कुछ समय पहले तक गांव, कसबे और शहर में मेहतरमेहतरानियों द्वारा सिर पर मैला उठा कर ले जाने और फिर दोबारा हाथ धोपोंछ कर घरों से रोटी ले जाने के दृश्य आम थे. नाई द्वारा दलितों के बाल काटने व दुकानदार द्वारा इन्हें चाय देने से मना करने जैसे विवाद भी आम थे.

आजादी के बाद बने कानूनों और बदलती सोच के चलते पिछले 15-20 सालों से इस सामाजिक विभाजनकारी व अन्यायी व्यवस्था के ये दृश्य कम हो गए थे.

आज पूरी दुनिया में वर्ग विभाजन के विरुद्घ संघर्ष चल रहा है, सामाजिक, आर्थिक बराबरी वाले समाज की ओर कदम बढ़ाने की ताकीद की जा रही है, लेकिन विश्वगुरु बनने का दावा करने वाले भारत में समाज को फिर से खंडखंड करने के कायदे रचे जा रहे हैं. पहले से ही गहरी धार्मिक, जातिगत विषमताओं वाले भारतीय समाज में विभाजन की खाई और बढ़ाने की तैयारी हो गई है.

सरकार ने कालाधन, भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर कैशलैस सोसाइटी बनाने की घोषणा कर के देश में एक नए सामाजिक विभाजन की नींव डाल दी है. कैशलैस सोसाइटी एक नई तरह की वर्णव्यवस्था है. धार्मिक, आर्थिक, कौर्पोरेट राजपुरोहितों की सलाह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रचित मनीस्मृति में साफतौर पर मनुस्मृति की पे्ररणा की झलक दिखाई दे रही है.

कैशलैस सोसाइटी के इस नए वर्णभेदी समाज में बाकायदा ऊंचनीच, भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार, हुक्कापानी बंद करने, रोटीबेटी के संबंध न रखने जैसे खाप पंचायती फैसलों की पक्की व्यवस्था है.

ठीक उस तरह जैसे मनुस्मृति की वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण को श्रेष्ठ बताया गया है. लिखा है,

उत्तमांगोद्भवाज्ज्यैष्ठयाद

ब्रह्मणश्चैव धारणात्,

सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मण: प्रभु:

        (मनुस्मृति – 1-88)

अर्थात् वेद पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ कराना, करना, दान देना और लेना, इन कर्मों को ब्राह्मणों के लिए बनाया है.

अब नई कैशलैस सोसाइटी में ऊंचे वे लोग होंगे जो पढ़नेपढ़ाने, डैबिटक्रैडिट कार्ड, पेटीएम, इंटरनैट, मोबाइल बैंकिंग द्वारा संस्कारी होंगे. ये उन तिलकधारियों की तरह श्रेष्ठजन हो जाएंगे जिन का राज और समाज में उच्च मानसम्मान होगा.

मनुस्मृति में यह भी कहा गया है कि ब्राह्मण भले ही पढ़ालिखा न हो, फिर भी वह पूजनीय होगा. इसी तर्ज पर जिन के पास भले शिक्षा न हो पर दौलत के कारण कागजी नोटों के बिना तकनीकी तरीके से लेनदेन करने वाले, कैशलैस समाज के सर्वोच्च पद पर आसीन माने जाएंगे. यह पूरा वर्ग है जिस के पास शिक्षा है पर जो हाथ का काम नहीं करता. यह लिखता, पढ़ता और बोलता है. यानी आमतौर पर जिन के पास कार्ड है, वे सवर्ण हैं.

सरकार स्वयं सवर्णत्व से सराबोर है. वह पूरी तरह कैशलैस है. यह सवर्णत्व का सब से बड़ा प्रमाण है.

आज कतारों में खड़ा खुद को खुश बता रहा वर्ग शिक्षित, इंटरनैट, मोबाइल पारंगत है जो स्वयं को उच्च, पवित्र मानता आया है.

इस के अलावा दूसरा नकदीवर्ण निचला है जिस के पास न डैबिट, क्रैडिट कार्ड है, न चैकबुक, न बैंक खाता है. इंटरनैट, मोबाइल बैंकिंग और लेनदेन के कैशलैस तरीकों से वह पूरी तरह अनभिज्ञ है. अगर किसी के पास खाता है भी, तो वह जनधन खाता है, कार्ड है तो रुपे कार्ड है, जिस में बैंकों, एटीएमों में जाने की मियाद तय की गई है. इस में पैसा जमा कराने और निकालने की सीमा पाबंद की गई है.

यह वर्ग दलित, शूद्र, किसान, मजदूर, रेहड़ीपटरी वाला, छोटामझोला दुकानदार है जो रोज कुआं खोदता है, रोज पानी पीता है. इस सरकार की निगाह में इस की हैसियत2,000 रुपए की करेंसी रखने की नहीं है. यह 100-50 रुपए के नकदी नोटों से रोजमर्रा के लेनदेन करने की क्षमता वाला है.

नरेंद्र मोदी के फैसले से सब से ज्यादा पीडि़त आम लोग, छोटे कारोबारी, किसान, दैनिक मजदूरी करने वाले हैं. देश की अर्थव्यवस्था में 40 प्रतिशत हिस्सा ऐसे कारोबार करने वालों का ही है.

