हालात और नजारा 26 जून, 1975 सरीखे ही थे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को घोषणा की कि आज रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपए के नोट अवैध हो जाएंगे. इंदिरा गांधी के आपातकाल से तुलना करें तो नरेंद्र मोदी का लगाया यह आर्थिक आपातकाल उस से कमतर नहीं जिस ने आम लोगों का जीना दुश्वार कर के देश भर में हाहाकार मचा दिया.

इंदिरा गांधी के आपातकाल में जहां लोग गिरफ्तारी के डर से घरों में छिपे बैठे थे या महफूज ठिकानों की तरफ भाग रहे थे वहीं नरेंद्र मोदी के आपातकाल में घरों से निकल कर बैंकों के सामने खड़े नजर आ रहे हैं, क्योंकि वे अगर पुराने नोटों के बदले नए नोट या फिर एटीएम से पैसे नहीं निकालेंगे तो रोजमर्रा के खर्चों को चला पाना मुश्किल होगा. इन दोनों आपातकाल में एक और फर्क यह समझ आया कि इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से सहमति ली थी जबकि नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया. उन्होंने सीधेसीधे फरमान जारी कर दिया कि अब पुराने 1000 और 500 रुपए के नोट रद्दी हो चुके हैं और इन का चलन अब गैरकानूनी हो चुका है.

उस आपातकाल में बोलने की पूरी तरह मनाही थी लेकिन इस आपातकाल में बोलने पर आंशिक छूट है, जो हालांकि सोशल मीडिया के हंसीमजाक तक सिमट कर रह गई है, लेकिन हकीकत बेहद कड़वी है कि नोटबंदी के फैसले के पीछे कोई दूरगामी जनहित की बात नहीं है. और इस से वे समस्याएं भी हल होती नहीं दिखतीं जिन का जिक्र प्रधानमंत्री ने किया है.

क्या है नोटों के रद्दीकरण के पीछे छिपी मंशा और लोग क्यों नोटों की हत्या का गुनाह बरदाश्त कर रहे हैं, इसे 1975 के आपातकाल से ही बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. तब लोगों को बताया जा रहा था कि देश में अराजकता है और इस की एक बड़ी वजह बढ़ती आबादी है. लिहाजा इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने नसबंदी का फरमान जारी कर दिया था. लोगों को पकड़पकड़ कर उन की नसबंदी की गई और यह प्रचार भी किया गया कि सारे फसाद, भ्रष्टाचार और परेशानियों की जड़ जनसंख्या विस्फोट है. इसे जैसे भी हो इस पर काबू करना जरूरी है.

लोकतंत्र में कोई ऐसा फैसला जो बड़े जनाक्रोश की वजह बन सकता हो, जारी करने और थोपने से पहले उस के कृत्रिम फायदे जरूर गिनाए जाते हैं. प्रशासनिक स्तर पर दहशत भी फैलाई जाती है, जिस से ‘भय बिन होत न प्रीत’ की तर्ज पर लोग खामोशी से न केवल उसे मान लें, बल्कि सरकार की हां में हां भी मिलाने लगें. वही आज भी दोहराया जा रहा है.

नोटों की हत्या

‘हम जाली नोटों और कट्टरवाद के खिलाफ जंग लड़ने जा रहे हैं इस से

उस लड़ाई को ताकत मिलने वाली है.’ 8 नवंबर की रात 8 बजे राष्ट्र के नाम संबोधन में यह कहते नरेंद्र मोदी ने लोगों को आश्वस्त भी किया कि उन्हें किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इस के बदले उन्हें नए नोट मिल जाएंगे.

भ्रष्टाचार और कालाधन हमेशा ही 2 बड़े मुद्दे रहे हैं जिन से आम लोग त्रस्त रहते हैं. हकीकत में देश में पसरी गरीबी की एक बड़ी वजह यह भी है. 70 के दशक में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, तो लोगों ने उन का भरपूर साथ दिया था.

लोकसभा चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी ने बड़ेबड़े वादे किए थे इन में से जो सब से ज्यादा चला था वह यह था कि अगर विदेशों में जमा कालाधन देश में वापस आ जाए तो हरेक नागरिक के बैंक खाते में 15 लाख रुपए आ जाएंगे.

