सरकार को जगाने और लालफीताशाही को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया है या कहिए कि फैसला किया है कि नागरिक अधिकार विधेयक के तहत  दिए गए समय के भीतर सरकारी नौकरशाही द्वारा काम पूरा न करने पर नौकरशाहों को जुर्माना भरना होगा. यह विधेयक अन्ना हजारे की 2011 की मांग पर लाया जा रहा है. उस का क्या असर होगा, यह इसी बात से साफ है कि सिर्फ विधेयक लाने में सरकार को 2 साल लग गए और लागू कराने में कितने लगेंगे, पता नहीं.

यह कोरी कागजी बात है कि सरकारी बाबूडम अपने निकम्मेपन के लिए कभी अपनी जेब ढीली करेगा. सरकारी नियम इतने जटिल और ज्यादा हैं कि किसी भी आवेदन को बरसों लटकाना किसी भी बाबू के लिए बाएं हाथ का काम है. सिटीजन चार्टर में चाहे जो मांग रखी जाए, सरकारी चींटियां अपनी गति से ही नहीं चलेंगी, वे हर जगह की चाशनी भी हड़प करती जाएंगी और जनता, अन्ना हजारे और चाहें तो सोनियामनमोहन सरकार भी उस का कुछ नहीं कर सकती.

सरकारों ने देश को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के नाम पर इतने सारे कानून और नियम बना रखे हैं कि उन के बहाने सरकारी दफ्तर चाहे तो कागज 20 साल तक यों ही पड़ा रहे. 15 से 30 दिन में काम पूरा कर देने का कानून लागू करना असंभव  है. जरूरत सरकारी कर्मचारियों पर जुर्माना लगाने से ज्यादा नियम व कानूनों को कम करने और सरकारी अफसरों के विवेकाधिकारों को कम करने की है. ज्यादातर दिक्कतें इसी से आती हैं कि सरकारी दफ्तर किसी भी आवेदन पर सवालिया निशान लगा सकता है.

कागजों और कानूनों में उस के पास सैकड़ों अधिकार हैं जिन की आड़ में वह उल्लू सीधा करने के लिए नएनए नियम, फार्म, प्रक्रियाएं गढ़ सकता है. आमतौर पर बेकार से मामलों में भी आवेदकों से पहचानपत्र, राशन कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट, पड़ोसी की सिफारिश, सरकारी अधिकारी द्वारा सत्यापन जैसी शर्तें जोड़ दी जाती हैं. एक में भी कोई खामी हो, मामला लटका दिया जाता है.

ऐसे में समयबद्ध काम करने के नियम कोरे आश्वासनों से ज्यादा कुछ साबित न होंगे. सरकार में जाने और सरकारी नौकरी या नेतागीरी करने का लाभ ही क्या होगा अगर शासन में रह कर सत्तासुख नहीं पाया? 

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