नरेंद्र मोदी के कदम से उपजे भेद ने हमारे समाज को नए तरीके से 2 भागों में बांट दिया है. अकर्मण्य बन कर उधार पर जिंदगी के ऐश्वर्य लूट रहा सुविधाभोगी वर्ग बड़ी इमारतों, लक्जरी वाहनों, क्लबों, होटलों व शौपिंग मौलों की डिजिटल जीवनशैली जी रहा है.

दूसरा वर्ग उस वंचित भारत का है जिसे पेट भरने के लिए जीतोड़ मेहनत करनी पड़ती है. नशा, अशिक्षा, बीमारियों और अंधविश्वासों के अंधेरों में यह अपना जीवन बसर कर रहा है. इस वर्ग ने बैंकों की चौखट भी नहीं देखी है. इंटरनैट, मोबाइल पर ट्रेनों, बसों के टिकट बुक कराने के बजाय हर जगह घंटों लाइनों में धक्के खाने का आदी है यह वर्ग.

आज देश में 60 प्रतिशत से ऊपर साक्षर हैं. डैबिट, क्रैडिट कार्ड, इंटरनैट, मोबाइल बैंकिंग, औनलाइन शौपिंग जैसे आधुनिक लेनदेन के साधन बढ़े हैं पर यह साधन देश के कितने प्रतिशत लोगों की पहुंच के दायरे में आ सकते हैं.

भारत की स्थिति यह है कि 21 प्रतिशत लोगों के पास बैंकों में खाते ही नहीं हैं. केवल 4-5 प्रतिशत लोगों के खातों में सीधे वेतन जाता है. केवल 10 फीसदी लोग औनलाइन लेनदेन करते हैं.

85 प्रतिशत लेनदेन नकदी में होता है. यह नकदी लेनदेन वाला इतना बड़ा वर्ग अब उस दलित अछूत की तरह दिखाई देने लगा है जिस के पास न बैंक खाता है, न इंटरनैट. मोबाइल पर भुगतान की सुविधा है पर वह उसे देख सकता है, पढ़ नहीं सकता, उसे उस का ज्ञान नहीं है.

आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 35 करोड़ डैबिट और 109 करोड़ क्रैडिट कार्ड हैं. पर इन कार्डों के उपयोग की जटिलता कितनी है, औनलाइन लेनदेन में ठगी, बेईमानी, समय व पैसे की बरबादी कितनी है, यह मुख्य बात है.

आप किसी भी बैंक या मोबाइल कंपनी के कस्टमर केयर नंबर पर बात करना चाहेंगे तो शुरू में यह नंबर व्यस्त जाएगा. अगर फोन लग गया तो पहले आप से भाषा चुनने को कहा जाएगा. भाषा का बटन दबाने के बाद सेवाओं के बारे में न चाहते हुए भी आप को जानकारी जबरन सुननी पड़ेगी. 1 से 9 नंबरों तक जानकारी सुनतेसुनते आप पस्त हो जाएंगे, फिर भी जरूरी नहीं कि आप की समस्या का समाधान हो ही जाएगा.

यह इसी तरह का है जिस तरह किसी धार्मिक रस्म को पंडित विधिविधान से करवाते हैं. अब अनंत चतुर्दशी व्रत का ही विधान देखिए, सूर्योदय से पूर्व उठ कर प्रात: स्नान करिए. कच्चे सूत के डोरे में 14 गांठें दीजिए. उसे माला जैसा बना लीजिए. अब उस की विधिवत पूजा कर के उसे हलदी में रंग लें. फिर दाहिने

हाथ में पहन लें. इसे पहनते समय यह मंत्र पढि़ए,

अनंत संसार महासमुद्रेमग्नं

मयाम्युद्धरं वासुदेव,

अनंत रूपे विनियोजयस्व

ध्यानंत सूभाय नमो नमस्ते.

फिर इसे उतार कर गंगा या किसी नदी अथवा तालाब में प्रवाहित कर दें और किसी ब्राह्मण को खीर का भोजन करा कर उसे दान दें.

अर्थशास्त्रियों के अधिकतर आर्थिक चिंतन बताते हैं कि गरीबी, ऊंचनीच भाग्यदुर्भाग्य नहीं है, व्यवस्था और वितरण में होने वाली असमानता दरअसल भेदभाव व अन्याय के कारण है. यह असमानता धर्मगत सोच वाली व्यवस्था की वजह से है.

विश्व में धर्म की अर्थनीति ज्यादा फलफूल रही है. इस का मतलब है नीचे वाले की जेब का पैसा येनकेनप्रकारेण निकलवा कर ऊपर वाले की जेब में भरना. चालाकी, चतुराई, बेईमानी से औरों से पैसे लूटना धर्म की खासीयत रही है.

मनुस्मृति में लिखा है, शूद्र को धन संचय का अधिकार नहीं है. उस का धन जबरन छीन लेना चाहिए.

विस्त्रब्धं ब्राह्मण: शूद्राद्

द्रव्योपादान याचरेत्,

न हि तस्पास्ति

किंचिततस्वं भर्तृंहायधनो हिस:.