प्रधानमंत्री बने 2 साल से भी ज्यादा का वक्त गुजर गया और नरेंद्र मोदी से कुछ ठोस नहीं हुआ. जो समस्याएं न तो सड़कों पर झाड़ू लगाने से दूर होती दिख रही थीं, न ही डिजिटल इंडिया के नारे से जिस से देश की 80 फीसदी आबादी को कोई वास्ता था. वे समस्याएं थीं घूसखोरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की, जो नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में और बढ़ीं. आंकड़ों की जबानी देखें तो नोटबंदी के जोखिम भरे पर बचकाने फैसले को चमकाने के लिए दलीलें ये दी गईं कि इस से इन समस्याओं पर न केवल अंकुश लगेगा, बल्कि लोग अगर सब्र रखें तो ये 50 दिनों बाद दूर हो जाएंगी.

यह कैसे हो जाएगी किसी को नहीं मालूम. बात बिलकुल वैसी ही है कि अमावस्या की रात को पीपल के पेड़ के नीचे दीपक रखो, इस से कल्याण होगा. और ऐसे टोटके न करो तो फिर हमें दोष नहीं देना. हम ने तो आंकड़ों के जरिए सबकुछ गिना दिया है.

गिनाया यह गया कि देश की अर्थव्यवस्था में 62 फीसदी हिस्सा कालेधन का है. बड़े नोटों को रद्दी कर देने से घूसखोरी बंद हो जाएगी, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा और नकली नोट चलाने वाले दिक्कत में पड़ जाएंगे. इस से आतंकवाद पर भी लगाम लगेगी और चुनावी भ्रष्टाचार भी खत्म होगा.

लेकिन यह सब चाहिए तो आप को धैर्य रखते त्याग करना पड़ेगा. यह त्याग पीपल के पेड़ के नीचे दीपक रखने जैसा मामूली ही है कि जनता को लाइन में लग कर 1000-500के नोट बदलने होंगे या अपने बैंक खाते में जमा करने पड़ेंगे. इस त्याग के एवज में उन्हें इस 62 फीसदी काली हो चुकी अर्थव्यवस्था से नजात मिलेगी जो गरीबी की बड़ी वजह है.

यह वह वक्त था जब 45 फीसदी टैक्स चुका कर कालाधन सफेद करने की योजना दम तोड़ चुकी थी, जिस में महज 65,000 करोड़ रुपए ही सरकारी खजाने में जमा हुए थे यानी धनकुबेरों ने इसे खारिज कर दिया था. 9 नवंबर को ही लोगों के सामान्य ज्ञान में यह बढ़ोतरी हो गई थी कि कालेधन के खिलाफ इस सर्जिकल स्ट्राइक की बड़ी वजह बड़े नोटों की भरमार है. इस वक्त देश में कुल 17 लाख करोड़ रुपए की करैंसी में 6.7 लाख करोड़ 1000 के और 8.2 लाख करोड़ रुपए 500 के नोट हैं जो पूरी करैंसी का लगभग86 प्रतिशत होते हैं. यह बात भी मोदी ने पत्रकारों को जोर दे कर गिनाई कि 145 लाख करोड़ रुपयों की भारतीय अर्थव्यवस्था में नोटों का प्रसार या प्रवाह केवल 16 लाख करोड़ रुपए का है और पूरी करैंसी का महज 3 फीसदी 4 करोड़ लोगों के पास है.

विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी ये आंकड़े बहुत ज्यादा विश्वसनीय नहीं माने जा सकते, जिन से आम लोगों को कोई खास लेनादेना नहीं था कि इस आर्थिक आपातकाल की जनप्रतिक्रिया हिंसात्मक न हो, इसलिए सरकार ने इस बात का पूरा खयाल रखा कि जरूरी सेवाओं में एक झटके में गैरकानूनी घोषित कर दिए गए नोटों को चलन में रखा जाए. इसलिए पहले परेशानी खड़ी कर लोगों को यह बताया जाने लगा कि वे पैट्रोल पंपों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, हवाई अड्डों और अस्पतालों में नोट चला सकते हैं और फलां तारीख तक इन्हें सहूलियत से बदल सकते हैं. सरकार मुस्तैदी से सारे इंतजाम कर रही है.

इन इंतजामों की पोल जल्द ही खुल गई और यह भी साबित हो गया कि सरकार ने कितनी अदूरदर्शिता और नादानी से यह फैसला लिया है. तकनीकी कारणों से एटीएम मशीनों में नए नेट नहीं डाले जा सकते, इस बात ने अफरातफरी और बढ़ा दी.

पहले खुश बाद में रुठे

11 नवंबर तक आम लोग बेहद खुश थे, क्येंकि नसबंदी की तरह उन्हें नोटबंदी के फायदे गिनाए जा रहे थे कि देखो सारी नकदी जो बड़े नोटों की शक्ल में है, पूंजीपतियों की तिजोरियों में कैद है, उसे निकालने के लिए यह फैसला जरूरी था. आम लोग इस से खुश हुए जो दरअसल में धनाढ्यों के प्रति सनातनी ईर्ष्या थी. इसे भावनात्मक रूप से भुनाया गया.

