भारत में आरक्षण के मामले में ऊंची जातियों के छात्र अकसर आरक्षण की वजह से घटिया, कम योग्य छात्रों को स्थान मिलने पर होहल्ला मचाते रहते हैं. नरेंद्र मोदी की पूरी राजनीति के पीछे ऊंची जातियां बनाम आरक्षित जातियां हैं पर यह छिपा है और यह अच्छा ही है कि इन चुनावों में वर्ग, वर्णभेद युद्ध शुरू नहीं हुआ, इस बार केवल धर्म व रिश्वतखोरी मुद्दा ही सुर्खियों में बने रहे हैं. हमारा मध्यवर्ग सरकारी नौकरियों और पैसे वाली जगहों पर अपना पीढि़यों का हक समझता है. इस बार ऊंची जातियां एकजुट हो कर समाज पर उसी तरह कब्जा करना चाह रही हैं जैसे सदियों से होता रहा है.
मजेदार बात यह है कि हमारी ऊंची जातियों के लोग जब भारत से बाहर जाते हैं और उन के साथ शूद्रों व अछूतों वाला व्यवहार होता है, चाहे रंगभेद के कारण हो या योग्यता के अभाव के कारण, तो वे हल्ला मचाते हैं और बराबरी की दुहाई देते हैं. अभी इंगलैंड में रौयल कालेज औफ जनरल प्रैक्टिशनर्स की सदस्यता के लिए होने वाली परीक्षाओं में अदालतों ने इस तरह की एक शिकायत, जो भारतीय दल के डाक्टरों द्वारा की गई थी, को खारिज कर दिया.
इस परीक्षा में भारतीय मूल के छात्रों के गोरों के मुकाबले चारगुना असफल होने के आसार रहते हैं. भारत से मैडिकल डिगरी लेने और कई साल तक इंगलैंड में अस्पतालों में काम करने के बावजूद इन छात्रों को परीक्षाओं में जब फेल कर दिया जाता है तो वे रंगभेद का रोना रोते हैं, जैसे भारत के पिछड़े व दलित रोते हैं.
असल बात यह है कि नया ज्ञान और नई सोच के लिए जिस मेहनत और बुद्धि की जरूरत होती है वह हर छात्र में हो, जरूरी नहीं. भारत में मैडिकल की शिक्षा पाने के बाद इंगलैंड में नौकरी पाने का अधिकार स्वत: नहीं मिल सकता क्योंकि यूरोपीय कुशलता, सख्त मेहनत, जिम्मेदारी के संस्कार आदि 2-4 साल में हरेक के जीवन का हिस्सा नहीं बन पाते. एक पांव भारत की बैलगाड़ी में रखने वाले, दूसरा पांव रौकेट में रखें तो भी वे बराबर नहीं हो सकते. दरअसल, जो दूसरों से भेदभाव करने के आदी होते हैं वे अपनी कमजोरियों के लिए तुरंत भेदभाव का बहाना ढूंढ़ लेते हैं क्योंकि वे अपराधभाव से ग्रसित होते हैं.
यह नहीं भूलना चाहिए कि दक्ष लोगों से बराबरी करने के लिए या तो कड़ी मेहनत करनी होती है या 2-3 पीढि़यों का अनुभव आदतों में शामिल करना होता है. यदि हम गोरों को कोस रहे हैं और चाहते हैं कि वे बराबरी के सिद्धांतों का पालन करें तो हमें भारत में भी यही करना चाहिए. समाज के विकास के लिए जरूरी है कि हर कोई दक्षता और कुशलता हासिल करने का अवसर पाए और अगड़ों से कंधों को मिला कर चलने का साहस रखे.