                (मनु स्मृति 8/417)

अर्थात ब्राह्मण बिना विकल्प किए दास शूद्र से धन को ले लेवें क्योंकि उस दास शूद्र का निजी धन कुछ नहीं है और वह दास शूद्र स्वामी से ग्रहण करने योग्य धन वाला है. यह अफसरशाही और उद्योगपतिशाही की प्रतिध्वनि क्या नहीं देता?

शूद्र का धन छीन लेना और ऊपर से जबरन मेहनत करवाते रहने को राजा अपना अधिकार समझता आया है.

वैश्य शूद्रौप्रयत्बेन स्वानि

कर्याणि कारयेत्,

तौ हि च्युतौ स्वकर्मम्य:

क्षोत्रयेतामिदं जगत्.

(मनु स्मृति-8/418)

यानी राजा वैश्य तथा शूद्र से यत्नपूर्वक अपनेअपने कर्मों को करवाता रहे क्योंकि अपनेअपने कर्मों से भ्रष्ट ये दोनों वर्ग इस संसार को क्षुभित कर देंगे.

सरकार ने नोटबंदी कर कैशलैस सोसाइटी का वर्णव्यवस्था की तरह का वर्ग विभाजन का सिद्धांत रचा है. काम करने वाला निचला मेहनतकश वर्ग कमाता रहेगा, ऊपर का वर्ग उस का पैसा छीनता रहेगा.

मनुस्मृति में यह भी लिखा है,

शूद्रं तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीत

मेव वा,

दास्यायैव हि सृष्टोज्सौ

ब्राह्मणस्पस्वयंभुवा:.

(8/413)

यानी वेतन दे कर या नहीं दे कर, जैसा वे चाहें वैसा कर के शूद्र से दासकर्म को कराएं क्योंकि ब्रह्मा ने सेवा के लिए ही शूद्रों की सृष्टि की है.

कैशलैस सोसाइटी में भी गरीब, मजदूर, छोटे दुकानदार की मेहनत का पैसा उस कार्डधारी, इंटरनैट, मोबाइल बैंकिंग वाले के खाते में छीनने की तैयारी है.

यह व्यवस्था मनु की व्यवस्था की तरह है जो गरीबों, मेहनतकशों का धन अमीरों के एटीएम, पेटीएमों की ओर खींचने वाली है. इस से निचले वर्ग की आजादी खत्म हो जाएगी. वह अपने बजट के दायरे में अपनी मरजी की वस्तु पर पैसा खर्च नहीं कर पाएगा. बड़े दुकानदारों की मरजी का सामान, मरजी के दाम पर इस वर्ग से हड़प लिया जाएगा.

इस से मजदूर, सब्जी, रेहड़ी, पटरी वाला कारोबारी, छोटे दुकानदारों को उजाड़ कर बिग बाजारों और रिलायंस स्टोरों की ओर मोड़ दिया जाएगा. अगर अर्थव्यवस्था में मंदी आएगी, तो सीधा असर गरीब पर पड़ेगा. गरीब और गरीब हो जाएगा.

ऐसा भी नहीं है कि नोटबंदी की कैशलैस सोसाइटी में इस व्यवस्था से मेहनत, उत्पादन बढ़ जाएगा. उलटा, मेहनत की जगह अकर्मण्यता, बेकारी बढ़ जाएगी. जो मजदूर, फुटपाथी काम करने वाले नोटबंदी के चलते दिहाड़ी बंद होने से लाइनों में लगने की मजदूरी का पैसा पा रहे थे, अब वह भी खत्म हो जाएगा.

अनुमान है कि कैशलैस सोसाइटी के वर्गभेद से करीब 5 करोड़ फुटकर दुकानदार सीधे सड़कों पर आ जाएंगे. इस से एक तरह का नया भ्रष्टाचार पैदा होगा. मेहनतकशों का पैसा इंटरनैट, मोबाइल बैंकिंग कोड हड़प कर अपने खातों में डालने, दूसरों के नंबर हैक कर के शौपिंग कर माल लूटना बढ़ जाएगा. बेईमानी के ये विचार आज इंटरनैट, मोबइल तकनीक युग के ही नहीं है, पुराने ग्रंथों में दूसरों का माल, दूसरों की बीवी, बेटियां कब्जाने के नुस्खे भरे पड़े हैं.

असल में देश की प्रगति हाथ का काम करने वाले मेहनतकश वर्ग की वजह से हो रही है. डिजिटल अर्थव्यवस्था इस प्रगति की गारंटी नहीं लेती. अमेरिका में ‘औक्यूपाई वालस्ट्रीट’ आंदोलन उस कार्डधारी वर्ग द्वारा बैंकिंग के जरिए लूट का नतीजा था जिस ने मेहनत कर पैसा बैंकों में रखा था.

भारत में नकदी बहुत बड़े क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. नकदी व्यवस्था छोटे कामगारों, कारोबारियों की रीढ़ है. मध्यवर्ग का नौकरीपेशा समूह भी बहुत बड़ा है जिस की आमदनी अपेक्षाकृत कम है. देश में 40 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबों में शुमार हैं.