यह दांव ज्यादा नहीं चला. 3 दिन लोगों ने रईसों को कोसा, लेकिन चौथे दिन से ही उन्हें समझ आने लगा कि वे अच्छे दिनों के नारे की तरह छले गए हैं. रईस तो पूरे ठाट और शान से अपने आलीशान बंगलों में मौज कर रहे हैं और यहां हम अपनी गाढ़ी और मेहनत की कमाई के नोटों की लाश ढोते परेशान हो रहे हैं. सारे त्याग और धैर्य हमारे हिस्से में ही क्यों डाल दिए गए और इस से हमें मिल क्या रहा है. वह कथित कालाधन भी जहां रहा होगा मर गया उस से हमें क्या, अमीरों के घर में ही नोटों की लाश होती और हमारे नोट जिंदा रहते तो बात एक दफा समझ आती.

15 नवंबर तक आम लोगों खासतौर से गरीबों ने जिंदगी के जो बेहद कठिन दिन देखे वे किसी सुबूत के मुहताज नहीं. हालत यहां तक रही कि बदइंतजामी के चलते पेट की आग बुझाने के लिए गरीबों ने 500 का नोट 300 में और 1000 का नोट 800 रुपए में बेचा. एक झटके में नोटों की कीमत गिर गई. मुद्रा का ऐसा अवमूल्यन दुनिया में पहले कहीं देखने में नहीं आया था.

लोगों को यह भी समझ आया कि जिन बड़े नोटों को परेशानियों, जमाखोरी और गरीबी की वजह बताया जा रहा था सरकार तो उस से भी बड़े नोट चलाने जा रही है और क्या नए नोटों से घूसखोरी बंद हो जाएगी? क्या अब नामांतरण के बाबत पटवारी को रिश्वत नहीं देनी पड़ेगी? क्या अब पुलिस वाले बेवजह डंडे बरसाना बंद कर देंगे और रिपोर्ट लिखने के लिए घूस नहीं मांगेंगे? क्या महंगाई कम हो जाएगी? क्या इस से हमारी आमदनी बढ़ जाएगी? ऐसे सैकड़ों सवालों से लोग बैचेन हो उठे और फिर खुद ही उन के जवाब ढूंढ़ लिए कि नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा. हम एक बार फिर दिनदहाड़े ठगे जा चुके हैं.

अमेरिका के नए राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की तरह वैश्विक नेता की इमेज बनाने पर उतारू हो आए नरेंद्र मोदी ने कुछ नहीं देखा,जिन्हें मालूम है कि देश के लोग बेहद डरपोक और भक्त टाइप के हैं जिन्हें दवा की खुराक की तरह निश्चित अंतराल पर वादों और झुनझुनों की अफीम चटाते रहो तो वे फिर सुस्त पड़ जाते हैं.

लेकिन तेजी से एक सवाल आम लोगों द्वारा यह भी किया जाने लगा कि क्या गारंटी है कि नोट या करैंसी माफिया नए नोटों की नकल नहीं करेगा या नहीं कर पाएगा और यह कालाधन दरअसल में होता क्या है. इस वक्त तक सोशल मीडिया पर अर्थशास्त्र का ज्ञान बहुत फैल चुका था. दूसरी तरफ एक छोटा ही सही एक और वर्ग सक्रिय था, जो बारबार कह रहा था कि देखते तो जाओ यह मोदीजी का मास्टर स्ट्रोक है, इस से धनकुबेर कराहने लगेंगे. आप मोदी का साथ तो दो फिर देखो कैसे पैसा बाहर आता है.

इस मामले में भी राष्ट्रभक्ति को यह कहते घसीटा गया कि क्या देश के लिए आप कुछ दिनों की परेशानी नहीं झेल सकते. इधर परेशानियां झेल रहे लोगों को यह ज्ञान भी प्राप्त हो गया था कि अच्छी बात तो यह है कि सरकार उन के पैसे छुड़ा नहीं रही, यह कम मेहरबानी की बात नहीं. इस आर्थिक आपातकाल को सहन कर तो लिया गया, लेकिन साफ यह भी दिख रहा है कि लोग अपनी भड़ास निकाले बगैर मानेंगे नहीं.

