बिहार चुनावी नतीजे के माने

बिहार चुनाव में पटखनी खाई भाजपा और जीते महागठबंधन के भावी संकेत क्या हैं?

December 5, 2015
सरिता विशेष

फरवरी 2015 में दिल्ली में करारी हार के बाद लगा था कि दिल्ली की जनता से कहीं अनजाने में गलती हुई है कि उस ने सदियों बाद फिर विशुद्ध हिंदू सरकार को एक छोटे से राज्य में उसे इस बुरी तरह हराया कि भारी भीड़ वाली पार्टी पालकी वाली पार्टी बन कर रह गईं. उस के बाद कई और बार कलई खुली कि मई 2014 में हुए आम चुनावों में जो भारीभरकम प्रचार, देशीविदेशी पैसे, ऊंची जातियों वालों की एकजुट आक्रमणता, कांगे्रस के दिमागी दिवालिएपन से भाजपा को जीत मिली थी वह जनता से अनजाने में हुई गलती के कारण थी. बाद के चुनावों में कहीं नाममात्र का बहुमत पाने या कहीं विरोधी पक्ष न होने पर जो विजय भाजपा को मिल रही थीं वे पेशवाई जीतें थीं, शत्रुओं में फूट डाल कर पाई गई थीं.

8 नवंबर, 2015 को बिहार ने पुन: फिर इतिहास लिख दिया और जयप्रकाश नारायण के नारे ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ को फिर जीवित कर डाला. जो हार का कूड़ा नीतीश, लालू और राहुल ने नरेद्र मोदी के दरवाजे पर डाला है वह अप्रत्याशित और राहतकारी दोनों है. पेशवाई राज में जो हाल मराठा राजाओं का ऊंची जाति के देशस्थ ब्राह्मणों ने किया था जबकि सिंहासन पर हक शिवाजी के वारिसों का ही था, वही हाल भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी को आगे कर के देश की स्वतंत्रता, एकता, कानूनों के साथ करना चाह रही थी जिसे पहले अरविंद केजरीवाल ने, फिर ममता बनर्जी ने और उस के बाद अब पूरी तरह नीतीश-लालू-राहुल की तिकड़ी ने कर दिया है. नरेंद्र मोदी ने 2014 के आम चुनावों में जो वादे किए थे वे ऐसे ही थे जैसे सोने की वर्षा के लिए यज्ञ करने या मोटा दान करने के बाद मिलने वाले करते हैं. कोरे थोथे और बेवकूफ बनाने वाले वादों पर दुनियाभर में धर्मगुरु कम से कम 5 हजार साल से राज कर रहे हैं.

1947 के बाद 40-50 साल कांगे्रस ने भी उन्हीं नारों पर राज किया था. भाजपाई नारों में भगवाई अंगोछा और तिलकजनेऊ था तो कांगे्रसी नारों में खादी और गांधी टोपी थी. जनता कांगे्रसी नारों से त्रस्त थी और पहले 1977 में फिर 1988 में उस ने कांगे्रस को सबक सिखाया भी. मई 2014 में वह कांगे्रसी नाली से निकल कर भाजपाई दलदली समुद्र में गिर गई. बिहार की जनता ने नीतीश-लालू-राहुल की संकरी गली में जाना पसंद किया बजाय भाजपाई समुद्र में, जिस में कुछ तो साफसुथरे बजरों में होंगे, बाकी जनता दलदल में खड़े हो कर उसे खेवे. 178 के मुकाबले सिर्फ 58 सीटें पाने के बाद भाजपा चाहे जो सफाई दे, उस की असलियत छिप नहीं सकती. भारतीय जनता पार्टी केवल सुशासन व स्वच्छता की वकालत नहीं कर रही, वह तो संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों की सामाजिक व्यवस्था समाज पर जबरन थोपना चाहती है. उसे शासन से ज्यादा उन रीतिरिवाजों की चिंता है जो देश की 2000 साल की गुलामी की वजह रह  हैं और जिन का लाभ उठा कर ग्रीक, शक, हूण, फारसी, मुगल, अफगान, चीनी, पुर्तगाली, फ्रैंच, ब्रिटिश और अब अमेरिका भारत पर कब्जा जमाते रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने देश से अधिक विदेश की चिंता की. महाभारत के युद्ध में भी कौरव व पांडव अपनी सेनाओं की शक्तियों पर नहीं लड़े, उन्होंने दूरदूर के राजाओं को फुसलाया ताकि भाई, भाई को मार सके. कृष्ण इसी महाभारत के युद्ध के नायक थे और यह वही काल था जिस में एकलव्य, घटोत्कच, शिखंडी, व्यास, कर्ण का जाति या जन्म के कारण अपमान किया गया था.