देश में 90 प्रतिशत लेनदेन नकदी में ही होता है. अर्थशास्त्रियों की बात मानें तो देश में 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी नकदी वाले धन के दायरे में आती है. लाखों लोगों को नकदी व्यवहार अच्छा, सरल व सुरक्षित लगता है. यह खासतौर से ग्रामीण और अर्द्घशहरी क्षेत्रों के लिए ठीक है, जहां अब भी भारत की ज्यादातर आबादी रहती है.

कैशलैस सोसाइटी की थोपी जा रही यह व्यवस्था वर्णभेदी पुरोहित्व थोपने की कोशिश है. अब 2,000 रुपए का नोट कार्डधारी पुरोहित्व वर्ग के लिए होगा जो उस के लिए धन की सुरक्षा व बचत की गारंटी होगा जबकि 100, 50, और 500 रुपए के नोट मजदूर, दलित, किसान, छोटे कारोबारी की पहचान बताएगा.

दरअसल, कैशलैस लेनदेन पर आपत्ति नहीं है. भारत के दुनिया के साथ आधुनिकता से जुड़ना चाहिए लेकिन कैशलैस व्यवस्था जबरन थोपना गलत है. सरकार कैशलैस लेनदेन ही करने पर जबरदस्ती कर रही है. यह हर व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता पर तानाशाही थोपने जैसा है. लोगों को यह व्यवस्था अपनाने या न अपनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. वह अपनी मरजी से नकद, चैक, डैबिट, क्रैडिट कार्ड, नैटबैंकिंग या मोबाइल के माध्यम से भुगतान कर सके, इस का उसे हक होना चाहिए.

‘एक गांव में एक साहूकार रहता था. उस के पास भगवान का दिया सबकुछ था धन, दौलत, सेहत, सुशील पत्नी, आज्ञाकारी बेटे वगैरा. सबकुछ होने के बाद भी वह चैन की नींद नहीं सो पाता था क्योंकि उस के यहां खटमल बहुत थे. खटमल मारने के लिए उस ने तमाम उपाय और टोटके किए.  दीवारों और खाट के छेदों में चूना भरवाया, कैरोसिन छिड़कवाया, जड़ीबूटियां घर में रखीं लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. जैसे ही उस की नींद लगने को होती तो खटमल जाने कहां से निकल कर आ जाते और उस का खून चूसने लगते. रातरात भर बैठा

वह खटमल मारता रहता और ऊपर वाले से उन से छुटकारा पाने की गुहार भी लगाता रहता था.

एक दिन एक बहुत पहुंचे हुए ज्ञानी संत गांव में पधारे उन के बारे में महशूर था कि वे चुटकियों में हर समस्या का समाधान कर देते हैं. साहूकार भी भागाभागा उन के पास गया और अपनी परेशानी का रोना रोया. संत ने सुझाव दिया कि खटिया बदल लो.

साहूकार ने खटिया बदल ली पर यह क्या, 4-6 दिनों बाद ही नई खटिया में भी खटमलों ने डेरा डाल लिया और फिर उस की नींद हराम कर दी. वह फिर हैरानपरेशान सा संत के पास जा पहुंचा तो उस की बात सुन कर झल्लाए संत ने कहा, खटिया को जला दो.’

गांवदेहातों में यह कहानी साररूप में यह नसीहत देते बताई जाती है कि खटमल मारने के लिए खटिया जलाना बुद्धिमानी की बात नहीं.

कहानी पुरानी है पर यह 8 नवंबर की नोटबंदी के चलते प्रासंगिक हो चली है.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1,000 रुपए के नोट बंद करने का ऐलान करते आम लोगों को भरोसा दिलाया था कि इस से भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद, जाली नोट और दूसरे आर्थिक अपराध खत्म हो जाएंगे.

नोटबंदी के तात्कालिक प्रभाव का पहला दौर सभी ने देखा कि आम लोग अपनी ही कमाई को पाने के लिए बैंकों की लाइन में नोट बदलवाने के लिए लगे रहे.  कुछ तो लाइन में लगेलगे ही शहीद हो गए. यह त्राहि अभी भी जारी है. और नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि बस, 30 दिसंबर तक तकलीफ उठा लो, इस के बाद सबकुछ ठीक हो जाएगा. न हो तो जो चाहे सजा मुझे दे देना.

इधर, खटिया में खटमल फिर घुसने लगे हैं. खटिया प्रतीकात्मक रूप में देश है, जनता है. जबकि साहूकार घूसखोरी, कालाधन, आतंकवाद व भ्रष्टाचार वगैरा खटमल हैं जो कभी मरते नहीं. नरेंद्र मोदी कितनी बार खटिया बदलेंगे, यह अंदाजा किसी को नहीं. पर यह जरूर समझ आने लगा है कि ये खटमल मरते नहीं, ये लोगों का खून चूसते रहेंगे, जितने चाहे जतन कर लो वे कारगर नहीं होंगे.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले का एक छोटा सा कसबा है सोहागपुर, जहां नोटबंदी के बाद 25 नवंबर को सिंचाई विभाग के एक क्लर्क जी एस पठारिया को लोकायुक्त पुलिस ने 3,000 रुपए की घूस लेते रंगेहाथों पकड़ा. इस क्लर्क की शिकायत एक मृतक मुलाजिम मिथिलेश दुबे के बेटे अखिलेश दुबे ने की थी कि उक्त क्लर्क पिता का जीपीएफ निकालने और अनुकंपा नियुक्ति के एवज में घूस मांग रहा है.  बात सही थी. जी एस पठारिया 100-100 रुपए के 30 नोट लेते धरा गया.