हकीकत बताई गोविंदाचार्य ने

कालेधन की परिभाषा और उदाहरणों के द्वंद में फंसे लोगों को यह भी समझ आ गया था कि दरअसल में यह कोई तकनीकी कदम या व्यवस्था नहीं है, बल्कि कालेधन के खिलाफ एक अस्थाई स्थगन आदेश है जिस की मियाद 30 दिसंबर, 2016 तक की है.

तमाम उमड़तीघुमड़ती शंकाओं और सवालों के जवाब कभी भाजपा के थिंकटैंक और आरएसएस के मुख्य चिंतक गोविंदाचार्य ने बिना किसी डर या लिहाज के पेश कर दिए. अभी तक जो बातें कहेसुने और अंदाजों पर की जा रही थीं उन्हें गोविंदाचार्य ने तर्क और उदाहरणों सहित प्रस्तुत किया.

बकौल गोविंदाचार्य इस कदम से महज 3 फीसदी ही कालाधन वापस आ पाएगा और इस के कोई दूरगामी नतीजे नहीं निकलने वाले, यह केवल चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा. भारत में साल 2015 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 20 प्रतिशत अर्थव्यवस्था काले बाजार के रूप में मौजूद थी, जो साल 2000 के वक्त 40 फीसदी तक थी यानी यह धीरेधीरे घटते हुए 20 फीसदी तक पहुंची है. 2010 में भारत की जीडीपी 150 लाख करोड़ थी यानी उस साल देश में 30 लाख करोड़ रुपयों का कालाधन पैदा हुआ. इसी आधार पर अंदाजा लगाएं तो 2000 से ले कर 2015 तक कम से कम 400 लाख करोड़ रुपयों का कालाधन निर्मित हुआ.

एक सटीक दलील गोविंदाचार्य ने यह दी कि अगर रिजर्व बैंक के इस आंकड़े को सच मान भी लिया जाए कि मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपए के नोटों का कुल मूल्य 12लाख करोड़ था जो देश में उपलब्ध 1 रुपए से ले कर 1000 तक के नोटों का 86 फीसदी था यानी यह मान लें कि देश में मौजूद सारे 500 और 1000 के नोट कालेधन की शक्ल में जमा हो चुके थे, यह असंभव बात है और इस के बाद भी बीते 15 सालों में जमा हुए 400 लाख करोड़ रुपए कालेधन का यह सिर्फ 3 फीसदी होता है.

गोविंदाचार्य की इस व्याख्या ने लोगों के इस अंदाज या खयाल को पुख्ता ही किया कि लोग कालेधन से सोनाचांदी, हीरेजवाहरात और जमीनजायदाद जैसी कीमती चीजें खरीद लेते हैं, क्योंकि ये चीजें नोटों से ज्यादा सुरक्षित होती हैं.

अपनी बात को और सहज बनाते और उस में दम लाते गोेविंदाचार्य ने कहा कि जो कालाधन उपरोक्त मदों में बदला जा चुका है, उस पर 500 और 1000 के नोटों को खत्म कर देने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

नरेंद्र मोदी के इस आर्थिक आपातकाल की धज्जियां और फैसले का मखौल उन्होंने यह कहते भी उड़ाया कि दरअसल में कालाधन, घूस लेने वाले राजनेताओं, अफसरों और कर चोरी करने वाले बड़े व्यापारियों के अलावा नाजायज तरीके से धंधा करने वाले माफियाओं के पास रहता है. ये लोग बनती कमाई को नोटों की शक्ल में नहीं रखते हैं, बल्कि उपरोक्त चीजों में लगा देते हैं.

फिर सरकार कौन से कालेधन की बात कर लोगों को बहला रही है. यह बात वाकई सिरे से किसी की समझ में नहीं आ रही. वजह, नोट बदलने वाले पूरे सौ फीसदी लोग वे लोग थेजिन के पास एक नंबर का पैसा था. ये वे लोग थे जिन्होंने कुछ हजार या 4-5 लाख रुपए तक जमा कर रखे थे, जो अब यह सोचते नोटों की लाश के पास मातम मना रहे हैं कि क्या मेहनत से पैसा कमाना गुनाह हो गया है.

गोविंदाचार्य की इस बात से भी सभी सहमत दिखे कि इस फैसले से आम लोगों को सुविधा नहीं होगी. यह फैसला लोगों की आंखों में धूल झोंकने वाला है और देश को 500और 1000 के नोटों को छापने में लग चुके धन का भी नुकसान है.

सरकारी तैयारियों की खामियां उजागर हुईं तो नई करैंसी को छापने से ले कर लागू करने तक का खर्च कितने हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया, इस का विवरण आना अभी बाकी है. अंदाजा भर लगाया जा सकता है कि इस में 20 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा खर्च होंगे जिस की मार भी आखिरकार आम आदमी को ही झेलना पड़ेगी.

