सरिता विशेष

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की हार का अनुमान पार्टी को पहले से ही था और उस के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कई साल पहले साफ कह दिया था कि माइनिंग ठेकेदारों को अरबों बनवाने के आरोपों से घिरे उस के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा को पद छोड़ना ही होगा चाहे कर्नाटक भाजपा के हाथ से निकल जाए. भाजपा को उम्मीद थी कि वह 10-20 सीटों को खोएगी पर परिणामों ने 70 सीटें छीन कर उस को सकते में डाल दिया.

भारतीय जनता पार्टी कहती रहे कि यह नुकसान येदियुरप्पा द्वारा अपनी कर्नाटक जनता पक्ष पार्टी बनाने के कारण हुआ पर यह तो पक्का है कि जो वोट येदियुरप्पा को मिले वे भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के तो नहीं थे. येदियुरप्पा किसी भी तरह से महान भारतीय संस्कृति का ढोल नहीं बजा रहे और न ही मुसलिम दलित विरोध की छाप उन में है.

कर्नाटक में जीत कर कांग्रेस में कोई खास खुशी नहीं, सिर्फ संतोष है कि एक और बार पिटने से बचे. कांग्रेस के नेता वैसे ही आरोपों से घिरे हैं. अदालतों में रोज फटकार पड़ रही है और लोकसभा व राज्यसभा में जवाब देने को उन के पास शब्द नहीं रहते. आम जनता बेईमानी के कांडों से त्रस्त है और उस की हालत उस मेमने की तरह है जो शेर के पंजों में फंस गई है. 2014 में कांग्रेस का साथ जनता खुशीखुशी देगी, इस का?भरोसा तो कर्नाटक की जीत भी नहीं दिला सकती.

कर्नाटक में कांग्रेस की सीटें 42 बढ़ गईं पर उसे मतप्रतिशत में केवल 1.86 प्रतिशत की वृद्धि मिली है. यानी भाजपा से परेशान मतदाता भी कांग्रेस पर भरोसा नहीं कर रहे.

कांग्रेस के लिए साल के अंत तक मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़  विधानसभाओं के चुनाव भी चुनौतियां रहेंगे पर कर्नाटक की जीत का मतलब है कि कांग्रेसी चुनावी दंगल में कम से कम मुंह लटका कर नहीं उतरेंगे.

अफसोस की बात है कि चुनावी प्रणाली अच्छे, शरीफ नेताओं को उतारने का काम बिलकुल नहीं कर पा रही. जनता के पास पर्याय नहीं होता या जनता जानबूझ कर बेईमानों का साथ देती है. कुछ भी कहिए पर चुनावी आंच में से जली लकड़ी, जो काली हो चुकी है, निकल रही है, लोहा फौलाद बन कर नहीं निकल रहा. चुनाव सही नेता नहीं, बेईमान व भ्रष्ट नेता पैदा कर रहे हैं. देश का शासन जनप्रतिनिधियों के नहीं क्रूर, दंभी, जनस्वामियों के हाथों में बंध गया है