इसी दिन मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले धार के कसबे धरमपुरी के एक स्कूली कर्मचारी नरेंद्र गुप्ता को भी 1,500 रुपए की घूस लेते लोकायुक्त पुलिस ने दबोचा था जो एक सहायक शिक्षक नयन सिंह ठाकुर से एरियर्स यानी बकाया राशि के भुगतान के बाबत घूस ले रहा था.

नोटबंदी के बाद मध्य प्रदेश में घूस के लेनदेन का यह 10वां मामला था जो सामने आया, जिन में 100-100 रुपए के या फिर चलन में आए नए नोटों का इस्तेमाल किया गया था.

8 नवंबर के बाद बिलाशक घूस लेनदेन के मामले कम हुए थे क्योंकि लोगों के पास घूस देने के लिए पैसे ही नहीं थे. घूसखोर नए नोट मांग रहे थे. लिहाजा, उन के जरूरी काम फाइलों में कैद हो कर अटके पड़े हैं. जब नए नोट आए तो नए सिरे से घूसखोरी शुरू हुई. यानी खटिया नई, खटमल वही.

इसी दौर में आतंकी घटनाएं भी कम हुई थीं पर 15 नवंबर के बाद सीमापार के खटमलों ने भी अपना काम जारी कर दिया. कालेधन को ले कर बनाया गया सस्पैंस कायम है, जिसे ले कर लोगों को पुचकारा जा रहा है कि थोड़ा संयम रखो, कष्ट सहो, सबकुछ ठीक हो जाएगा.

धंधा कमीशन का

घूसखोरी नाम का आर्थिक अपराध नोटबंदी से अप्रभावित रहेगा, यह तय है. यह अपराध ही आम लोगों की परेशानी और कालेधन की एक बड़ी वजह है. इस के बाद भी लोगों को उम्मीद है कि 50 दिन पूरे देख लें, शायद इस दफा कोई चमत्कार हो ही जाए.

लोग धक्के और पुलिस के डंडे खाते रहे पर उन के मन में खुशी थी कि हमारा क्या, हमारे पास तो 5-10 हजार रुपए ही हैं जो सफेद और एक नंबर के हैं. असल मुसीबत तो उन की है जिन के पास नोटों की भरमार है. अब इन्हें पता चलेगा कि मोदी किस बला का नाम है.

हैरतअंगेज तरीके से बड़े पैमाने पर कमीशन पर करोड़ोंअरबों के नोट बदलने की बातें भी हुईं. देश का कोई हिस्सा इस चर्चा से अछूता नहीं था कि थोक में कमीशन पर नोट बदले जा रहे हैं. यह वह दौर था जब नोटों की किल्लत के चलते लोग जैसेतैसे 2,000 या 4,000 रुपए पा कर और उधारी कर बुनियादी जरूरतें पूरी कर पा रहे थे. बैंकों और एटीएम में नए नोट नहीं थे.

थोक में नोटबदली की बात लोगों के गले नहीं उतर रही थी क्योंकि नोटबदली की हद तय कर दी गई थी कि प्रतिव्यक्ति 2 हजार रुपए के ही नोट बदले जाएंगे. शुरू में यह सीमा 4,000 रुपए थी. जिन के पास बड़ी तादाद में नोट थे उन्होंने गरीब मजदूरों और नौकरों को नोट दे दिए थे कि अपने खाते में डाल लो, एवज में 20 फीसदी तुम्हें देंगे. ऐसा हुआ भी और हो भी रहा है. इस पर प्रधानमंत्री ने मशवरा दिया कि लालच में आ कर दूसरों के नोट अपने खाते में जमा न करें, इस से मकसद पूरा नहीं होगा. करोड़ों का बदलाव इन छोटी रकमों में तो हो नहीं सकता.

इन दिनों 25.58 करोड़ जनधन खातों की उपयोगिता भी साबित हो गई, जिन में बीती 25 नवंबर तक 64,252.15 करोड़ रुपए की रिकौर्ड राशि जमा हुई.

23 नवंबर को भोपाल पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उपनगर बैरागढ़ में प्रदीप खिलवानी और जतिन दरयानी नाम के 2 युवकों को धर दबोचा. इन के पास से 7 लाख 46 हजार रुपए के नोट बरामद किए गए. पुलिस के मुताबिक, इन युवकों ने 22 फीसदी कमीशन पर पुराने नोटों को नए नोटों से बदला था. यानी कालाबाजारी नए नोटों से भी हो रही थी.

 ये मामले भी नरेंद्र मोदी के दावों की पोल खोलते हैं कि सबकुछ ठीक हो जाएगा. नोटबदी के एक हफ्ते के भीतर ही यह साबित हो गया था कि कुछ ठीक नहीं होने वाला. सीमापार पर भी थोक में नए नोट हैं और 2 हजार रुपए के नए नकली नोट भी बाजार में आ चुके हैं. 

