सरिता विशेष

सरकार ने कालेधन को बाहर निकालने तथा फर्जी या नकली नोटों के प्रचलन को बंद करने के लिए 8नवंबर को 500 तथा 1,000 रुपए के नोट प्रचलन से बाहर कर दिए तो देशभर में नकदी की भारी किल्लत हो गई. लोग बैंकों में नोट बदलने के लिए घंटों कतारों में रहने लगे लेकिन अपनी परेशानी की परवाह किए बिना वे यही कह रहे हैं कि अच्छा है, अब कालाधन बाहर निकल आएगा.

लोगों की इस सोच के प्रतिकूल सरकारी क्षेत्र के सब से बड़े बैंक स्टेट बैंक औफ इंडिया यानी एसबीआई के एक शोध से स्पष्ट हुआ है कि नोटबंदी के बावजूद 25 से 30 फीसदी काला पैसा बाहर नहीं आएगा. इस की वजह है कि लोग आयकर विभाग के डर से सारा पैसा बैंक खातों में जमा नहीं करेंगे.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मार्च, 2016 तक 500 और 1,000 रुपए के नोटों की वैल्यू कुल करेंसी की 24.4 फीसदी थी लेकिन प्रचलन में ये दोनों नोट कुल नोटों के 86.4 फीसदी के स्तर पर थे. मतलब कि सारा कारोबार बड़े नोटों में हो रहा था. मार्च, 2016 तक 500 और 1,000 के 14 हजार 180 अरब रुपए मूल्य की मुद्रा बाजार में थी. उस के बाद सरकार ने लोगों से कालाधन उजागर करने को कहा और30 सितंबर तक उस की आखिरी तिथि तय की. उस अवधि में 65 हजार 250 करोड़ रुपए का कालाधन बाहर निकला जिस में से 30 हजार करोड़ रुपए कर के रूप में सरकार को मिले.

लेकिन एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1978 में जब इसी तरह से नोट बंद कर के कालाधन वापसी का आकलन हुआ या तो पता चला था कि 25 प्रतिशत कालाधन वापस नहीं लौटा. शोध में कहा गया है कि इस बार भी काला धन 25 से 30 फीसदी तक बाहर नहीं आ सकेगा. सरकार ने बैंकों पर सख्ती से लोगों के नोटबंदी के दौरान जमा किए गए पैसे का हिसाब रखने को कहा है ताकि जिस भी खाताधारक का विवरण मांगा जाए वह तत्काल उपलब्ध कराया जा सके. मतलब साफ है कि सरकार नहीं मानेगी और कालाधन हर हाल में लोगों को बाहर करना ही होगा.