या फिर पत्नी को घर से निकाल सकता था. 1956 में हिंदू विवाह अधिनियम व हिंदू विरासत कानून बनने के बाद औरतों को बहुत से अनाचारी नियमों से छुटकारा मिला है, बहुविवाह बंद हुआ, बालविवाह बंद हुआ, बिना तलाक लिए दूसरा विवाह बंद हुआ, संपत्ति में हिस्सा मिला, तलाक के बाद गुजाराभत्ता मिलने लगा. लेकिन इन अधिकारों को पाने में मशक्कत बहुत करनी पड़ती है.

पतिपत्नी का रिश्ता चाहे कितने ही प्रेम का हो, बच्चों के साथ बंधा हो, होता यह कच्ची डोर का सा है. कानून और समाज ने सदियों से इसे एक विशिष्ट मान्यता दी है और धर्मों ने इस पर अपने बनाए ईश्वर की मुहर लगवा दी ताकि उसे ईश्वर की आवाज माना जाए पर पहले भी रिश्ते टूटते थे आज भी टूट रहे हैं.

पहले सिर्फ आदमी तोड़ते थे और अगर औरतें तोड़ती थीं तो कुलटा कहलाई जाती थीं. आज कानूनों में सुधार के कारण वे पुनर्विवाह के लायक भी हैं, पर कानूनी प्रक्रिया अभी भी लंबी और निरर्थक है. बेमतलब के कानूनों में तलाक के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होती है. कभीकभार तलाक मिलता ही नहीं यानी बंधे रहो एकदूसरे से. सहमति से मिले तलाक में भी हजारों अडं़गे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केवल उसी जोड़े को छूट दी, सब को नहीं दी, यह गलत है. यह प्रावधान हटना ही चाहिए. तलाक हो गया तो फिर 6 माह के कूलिंग पीरियड का क्या लाभ है? इसे सभी के लिए समाप्त कर दो.      

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