अंधभक्ति और प्रवचन

नवंबर के आखिर तक न केवल देश के, बल्कि दुनिया के अर्थशास्त्री हार मान चुके थे. पर नरेंद्र मोदी का प्रचारतंत्र बेहद मजबूत है और देखते ही देखते वे अवतार, भगवान और युगपुरुष कहे जाने लगे हैं. नारा लग रहा है कि मेरा देश बदल रहा है. सालदोसाल में यह कठिन काम नहीं होने वाला. मोदी भक्त पूरे सिस्टम पर हावी हो गए हैं.

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की यह व्याख्यात्मक टिप्पणी नक्कारखाने में तूती वाली साबित हुई कि इस फैसले से भ्रष्टाचार वगैरा खत्म नहीं होने वाले.  मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल के मुंह से इतनाभर निकल पाया कि हम ईमानदारों को सहूलियतें देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

बाबा रामदेव प्रफुल्लित हो कर यह कहते नजर आए कि नोटबंदी के फैसले की आलोचना राष्ट्रद्रोह है. जैनमुनि तरुण सागर ने आगरा में अपने कड़वे प्रवचनों में कहा कि हम तो कहते रहते हैं कि नोट कागज का टुकड़ा भर है, इस से मोह मत रखो. यही बात कई छोटेबड़े बाबाओं ने अलगअलग तरह से कही. 

मोदी अपने भाषणों में कहते नजर आ रहे हैं जो भाषण कम, धार्मिक उपदेश ज्यादा लगते हैं कि धैर्य रखो, कष्ट सहो फल निकलेगा. कष्ट सहने और धैर्य रखने की घुट्टी लोग आदिकाल से पी रहे हैं, इस में उन्हें मजा भी आता है. ये व्रत रखते हैं और तरहतरह से धर्म के नाम पर खुद को तकलीफ देते हैं. देश बलदने में हर कोई अपना योगदान दे रहा है.

नजारा सार्वजनिक यज्ञहवनों जैसा है जिस में लोग थोक में अपनी आहुति डाल कर बेफिक्र हो जाते हैं कि इस से उन के पाप धुल गए और स्वर्ग में सीट रिजर्व हो गई. थोड़ी दक्षिणा के एवज में यह मिल जाए, तो सौदा घाटे का नहीं. 

अनिष्ठ और अनदेखी से डरे लोग झट सहमत हो जाते हैं कि नोटबंदी का फैसला वाकई ऐतिहासिक और सटीक है, इस से गरीबी दूर होगी.

नोटबंदी के मारे गरीबों की तो कहीं कोई सुनवाई या अहमियत ही नहीं लेकिन मध्यवर्ग का मोदी की तरफ झुकाव जरूर हैरानी के साथसाथ चिंता की बात है. कोई यह नहीं कह पा रहा कि यह समर्थन या भक्ति दरअसल दहशत है. इस वर्ग की मनोस्थिति का निष्पक्ष अध्ययन और विश्लेषण होना चाहिए कि कहीं वह 1975 की तरह डर और सामाजिक दहशत में तो नहीं जी रहा. 

नरेंद्र मोदी आज भी चुनाव प्रचार करते नजर आ रहे हैं. जब वे कांग्रेस के कुशासन और गांधीनेहरू परिवार की लूटखसोट को कोसते हैं तो लगता है कि वे भी वही गलतियां दोहराने का लाइसैंस, छूट या इजाजत जनता से मांग रहे हैं जो कांग्रेस ने की थीं. फिर इन में और उन में फर्क क्या, यह बात समझ से परे है.

सच यह है कि नरेंद्र मोदी ने धार्मिक प्रवचनों की राजनीतिक शैली विकसित कर ली है. वे धर्मगुरुओं की तरह कह रहे हैं कि पैसा इकट्ठा यानी धनसंग्रह मत करो, सोने और संपत्ति से मोह त्याग दो क्योंकि यही चीजें आम लोगों की तकलीफ की वजहें हैं.  साथ ही, वे यह एहसास भी दिलाते हैं कि जिन्होंने लूटा, उन से छीन कर वापस दूंगा. नोटबंदी इस दिशा में पहला कदम था और लोग नए धमाके का इंतजार करने लगते हैं. अब मोदी की संन्यासी छवि को चमकाती बात. कुछकुछ उत्साही लोग उन की पत्नी जसोदा बेन का हवाला देते उन्हें महावीर और बुद्ध साबित करने में जुट जाते हैं, मानो अच्छीखासी पत्नी का त्याग करना ही महानता का पर्याय है.

ये बातें जो मोदी को अवतार और सन्ंयासी बताती हैं, खुद मोदी के भाषणों से ले कर तोड़ीमरोड़ी जाती हैं. एक वक्त में जवाहरलाल नेहरू और उन के बाद इंदिरा गांधी मोदी से कहीं ज्यादा लोकप्रिय थे, वे भी भली बातें करते थे और गरीबी हटाने का नारा लगाया करते थे. लेकिन सोनिया गांधी, मोदी और इंदिरा की तुलना पर एतराज जताती हैं तो कुछ गलत ही करतीं नजर आती हैं क्योंकि इंदिरा गांधी जम कर भावुकता भुनाती थीं, मोदी भी यही कर रहे हैं. फर्क इतना है कि मोदी ने राष्ट्र और धर्म का अंतर पाट सा दिया है.