तय है महंगाई और बढ़ेगी कई जरूरी चीजों की कमी बाजार में दिखने लगी है, क्योंकि नकदी आधारित अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह थम सा गया है. नए बजट में टैक्स बढ़ाना सरकार की मजबूरी हो जाएगी वह भी उस सूरत में जब वह खुद के खर्च कम करने के बजाय और बढ़ा रही है. राष्ट्रपति और सांसदों का वेतन बढ़ाया जा चुका है और उसी अनुपात में भत्ते भी बढ़ाए जा चुके हैं. ऐसे में महंगाई तो दूर की बात है कालेधन, भ्रष्टाचार या घूसखोरी से राहत की बात सोचना भी बेवकूफी की बात है.

फिर भावुकता की खुराक

जब अफरातफरी मची और बगावत के आसार नजर आने लगे तो 13 नवंबर को फिर नरेंद्र मोदी ने गोआ में आयोजित एक कार्यक्रम में पुराना नुसखा आजमाया जो उम्मीद के मुताबिक ज्यादा कारगर साबित नहीं हुआ. गोआ में हैरतअंगेज तरीके से उन्होंने कहा, ‘मैं जानता हूं कि कैसेकैसे लोग मेरे खिलाफ हो जाएंगे. मैं 70 साल का उन को लूट रहा हूं, वे मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे, मुझे बरबाद कर के रहेंगे, उन को जो करना है करें.’

यहां उन्होंने, ‘‘भाइयो और बहनो (बकौल एक व्हाट्सऐप मैसेज जिसे सुन दहशत सी आ जाती है) सिर्फ कुछ दिन मेरी मदद करो, इस के बाद आप को सपनों का भारत मिलेगा.30 दिसंबर के बाद गलती निकल आए तो मैं सजा के लिए तैयार हूं. कालेधन पर सरकार का यह पहला वार है, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.’’

जाहिर है नरेंद्र मोदी न केवल खिसिया गए हैं, बल्कि घबरा भी गए हैं और लगता ऐसा है कि वे नोटों की मौत से दुखी लोगों को प्रवचन यह दे रहे हैं कि आत्मा कभी नहीं मरती शरीर बदल लेती है यानी आप की 2-5 हजार की मुद्रा मरी नहीं है उस ने रंगरूप बदल लिया है इसलिए उस का शोक मत करो.

गोआ से एक नया बचकाना झुनझुना बेनामी जायदादों पर कानूनी शिकंजा कसने का उन्होंने थमाया. शायद ही कानून का कोई जानकार बताए कि बेनामी जायदाद क्या और कैसी होती है. जो बताई जा रही है उस के मुताबिक 2 से ज्यादा संपत्तियां रखना अपराध की श्रेणी में आएगा तो साफ दिख रहा है कि आर्थिक आपातकाल को पूरी तरह आपातकाल में बदलने की बात की जा रही है. क्योंकि इस से वाकई लोग और परेशान हो जाएंगे. संभावित विद्रोह को रोकना जरूरी हो जाएगा कि इंदिरा और संजय गांधी के नक्शेकदम पर चला जाए और गरीबों को बहलाया जाता रहे कि इत्मीनान रखो, अमीर तुम्हारी गरीबी की वजह है जिन से कार्ल मार्क्स के उसूलों पर चलते रौबिनहुड की तरह पैसा छुड़ा कर तुम्हें दिया जाएगा.

यह ठीक पंडेपुजारियों जैसा वादा भी है कि बस पूजापाठ करते रहो तमाम दुख दूर हो जाएंगे और मोक्ष मिल जाएगा यानी धर्म को अर्थ का जामा पहना कर अच्छे दिन लाने की बात कही जा रही है जिस की और भारी कीमत चुकाने के लिए लोगों को तैयार रहना चाहिए. कल को मुमकिन है नया फरमान आ जाए कि अपने घर में रखे सोने का हिसाब दो. महंगा, फर्नीचर और इलैक्ट्रौनिक आइटम सरकार के पास जमा करा दो. इस से गरीबी बढ़ रही है और असल कालाधन यही है. सार यह कि जैसे भी हो, सब को गरीब कर दो, जिस से न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.            