आज भारतीय जनता पार्टी के लिए लोकतंत्र, संविधान, वैयक्तिक स्वतंत्रताओं, न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रैस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण गीतापाठ, योग, संस्कृत, मंदिरों में पूजन, गो पूजा हैं जिन के लिए उस के समर्थकों के डंडे तैयार हैं और जिन की रक्षा पर आपत्ति करने वालों के लिए जेलें सुरक्षित हैं. नीतीश-लालू-राहुल की तिकड़ी ने और अरविंद केजरीवाल व ममता बनर्जी ने पहले ही संदेश दे दिया था कि धर्म से ऊपर लोकतंत्र है और जनता मुट्ठीभर लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए जिहादी बनने को तैयार नहीं है. बिहार का चुनाव भाजपा की अंतिम हार नहीं है. भाजपा जानती है कि दूसरे पक्ष में कैसे फूट डाली जाए. वह रामविलास पासवान और जीतनराम मांझियों को चारा फेंकने में माहिर है. हारने के बाद पहले ही दिन भाजपा के नेता प्रतिद्वंद्वी नीतीश और लालू में बिखराव की बातें कहते रहे ताकि बारबार बछड़े को गधे का बच्चा कह कर बछड़ा छीना जा सके. गनीमत है कि लोकतंत्र और स्वतंत्र प्रैस थोड़ाबहुत ही बिक सकता है, पूरी तरह नहीं.

नीतीश-लालू-राहुल ने जनता के सामने थाली रख दी है, खाना बनाने की विधि बता दी है. अब यह जनता को देखना है कि वह मंदिर के प्रसाद की ओर भागती है या मेहनत के साथ खाना बनाने में जुटती है.

बिहार चुनावी जंग मुख्य प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश

नीतीश कुमार से टक्कर लेने को पीएम ने पहना सीएम का चोला.

सरिता विशेष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए को खराब बता कर नीतीश कुमार पर सीधा और बड़ा ही तीखा हमला बोला था और उन्हें सीधी लड़ाई की चुनौती दी थी. पिछले कई सालों से दोनों नेताओं के बीच छिपछिप कर एकदूसरे पर वार करने का हथकंडा अब खुल कर सामने आ चुका है. बिहार विधानसभा चुनाव में प्रदेश भाजपा के तमाम बड़े नेताओं को दरकिनार कर नरेंद्र मोदी खुद नीतीश कुमार के साथ दोदो हाथ कर रहे हैं. किसी राज्य के मुख्यमंत्री बनने के लिए किसी प्रधानमंत्री की ऐसी बेचैनी शायद ही कभी देखने को मिली हो. मोदी बिहार जीतने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल कर रहे हैं और तिलमिलाए नीतीश अपने धुरविरोधी लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला कर मोदी को तगड़ी चुनौती दे रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश को हराने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में ‘मुख्यमंत्री’ का चोला सा पहन लिया है. नीतीश को सब से ज्यादा तिलमिलाने का काम नरेंद्र मोदी ने बिहार को 165 करोड़ रुपए के स्पैशल पैकेज देने का ऐलान कर किया है. नीतीश 6-7 सालों से बिहार को स्पैशल राज्य का दरजा देने की सियासी लड़ाई लड़ रहे हैं. मोदी ने बिहार को स्पैशल राज्य का दरजा तो नहीं दिया, बल्कि अलग से स्पैशल पैकेज देने का ऐलान कर नीतीश की सियासत पर पानी फेरने की कोशिश की है. नीतीश बिहार की जनता के सामने यह रट लगाते रहे हैं कि जब तक बिहार को स्पैशल राज्य का दरजा नहीं मिलेगा तब तक बिहार की तरक्की नहीं हो सकती है.