राष्ट्रद्रोह की परिभाषा बदली जा रही है. अब अघोषित तौर पर यह स्थापित हो रहा है कि मोदी की आलोचना राष्ट्रद्रोह है. इस मानसिक दिवालियेपन के पीछे एक रिक्तता है. 

नोटबंदी वाकई एक ऐतिहासिक कदम है जिस के चलते किसान बुआई नहीं कर पा रहा. मजदूर दानेदाने को मुहताज हो चला है. मध्यवर्ग शादियां नहीं कर पा रहा. छोटेमझोले व्यापारी टकटकी लगाए ग्राहकों के आने का इंतजार कर रहे हैं.  

लखनऊ के मशहूर चौक की सर्राफा वाली गली में एक तरफ सोनेचांदी का कारोबार करने वालों की दुकाने हैं तो दूसरी तरफ चिकन के कपड़ों के छोटेबडे़ तमाम शोरूम हैं. नोटबंदी के बाद यह बाजार ठंडा पड़ा है. दुकानदार ग्राहकों की राह तक रहे हैं. ग्राहक कैश की कमी से इधर आने से कतरा रहा है.  

लखनऊ का चिकन कारोबार पूरी दुनिया में मशहूर है. यहां के कारोबारियों को विदेशों से भी और्डर मिलते हैं. लखनऊ का चिकन केवल लखनऊ में ही नहीं बिकता, यह देश के बडे़ शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में भी बड़ी दुकानों पर बिकता है. वहां के दुकानदार लखनऊ से ही चिकन की पूरी खरीदारी करते हैं. दूसरे शहरों से मिलने वाला और्डर 30 से 40 फीसदी ही बचा है. 60 से 70 फीसदी कारोबार बंद हो चुका है. थोक ही नहीं, फुटकर कारोबार भी प्रभावित हुआ है.

चिकन का यह कारोबार पूरी तरह से कैश पर टिका हुआ है. नोटबंदी से चिकन की खरीदारी घट गई है. कपडे़ खरीदने के लिए ग्राहक बाजार नहीं आ रहे हैं. बिक्री घटने से बड़े दुकानदारों ने अपने पहले से दिए और्डर कैंसिल करा दिए हैं. जिस से चिकन कारोबार में कपडे़ तैयार करने वाले कारीगरों को काम नहीं मिल रहा है. चिकन कारोबारी बेरोजगारी के आलम में अच्छे दिनों की राह देख रहे हैं. कारीगर नए काम की तलाश में दुकानों और शोरूम के चक्कर काट रहे हैं पर वहां काम नहीं मिल रहा है.

शोरूम और दुकानमालिक नोटबंदी के चलते कारीगरों को पैसा नहीं दे रहे हैं. ऐसे में इन कारीगरों को अपना घर चलाना मुश्किल हो गया है. चिकन ही नहीं, जरदोजी का काम करने वाले भी नोटबंदी के कारण मजदूरी नहीं पा रहे हैं. जरदोजी का काम भी बंद हो गया है. नए ग्राहक नहीं आ रहे हैं. जिस से नई डै्रस तैयार नहीं हो रही हैं. जरदोजी कारीगर एक तरह से दिहाड़ी मजदूर सा होता है. वह दुकानों से काम ले जाता है, उस के बाद उसे पूरा कर के दुकानों पर दे जाता है. इस के बाद ही दुकानदार उस को मजदूरी देता है. नोटबंदी होने के कारण दुकानदार का सामान नहीं बिक रहा जिस से वह नया और्डर नहीं दे रहा. नतीजतन, जरदोजी कारीगर भुखमरी का शिकार हो रहा है. 

एक कारीगर आमतौर पर नोटबंदी से पहले 240 रुपए रोज की मजदूरी कर लेता था. जिस से उस का घर और परिवार चलता था. नोटबंदी के बाद उसे काम नहीं मिल रहा. जिस से उस के और घरपरिवार के दिन मुश्किल भरे हो गए हैं. गांव से लखनऊ आए करीगर वापस अपने गांव जा रहे हैं. उन को लगता है कि गांव में शहरों के मुकाबले खर्च कम है. ऐसे में वहां जीवन गुजारना सरल है. चिकन कारोबार में सब से पहले कारोबारी कपड़ा खरीद कर करीगर को देता है. कपडे़ की कटाई, छपाई और कढ़ाई करने वाले कारीगर को नकद पैसा देना होता है. इस के बाद कपडे़ की धुलाई और सिलवाई का भी नकद पैसा देना होता है.

इस कपडे़ को छोटे दुकानदार फुटकर में बेचते हैं. बड़े कारोबारी इसे दूसरे शहर और देश भेजते हैं. कारोबारी बाहर और्डर नहीं भेज पा रहे क्योंकि शोरूममालिकों ने अपने और्डर या तो रोक लिए हैं या फिर कैंसिल करा दिए हैं. जब व्यापारी माल नहीं बेच पा रहा तो वह नया और्डर नहीं दे रहा है. चिकन और जरदोजी में तमाम तरह के छोटेछोटे काम होते हैं जिन को करने के लिए कारीगर को नकद पैसा मिलता था.