मजबूरी में जनता

लखनऊ का गोमतीनगर इलाका बेहद पौश इलाका है. यहां विरामखंड में डाक्टर प्रभा अपने पति नीलेश के साथ रहती हैं. 65 साल की डाक्टर प्रभा के 2 बेटे हैं. दोनों जरमनी में रहते हैं. वहां बड़ा बेटा इंजीनियर और छोटा बेटा डाक्टर है. बडे़ बेटे की शादी हो चुकी है और छोटा बेटा शादी की तैयारी में है. डाक्टर प्रभा और नीलेश बेटों के पास जरमनी रहने नहीं जा रहे, क्योंकि वे अपने घर को छोड़ना नहीं चाहते. डाक्टर प्रभा केंद्र सरकार के संस्थान में काम करती थीं. उन के पति हैल्थ विभाग में मैडिकल औफिसर के रूप में रिटायर हुए. घर में पतिपत्नी ने अपनी मदद के लिए 2 नौकर रखे हुए हैं. जिन में से एक खाना बनाने और दूसरा घर के दूसरे काम करता है.

सुरक्षा की नजर से डाक्टर प्रभा अपने पास कैश में पैसा कम ही रखती थीं. जो पैसा होता भी था वह 500 और 1000 के नोटों में होता था. पतिपत्नी अपनी मिलने वाली पैंशन को बैंक के खाते में ही रखते थे. कभी जरूरत होती थी तो बेटे भी बैंक के खाते में ही पैसे भेजते थे. डाक्टर प्रभा ने बताया, ‘‘8 नवंबर को जिस दिन बड़े नोट सरकार ने बंद कर दिए उस दिन मेरे पास केवल 400 रुपए के छोटे नोट थे. यह एक दिन का भी खर्च नहीं था. अब मेरे पास परेशानी आ गई. बडे़ नोटों में मेरे पास 10 हजार रुपए थे. अगले दिन उन को बैंक में जमा करा दिया. बैंक में पैसा जमा कराना जो सरल था पर निकालना मुश्किल था.’’ 

डाक्टर प्रभा कहती हैं, ‘‘मैं नौकर को साथ ले कर बैंक  गई. चैक से केवल

10 हजार रुपए निकाल सकी. बैंक वाले ने बताया कि सप्ताह में 20 हजार ही निकाल सकते हैं. मैं ने जब से बैंक में खाता खोला यह पहली बार हुआ. अगले दिन अपने पति को भेजा तो उन के खाते से 10 हजार रुपए निकाले. मेरे पति जब लाइन में लगे तो उन को अपना पैसा निकालने में 3 घंटे लाइन में लगना पड़ा. मुझे 2 घंटे लगना पड़ा था. हम बूढे़ लोग हैं. हमें अपनी जरूरत के लिए पैसे पास में रखने पड़ते हैं. इस के लिए कई बार लाइन में लग कर पैसे निकाले. ऐसे जब जरूरत होती थी एटीएम से निकाल लेते थे. नोटबंदी के बाद बैंकों के एटीएम बंद हो गए.’’ 

कामकाजी महिलाओं की परेशानी

नेहा कालेज में टीचर है. लखनऊ में अलग हौस्टल में रह कर अपनी नौकरी करती है. नोट बंद होने के समय उस के पास केवल 300 रुपए थे. इस के अलावा 1000 और 500 के ही एकएक नोट रखे थे. इस के अलावा उस का काम बैंक के डैबिट कार्ड से चलता था. वह बताती है, ‘‘स्कूल से छुट्टी नहीं मिल रही न तो बैंक में पैसा जमा करा पा रहे हैं और न ही एटीएम से. ऐसे में मैं ने वहां खाना खाना शुरू किया जहां पर डैबिट कार्ड से भुगतान हो रहा था. ऐसे में जो चाय, नाश्ता और खाना की कीमत बढ़ गई. मेरे पास जो पैसे थे वह आटो और रिक्शा को ही देने में खत्म हो गए.’’

नेहा बताती है, ‘‘मेरे स्कूल में हौस्टल में रहने वाले बच्चे परेशान हैं. उन के पास भी छुट्टे पैसे नहीं रह गए थे. ये लोग अपने खर्च के लिए परेशान हो गए. इन के पास जो एटीएम कार्ड थे वे सही तरह से चल नहीं रहे थे. खाते में पैसा होने के बाद भी लोग परेशान हुए. अगर सरकार ने बड़े नोट बंद करने के पहले छोटे नोट बाजार में जरूरी तादाद में डाले होते तो यह परेशानी जनता को नहीं होती. सरकार ने 2 हजार रुपए का नोट दिया उस के खुले पैसे मिलने मुश्किल हो गए. इस से लोग नाहक परेशान हो गए.’’  नेहा ने बताया कि 10 बार वह पैसे निकालने के लिए लाइन में लगी तब चौथे दिन जा कर उस को 2 हजार रुपए मिल सके.   