बिहार की बदहाली के लिए वे केंद्र को जिम्मेदार बता कर बिहार में अपने राजनीतिक रास्ते को आसान बनाते रहे हैं. बदहाली और गरीबी के हर मामले को ले कर नीतीश का यही रटारटाया जवाब होता है कि जब तक केंद्र स्पैशल राज्य का दरजा नहीं देगा तब तक बिहार की तरक्की नहीं हो सकती. नरेंद्र मोदी ने उन की मांग को पूरा नहीं किया, क्योंकि मोदी जानते थे कि अगर उन्होंने स्पैशल राज्य का दरजा दे दिया तो उस का सारा क्रैडिट नीतीश के खाते में चला जाएगा और चुनाव के दौरान नीतीश जनता के बीच घूमघूम कर यही कहते कि उन के ही दबाव में मोदी को स्पैशल राज्य का दरजा देने के लिए झुकना पड़ा. नीतीश फिलहाल मोदी के स्पैशल पैकेज को पैकेजिंग साबित करने में लगे हुए हैं.

बिहार का किया अपमान

मोदी ने जब अतिथि का भोज रद्द करने की बात कह कर नीतीश के डीएनए पर सवालिया निशान लगाया तो नीतीश की बौखलाहट और ज्यादा बढ़ गई. अब वे मोदी को जवाब देने के लिए ‘इंदिरा इज इंडिया’ की तर्ज पर खुद को ही बिहार साबित करने पर तुल गए हैं. नीतीश अपनी हर चुनावी सभा में चिल्लाचिल्ला कर कह रहे हैं कि मोदी ने उन के डीएनए को खराब बता कर पूरे बिहार का अपमान किया है. भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह कहते हैं कि चुनाव में अपनी हार की स्थिति बनती देख नीतीश बौखला गए हैं और खुद को ही बिहार समझने का भ्रम पाल बैठे हैं.

दरअसल, बिहार विधानसभा का यह चुनाव नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के लिए करो या मरो वाली हालत में है. नीतीश यह साबित करना चाहते हैं कि साल 2005 और 2010 का विधानसभा चुनाव वे भाजपा के भरोसे नहीं जीते थे, बिहार की जनता में उन की गहरी पैठ है. दलित, पिछड़े तो उन्हें पसंद करते ही हैं, शहरी और अगड़ी जातियों के ज्यादातर लोग भी उन के तरक्की के नारे में यकीन करते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों करारी हार मिलने के बाद नीतीश जीत के लिए किसी भी तरह का दांवपेंच छोड़ना नहीं चाहते हैं. गौरतलब है पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी जदयू को केवल 2 सीटें ही मिलीं, जबकि 2009 के आम चुनाव में जदयू ने 20 सीटों पर कब्जा जमाया था.  यही वजह है कि नीतीश अपने धुरविरोधी नरेंद्र मोदी को उन के ही दांव से उन्हें मात देने में जुटे हैं.

साल 2002 में गुजरात में हुए गोधरा कांड के बाद से नीतीश को लगने लगा कि नरेंद्र मोदी के साथ मंच शेयर करने या उन के साथ फोटो खिंचवाने से उन का मुसलिम वोट छिटक सकता है. नीतीश के करीबी रहे जदयू के एक नेता बताते हैं कि नीतीश कभी मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ा करते थे. मोदी गुजरात की पिछड़ी घांची (धानुक) जाति से और नीतीश बिहार की पिछड़ी कुर्मी जाति से आते हैं. पहली बार जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तो नीतीश का मानना था मोदी भाजपा को ब्राह्मणवाद के चोले से बाहर निकाल सकते हैं. गोधरा कांड के बाद नीतीश ने मोदी से दूरी बनानी शुरू कर दी थी और 16 मई, 2013 को तो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजैक्ट करने के विरोध में नीतीश ने भाजपा से 17 साल पुराना नाता झटके में तोड़ डाला. विधानसभा के इस चुनाव में नरेंद्र मोदी और उन की पार्टी भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है. 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा अकेली 160 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और उस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने 150 सीटों पर जीत का लक्ष्य तय किया है. सरकार बनाने के लिए 123 सीटों की जरूरत होगी. भाजपा की रणनीति यही है कि वह अपने बूते सरकार बना ले, ताकि वह रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा जैसे अति महत्त्वाकांक्षी सहयोगियों को काबू में रख सके. अगर भाजपा अकेले 123 सीटें जीतने में कामयाब नहीं हो पाती है तो उस के सहयोगी बिहार से दिल्ली तक उस की नाक में दम कर के रखेंगे. यही वजह है कि भाजपाइयों को ‘भगवान’ के दरबार में जा कर ज्यादा ही गुहार लगाने की जरूरत पड़ रही है और जनता को पटाने के लिए ज्यादा से ज्यादा चुनावी रैलियां करनी पड़ रही हैं.

