कालेधन पर यज्ञ का आह्वान करने वाले नरेंद्र मोदी का वादा खोखला और बनावटी है, यह इस बात से स्पष्ट है कि प्रिवैंशन औफ करप्शन ऐक्ट 1988 के तहत सूर्यनारायण मूर्थि बनाम आंध्र प्रदेश मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनजर उन की सरकार कालेधन की शेष शय्या पर निद्रा में हैं और लक्ष्मी उन के पैर दबा रही हैं. इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकारी अफसर पर रिश्वत लेने का अपराध तभी माना जाएगा जब अदालत में यह साबित हो जाए कि उस ने रिश्वत मांगी थी. अगर कोई नागरिक खुदबखुद किसी अफसर को कुछ दे जाए तो यह रिश्वत न होगी, न्यायालय ने व्याख्या की है.

सर्वोच्च न्यायालय ने रिश्वत विरोधी कानून में एक छोटी खिड़की ही नहीं छोड़ी, उस ने चारों ओर की दीवारें ही हटा लीं क्योंकि रिश्वत लेने के किसी मामले में यह साबित करना असंभव है कि रिश्वत कब और कैसे मांगी गई. कोई अफसर लिखित में परचा तो नहीं देगा कि काम कराना है तो 5 लाख रुपए बैंकड्राफ्ट से पत्नी के नाम भेज दो और अफसर परचे पर हस्ताक्षर कर दे.

आमतौर पर रिश्वत के वे मामले पकड़े जाते हैं जिन में नागरिक शिकायत करता है और भ्रष्टाचार विरोधी अफसर निशान लगे नोट संबंधित अफसर को दिलवाते हैं और उसी समय भ्रष्ट अफसर को पकड़ लिया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों में अभियुक्त अफसरों को बरी कर नौकरी पर पुनर्नियुक्त कर दिया है और नरेंद्र मोदी, जो अध्यादेश प्रेमी हैं, कालेधन के नाम पर देश को कतारों में खड़ा तो कर देते हैं, लेकिन इस कानून को ठीक करने की बात तक नहीं कर रहे.

भ्रष्टाचार विरोधी कानून में वैसे भी सजा 6 माह की ही है और अदालतें अफसरों के विरुद्ध यदाकदा ही फैसला देती हैं. यही कारण है देश का कालाधन 8 नवंबर के बाद भी वैसा का वैसा रहा है क्योंकि अफसरों ने तो पुराने नोटों को बैंकरों से मिल कर बिना कमीशन के बदलवा लिया था. उन्हें तो आयकर अफसर भी नोटिस न भेजेंगे और न ही कोई लोकायुक्त या लोकपाल उन का कुछ बिगाड़ सकेगा.

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला कि जब तक रिश्वत मांगी न जाए, रिश्वत नहीं है, सरकारी अफसरों की पहुंच और निडरता का सुबूत है. देश की जनता को हांकने में नेता और अफसर हर रोज और ज्यादा मुखर होते जा रहे हैं.

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