घट रही खरीदारी

ऐसी परेशानी केवल शहरी इलाकों में ही नहीं है, गांवों में भी बुरा हाल है. निगोहां गांव के रहने वाले रामकुमार बताते हैं, ‘‘गेहूं की बोआई के लिए धान की फसल बेच कर हम अपना काम चलाते हैं. नोटबंदी से पहले धान की खरीद करने वाला आढ़तियां 1400 रुपए प्रति क्ंिवटल की दर से खरीद कर रहा था. नोटबंदी के बाद अनाज के खरीदार कम हो गए. सरकारी खरीद केंद्रों में दूसरी परेशानियां थीं. ऐसे में कुछ लोगों ने धान की खरीद 900 रुपए प्रति क्ंिवटल कर दी. अब मजबूरी में किसान को अपना धान कम पैसे में बेचना पड़ रहा है, क्योंकि धान बेच कर ही गेहूं की बोआई की जा सकती थी.’’ 

भारतीय किसान यूनियन लखनऊ उत्तर प्रदेश के प्रवक्ता आलोक कुमार सिंह कहते हैं, ‘‘केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के अचानक बडे़ नोट बंद करने की घोषणा से सब से अधिक प्रभाव गरीब और मजदूर वर्ग पर पड़ा है. गरीब लोगों के सामने राजमर्रा की जरूरतों के लिए नकदी की कमी आ गई. वहीं दिहाड़ी मजदूरों को काम मिलने में परेशानी आने लगी. इस से ये लोग भूखों मरने की कगार पर पहुंच गए. इस के अलावा किसान रबी की फसल की बोआई के वक्त बीज, खाद, कीटनाशक जैसी जरूरी चीजे नहीं खरीद पा रहा है. बोआई के जिस समय किसान को अपने खेत में होना चाहिए था उस समय वह ग्रामीण बैंकों, जिला सहकारी बैंकों, सहकारी समितियों व दुकानों के बाहर लाइन में खड़ा है. किसान को 4 बोरी खाद और बीज नहीं मिल पाया. नोट बंद करने से पहले सरकार को इन विषयों और सामाजिक हालात को ध्यान में रखना चाहिए था. भारत कृषि प्रधान देश है. खेती प्रभावित होने से इस का असर फसल की पैदावार पर पड़ेगा और देश में खाद्यान का संकट खड़ा हो जाएगा.’’

उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के प्रांतीय अध्यक्ष व पूर्व सांसद बनवारी लाल कंछल कहते हैं, ‘‘नोट के बंद हो जाने के बाद से देश का 95 प्रतिशत ईमानदार नागरिक परेशान हो रहा है. बैंकों के सामने सैकड़ों लोगों की लाइन लगी देखी जा सकती है. अपना ही पैसा लेने के लिए लोग भूखेप्यासे लाइन में लगे हैं. यह देश की जनता के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. भारत सरकार को ऐसे कदम उठाने से पहले समस्या के समाधान पर विचार करना चाहिए था. सरकार ने जल्दबाजी में यह फैसला किया. इस तरह की समस्या आगे बढे़गी. छोटा कारोबारी इस से बहुत परेशान हो रहा है.’’ 

वे आगे कहते हैं, ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बारबार कहते हैं कि नोटबंदी के बाद देश की आम जनता चैन से सो रही है. एक बार बैंकों में लगी लाइनों पर नजर डालें तो बात साफ हो जाती है कि परेशान कौन है? प्रधानमंत्री बारबार देश के कारोबारियों पर हमला बोल रहे हैं. सच तो यह है कि देश का 80 फीसदी कालाधन नेताओं और अफसरों के पास है. इन पर प्रधानमंत्री कोई भी टिप्पणी नहीं करते हैं. यह उचित नहीं है. बैंकों के सामने कोई भी बड़ा आदमी लाइन में नहीं लगा है. बैंकों के सामने मजदूर, किसान, गृहिणी, बिजनेसमैन, कारोबारी, बूढे़ और कर्मचारी लाइन में लगे हैं.’’ 