साख का सवाल

नरेंद्र मोदी बिहार के चुनाव में 20 सभाओं का आयोजन कर नीतीश और लालू को चुनौती देने में लगे हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले महीने बिहार के गया जिले पहुंचे तो महाबोधि मंदिर जाना नहीं भूले. चुनाव भले बिहार विधानसभा का हो रहा है, लेकिन उस में भाजपा की नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत इज्जत पूरी तरह से दांव पर लगी हुई है. वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र यादव एक वैबसाइट के जरिए कहते हैं कि भाजपा ने सहयोगियों को दरकिनार कर दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी घटक दलों के स्टार प्रचारक हैं और सब के लिए वोट मांगना उन का दायित्व है. लेकिन वे सिर्फ भजपा के लिए वोट मांग रहे हैं. भाजपा के चुनावी होर्डिंग्स में अकेले नरेंद्र मोदी छाए हुए हैं. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी अब साथ नहीं दे रहे हैं. होर्डिंग्स से शाह की तसवीर की भी विदाई दिख रही है. यह भाजपा की रणनीति हो सकती है कि अकेले नरेंद्र मोदी की तसवीर व नाम के भरोसे चुनाव में लालू यादव, नीतीश कुमार व कांगे्रस गठबंधन का मुकाबला किया जाए.

चुनाव में विकास का मुद्दा गौण हो गया है. विकास के दावे बेमानी हो गए हैं. केंद्र व राज्य सरकार के विकास के दावे भी हवाहवाई होते दिख रहे हैं. बस, सब जगह दिख रही है जाति, पार्टी की जाति, उम्मीदवार की जाति, वोटर की जाति. इन्हीं जातियों के जोड़तोड़ के सहारे चुनाव जीतने के गणित गढ़े जा रहे हैं. नरेंद्र मोदी की तसवीर की मार्केटिंग भी ‘जातीय बाजार’ को अनुकूल बनाने की रणनीति है. अब देखना है कि वह कितना असरकारक होती है. नरेंद्र मोदी के बिहार विधानसभा के चुनाव में ज्यादा दिलचस्पी लेने और पसीना बहाने के पीछे जाहिर तौर पर पिछले फरवरी महीने में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव का नतीजा ही है. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने भाजपा को मात्र 3 सीटों पर समेट डाला था. उस चुनाव में अपना मुंह बुरी तरह जला चुकी भाजपा बिहार चुनाव में फूंकफूंक कर कदम रख रही है.

दुश्मन बने दोस्त

मोदी को करारी टक्कर देने के लिए लालू, नीतीश और कांगे्रस ने मिल कर कमर कस ली है. बिहार के पिछड़ेपन की दुहाई देने वाले महागठबंधन के नेता यह भूले हुए हैं कि पिछले 67 सालों तक तो बिहार में महागठबंधन में शामिल पार्टियों का ही राज रहा है  पिछले 10 साल तक नीतीश ने राज किया. उस के पहले के 15 साल तक बिहार लालू के हाथों में रहा और उस के पहले के 42 साल तक कांगे्रस का शासन रहा था. बिहार को कई साल पीछे ढकेलने वाले ही अब ‘बढ़ता रहेगा बिहार, फिर एक बार नीतीश कुमार’ का ढोल पीट रहे हैं. वहीं, नेताओं ने तो ऊपरऊपर गठबंधन कर लिया है पर उन की पार्टियों के कार्यकर्ता पसोपेश में हैं कि वे अपने इलाके के किस का और कैसे प्रचार करें. जदयू के नेता और कार्यकर्ता वोटरों को क्या जवाब देंगे कि ‘जंगलराज’ वाले अब उन के दोस्त कैसे बन गए. अब तक एकदूसरे के खिलाफ आग उगलने वाले राजद, जदयू और कांगे्रस के कार्यकर्ताओं के लिए मिलजुल कर चुनाव प्रचार करने में पसीने छूट रहे हैं. जदयू के कार्यकर्ता रमेश महतो कहते हैं कि उन के इलाके में लोग उन की बात नहीं सुनते हैं. उलटे जनता सवाल पूछती है कि लालू का विरोध कर नीतीश कुमार ने सरकार बनाई थी, अब लालू अच्छे कैसे हो गए?

