सरिता विशेष

कक्षा 10 में पढ़ने वाले शुभम के घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी. वह पढ़ाई में बहुत अच्छा था और अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल आता था. ऐसे में स्कूल का हर अध्यापक उस को बहुत मानसम्मान देता था. शुभम को एक कंपीटिशन में हिस्सा लेने के लिए शहर से बाहर जाना था. प्रौब्लम यह थी कि वहां आनेजाने और रहनेखाने का खर्च, जो कुल मिला कर 20 हजार रुपए के करीब था, उस के परिवार को ही उठाना था. ऐसे में शुभम परेशान था, क्योंकि उसे पता था कि उस के पिता इतने पैसों का इंतजाम कभी नहीं कर पाएंगे. ऐसे में वह निराश था.

शुभम की परेशानी जब स्कूल टीचर महेश प्रसाद को पता चली तो वह शुभम से बोले, ‘‘बेटा, अभी वहां जाने में 6 माह का समय लगेगा. तुम अगर अपने साथियों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दो तो इस खर्च का इंतजाम तुम खुद कर सकोगे और फिर भी अगर कुछ पैसों की कमी हुई तो हम लोग साथ हैं.’’

टीचर की कही बात शुभम को समझ आ गई. अब वह स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगा,जिस से उसे हर माह 3 हजार रुपए मिलने लगे. ऐसे में शुभम के लिए खर्च का पूरा इंतजाम हो गया. यही नहीं, शुभम कंपीटिशन से जो पैसे जीत कर लाया उन से उस ने अपनी फीस के पैसे भिजवा दिए.

यह बात जब उस के पिता को पता चली तो वे बहुत खुश हुए और बोले, ‘‘बेटा, तुम ने तो मेरी मदद कर दी. मैं सोच ही रहा था कि इस बार तुम्हारे स्कूल की फीस कैसे जमा कर पाऊंगा.’’ इस के बाद शुभम ने बहुत मेहनत से अपनी पढ़ाई की, जिस से उसे स्कूल से स्कौलरशिप मिलने लगी. वह तेजी से आगे बढ़ने लगा. जल्द ही उस ने नौकरी कर के अपने पिता की पैसे की कमी को पूरा कर दिया.

जिद और दिखावा न करें

टीनऐज में बच्चों के अंदर दिखावे की भावना ज्यादा रहती है. वे अपने दोस्तों को देखते हैं और फिर उन की ही तरह महंगे ब्रैंड के कपड़े, मोबाइल और बहुत कुछ हासिल करना चाहते हैं. किशोरों को इस तरह के दिखावे से खुद को बचाना चाहिए. उन को ऐसे फैसले से पहले अपने मातापिता की हालत को समझना चाहिए. हर बच्चे के पिता की आर्थिक स्थिति एकजैसी नहीं होती है. ऐसे में जब बच्चे महंगे सामान की जिद करते हैं तो मातापिता उस को पूरा करने की कोशिश करते हैं. कोई भी मातापिता अपने बच्चों का दिल नहीं तोड़ना चाहते. ऐसे में वे अपनी हैसियत से आगे बढ़ कर बच्चों की खुशी को पूरा करने के लिए कई तरह के प्रयास करते हैं, जिस से वे बच्चों की इच्छा पूरी कर सकें.

ऐसे में बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे अपने मातापिता की आर्थिक हालत को देख कर ही अपनी इच्छा को उन पर थोपें. कई बार दोस्तों को देख कर बच्चों के मन में यह खयाल आता है कि वे भी उस की तरह ऐश से रहें. आज महंगाई का दौर है, जिस में बच्चों के मातापिता को तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ता है. अब यह बच्चों पर निर्भर करता है कि वे किस तरह से समझदारी भरे फैसले ले कर किस तरह से पैसे की कमी में डूबे अपने मातापिता की मदद कर सकते हैं. वैसे आजकल के बच्चे काफी स्मार्ट और समझदार हो गए हैं.

मेहनत से करें अपना काम

किशोर उम्र के बच्चों का काम पढ़ाई करना होता है. उन के लिए जरूरी है कि वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें,जिस से वे जल्द से जल्द अच्छी नौकरी पा सकें. किसी भी मातापिता के लिए यह सब से बड़ी गर्व की बात होती है कि उन के बच्चे नौकरी कर के अपने पैसों से उन की मदद करें. अमन उजाला संस्था की प्रमुख प्रिया सक्सेना बच्चों के मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझती हैं. वे कहती हैं, ‘‘किशोर उम्र के बच्चे अपने मांबाप की सब से बड़ी आस होते हैं. वे जब सफलता की तरफ बढ़ते हैं तो मांबाप को बहुत अच्छा लगता है. 22 साल की उम्र में मेरा बेटा जब मुझ से पूछता है कि मां कितना पैसा भेजना है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. मुझे खुद पर और बच्चों पर गर्व होता है. ऐसे में किशोर उम्र के बच्चों के लिए जरूरी है कि वे अपना काम करें, जिस से कम से कम समय में अपने पैरों पर खड़े हो सकें और अपने घरपरिवार की मदद कर सकें.

कई बार कम उम्र में ही किशोर अपने मातापिता की मदद के लिए पार्टटाइम जौब करने लगते हैं. ऐसे में उन की पढ़ाई प्रभावित होती है. बच्चों के लिए जरूरी है कि पहले वे अपनी पढ़ाई को पूरी करें, जिस से उन का भविष्य सुरक्षित हो सके. इस से मातापिता की ज्यादा मदद हो सकती है. पार्टटाइम वर्क तभी करें जब आप को पैसे की बेहद जरूरत हो और कोई दूसरा रास्ता दिखाई न देता हो. कई बार पार्टटाइम काम करने का प्रभाव बच्चों के कैरियर पर पड़ता है, जिस से वे अच्छी जौब नहीं कर पाते. ऐसे में अपना लक्ष्य बनाएं और मेहनत से आगे बढ़ें.

पार्टटाइम जौब सहारा बन सकती है

किशोर उम्र के बच्चे कई तरह की पार्टटाइम जौब्स कर सकते हैं. इस में अपने से छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना,डांस सिखाना, मोमबत्ती बनाना, पेपर बैग बनाना सबकुछ शामिल है. ये काम ऐसे हैं जिन को बच्चे अपने स्कूल के साथ कर अपने मातापिता की मदद कर सकते हैं. ऐसे में जरूरी है कि बच्चों को ऐसे पार्टटाइम जौब से पहले इस की शिक्षा दी जाए कि किस तरह से इन कामों को किया जा सकता है. कई तरह के हुनर बच्चों में होते हैं, वे अपने हुनर से मातापिता की मदद कर सकते हैं. ऐसे बच्चोें को अपने हुनर का कमाल दिखाना चाहिए.

बच्चों के मामलों की जानकार विनीता गुरुनानी कहती हैं कि पार्टटाइम जौब कर बच्चे केवल अपने मातापिता की ही मदद नहीं कर सकते बल्कि वे अपना आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं. ऐसे में बच्चों को पार्टटाइम जौब करनी चाहिए. पार्टटाइम जौब करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि इस से उन की पढ़ाई खराब न हो. कई बार बच्चे पैसे कमाने लगते हैं तो पढ़ाई की तरफ उन का ध्यान नहीं रहता है. इस से बचना चाहिए. पार्टटाइम जौब का मतलब पार्टटाइम जौब होता है. यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कई बार ऐसे बच्चे अपने मातापिता की मदद कर के खुद में जिम्मेदारी का भाव जगाते हैं, जो उन के भविष्य के लिए बहुत अच्छा है.