परेशान गृहिणियां

महिला कारोबारी नेता रजिया नवाज कहती हैं, ‘‘बिना फुटकर पैसे के घर का खर्च नहीं चल पा रही. सब्जी, दूध, मसाले, आटा, चावल खरीदने के पैसे नहीं हैं. बीमार लोगों के लिए दवा के पैसे नहीं हैं. अस्पताल वाले चैक लेते हैं पर जो लोग डाक्टर को उन की क्लीनिक में दिखाने जाते हैं तो वहां नकद पैसे नहीं लिए जाते. सर्दी, बुखार और ऐसी ही बीमारी में डाक्टर को नकद पैसे चाहिए होते हैं. जिस का इंतजाम करना मुश्किल हो गया. मेरी जानने वाली एक महिला एक दिन आंख टैस्ट कराने डाक्टर के पास गई. डाक्टर की फीस 400 रुपए थी. फीस देना उन के लिए मुश्किल हो गया. डाक्टर ने उन को बाद में पैसे देने के लिए कहा तब उन की आंखों का टैस्ट हो सका.’’

रजिया कहती हैं, ‘‘सब से ज्यादा परेशान गृहिणियां हैं. एक तो उन के बचत के पैसे को सरकार कालाधन सा मान बैंक में जमा करने को कह रही है. दूसरी ओर घर के छोटे कामों के लिए फुटकर पैसों की जरूरत होती है. ऐसे में उन्हें अपनी जरूरत के लिए पैसे नहीं मिल पा रहे. ऐसे में गृहिणियों के परेशान होने से सरकार के खिलाफ बड़ा माहौल बन रहा है. सरकार को इस बात का अंदेशा है यही वजह है कि वह प्रधानमंत्री

नरेंद्र मोदी की मां के बैंक में जाने व नोट लेते हुए फोटो दिखाए गए, जिस से लोगों में नाराजगी कम हो जाए. इस के बाद भी गृहिणियों की नाराजगी कम नहीं हो रही है. उन का कहना है कि मोदीजी की मां को अपने पैसे निकालने के लिए लाइन में क्यों लगना पडे़ और हम गृिहणियों को भी क्यों लाइन में लगना पडे़.                  

 साथ में शैलेंद्र सिंह

नोटबंदी पर सिकुड़ी सियासत

कमजोर और बिखरा विपक्ष अकसर सत्तारूढ़ दल को निरंकुश बना देता है,

 यह बात नोटबंदी के फैसले से उजागर हुई. एक बेहद संवेदनशील और अहम मुद्दे पर कांग्रेस सहित तमाम क्षेत्रीय दल एकदूसरे का मुंह ताकते नजर आए कि क्या करें, अपना रुख उन्होंने जनता का मूड भांपते तय किया तो यह नरेंद्र मोदी को राहत देने वाली बात थी, क्योंकि इस मसले को विपक्ष न उगल पाया और न ही निगल पाया. तात्कालिक प्रतिक्रिया यह आई कि इस फैसले का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से गहरा ताल्लुक है और घाटे में बसपा रहेगी, क्योंकि मायावती के पास अरबों की नकदी बड़े नोटों की शक्ल में है. इस कथित आरोप को धता बताते मायावती ने कहा इस फैसले से आम लोगों खासतौर से गरीबों को तरहतरह की तकलीफें उठानी पड़ रही हैं. इस बाबत उन्होंने कुछ उदाहरण भी गिना दिए.

यही कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी ने कहा तो सपा की तरफ से मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने कुछ छूटें देने की मांग नरेंद्र मोदी से की. तुक की बात पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कही कि वे कालाधन बरामद करने के खिलाफ नहीं पर इस फैसले से देश में आर्थिक अराजकता का माहौल बना है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल किसी घोटाले की तरफ इशारा करते नजर आए तो उन के गुरु समाजसेवी अन्ना हजारे ने इसे साहसिक कदम बताते केंद्र सरकार की तारीफों में कसीदे गढ़ डाले.

चौंका देने वाली एक प्रतिक्रिया शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने दी. उन्होंने कहा कि कहीं ऐसा न हो कि लोग सरकार के खिलाफ ही सर्जिकल स्ट्राइक कर दें.

जाहिर है इन में से कोई दल जरूरत के मुताबिक आक्रामक नहीं हो पाया तो उस की वजह शुरू में आम लोगों का इस फैसले से इत्तेफाक रखना था. जैसेजैसे लोगों को हकीकत समझ आई वैसेवैसे विपक्षी दल भी रंग बदलते नजर आए और उन का सारा फोकस लोगों की परेशानियों के इर्दगिर्द सिमटा रहा जो मोदी और उन की सरकार सहित भाजपा को भी राहत देने वाली बात थी. लेकिन साफ दिख रहा है कि जोशजोश में सत्तारूढ़ दल के कप्तान ने अपने ही पाले में गोल मार दिया है. रही बात चुनावी भ्रष्टाचार रोकने की तो लग नहीं रहा कि पूंजीपतियों की तरह राजनीतिक दलों पर इस फैसले से कोई खास फर्क पड़ेगा.