महागठबंधन से दलितों, पिछड़ों और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वालों का वोट तो एकजुट हो सकता है लेकिन मुलायम सिंह, ओवैसी, पप्पू यादव, तारिक अनवर जैसों के गठबंधन से छिटके नेता महागठबंधन का खेल बिगाड़ कर नरेंद्र मोदी की राह आसान कर सकते हैं. बिहार में 11 फीसदी यादव, 12.5 फीसदी मुसलिम, 3.6 फीसदी कुर्मी, 14.1 फीसदी अनुसूचित जाति और 9.1 फीसदी अनुसूचित जनजाति की आबादी है और गठबंधन के नेताओं को पूरा भरोसा है कि इन का वोट उन्हें ही मिलेगा. गठबंधन के बनने के बाद अब बिहार में उस की सीधी लड़ाई राजग से होनी है. इस से कांटे की लड़ाई के साथ खेल दिलचस्प भी हो गया है. महागठबंधन के पास बिहार को बचाने से ज्यादा नरेंद्र मोदी को रोकने और भाजपा से बचने की छटपटाहट है. पिछले लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनावों के नतीजों के आंकड़े गठबंधन को मजबूत बता रहे हैं. अगर यह वोट एकजुट रहा तो गठबंधन को कामयाबी मिल सकती है.

इन के गठबंधन को एक झटके में बेअसर करार देना किसी भी माने में समझदारी नहीं कही जाएगी क्योंकि इस गठजोड़ के पास वोट है. आज के हालात में भले ही उन का वोट बिखरा और छिटका हुआ हो पर दोनों ने अपनेअपने वोटबैंक को एकजुट करने में पूरी ताकत झोंक रखी है. इस मसले पर नीतीश और लालू बारबार सफाई दे रहे हैं कि नेताओं और पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच कहीं कोई कन्फ्यूजन नहीं है. प्रमंडल स्तर पर कार्यकर्ताओं से रायविचार करने के बाद ही गठबंधन हुआ है. कहीं कोई भी विवाद या खींचतान के हालात नहीं हैं. भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि राजद और जदयू का गठबंधन तेल और पानी को मिलाने की तरह है. लाख कोशिशों के बाद भी तेल और पानी एक नहीं हो सकते हैं. गठबंधन ने लालू को फिर से उठने का मौका दे दिया है जबकि नीतीश के लिए यह सियासी ताबूत की आखिरी कील साबित होगी. सुशील मोदी महागठबंधन की खिल्ली तो उड़ाते हैं लेकिन वे अपने गिरेबान में झांकने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं. महागठबंधन ने तो नीतीश को मुख्यमंत्री का चेहरा बना कर चुनावी मैदान में उतारा है, लेकिन मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम ऐलान करने में भाजपा कन्नी काटती रह गई और सिरफुटव्वल व फजीहत से बचने के लिए नरेंद्र मोदी को ही मैदान में उतार रखा है. नरेंद्र मोदी के चेहरे ने केंद्र में भाजपा को बड़ी कामयाबी दिलाई है और अब भाजपा बिहार चुनाव में भी उसी आजमाए चेहरे के बूते चुनाव लड़ रही है. प्रधानमंत्री के पद को अलग रख मुख्यमंत्री का चेहरा ओढ़े मोदी के कंधों पर ही भाजपा का बेड़ा पार लगाने की जिम्मेदारी है.