चिकन और जरदोजी का काम करने वाले मोहम्मद शमी और दीपक कुमार कहते हैं, ‘‘नोटबंदी से कालेधन वालों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह पता नहीं पर आम मजदूर इस से प्रभावित हो रहा है. उस की रोज की दिहाड़ी मारी जा रही है. जिन लोगों के पास पैसा था, अब वे भी नोटबंदी का बहाना बना कर भुगतान नहीं कर रहे हैं. नोटबंदी के फैसले से छोटे रोजगार वाले और कारीगर प्रभावित हो रहे हैं.’’  

नोटबंदी की मार सब से अधिक दुकानदार झेल रहा है. ग्राहक के पास पैसे नहीं हैं. वह केवल बहुत जरूरी चीजों पर ही पैसा खर्च कर रहा है. ऐसे में होटल, जनरल मर्चेंट, चाटपूरी के ठेले वालों, पत्रिकाओं व मिठाइयों वालों सब का कारोबार ठप है. नकदी की कमी से नोटबंदी के बाद लोगों की खरीदारी काफी प्रभावित हुई है. बड़े दुकानदारों का भी कारोबार प्रभावित हुआ है. इस में ज्वैलरी कारोबार, साड़ी, कपड़ों और जूतों की दुकानें प्रमुख हैं.

इन कारोबार के ठप होने का असर दुकानदारों से ज्यादा, उन के यहां मजदूरी करने वालों पर पड़ा है. उत्तर प्रदेश के कुछ शहर अलगअलग कारोबार के लिए मशहूर हैं. मुरादाबाद का पीतल उद्योग, आगरा का जूता और पेठा, फिरोजाबाद का चूड़ी उद्योग, बनारस की साड़ी, मेरठ का सर्राफा और गजक, नोएडा का कपड़ा उद्योग प्रमुख हैं. यहां बड़ी तादाद में दैनिक मजदूर काम करते हैं. इन कारोबारों के प्रभावित होने से ये मजदूर बेकार हो गए हैं. इन के घरपरिवार अपनी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं.

लखनऊ के गुरुनानक मार्केट में पिछले 50 सालों से किताबों, पत्रिकाओं की दुकान चलाने वाले सुभाष पुस्तक भंडार के राजकुमार छाबड़ा कहते हैं, ‘‘इतने समय में पहली बार दुकानदारी में इस तरह की गिरावट देखी है. बहुत बार अलगअलग तरह की परेशानियां आईं पर पहली बार ग्राहकों की बेहद कमी दिख रही है. उधार बेचने के बाद भी कारोबार को पटरी पर लाना संभव नहीं दिख रहा है.’’ 

जिम्मेदार है कैश की कमी

नोटबंदी से लोगों को परेशानी इसलिए नहीं है कि उन्होंने कालाधन रखा हुआ है, परेशानी का कारण कैश की कमी का होना है. गांव और शहर एकजैसी हालत से गुजर रहे हैं. गांव में जहां खेत में फसल की बोआई प्रभावित हो रही है वहीं शहरों में दुकानदारी प्रभावित हो रही है. कैश की कमी से सभी धंधे चौपट हो रहे हैं.  

सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी यानी सीएमआईई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नोटबंदी से इंडियन इकोनौमी को  1.28 लाख करोड़ रुपए की चपत लगेगी. नोटबंदी से परेशान लोग बहुत जरूरी खरीदारी ही कर पा रहे हैं. यही नहीं, नोटों को लाने व ले जाने और एटीएम के सुधारने पर भी बैंकों को अलग से पैसा खर्च करना पड़ रहा है.

नोटबंदी की परेशानी से निबटने के लिए बैकों ने दूसरे जरूरी काम नहीं किए जिस का प्रभाव भी बैकिंग से जुड़े कामों पर पड़ रहा है.                      

– साथ में भोपाल से भारत भूषण श्रीवास्तव, लखनऊ से शैलेंद्र सिंह,  कोलकाता से साधना शाह.

मोदी के साथ ‘ममता’ नहीं

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पूरे दमखम और आत्मविश्वास से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उखाड़ फेंकने का ऐलान कर दिया है, तो इसे वक्तीतौर का जोश या गुस्सा कहते मानते नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि कभी पश्चिम बंगाल से वामपंथियों को उखाड़ फेंकने का करिश्माई और नामुमकिन दिखने वाला काम वे कर के दिखा चुकी हैं, जिसे आजादी के बाद लाख कोशिशों के बावजूद कांग्रेस नहीं कर पाई थी.

ममता की छवि देश में एक जुझारू और जिद्दी नेत्री की है, जिसे भुनाने के लिए वे तमाम दलों को न्योता सा दे रही हैं. हिंदीभाषी राज्यों में पैठ बनाने के लिए वे हिंदी सीख रहीं हैं और इस से ज्यादा अहम काम दोस्तों की लिस्ट तैयार कर रही हैं.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ममता के मुरीद हो चुके हैं, लालू व नीतीश दोनों या इन में से कोईर् एक उन का साथ दे सकता है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा में से जो पिछड़ेगा, तय है वह ममता के साथ खड़ा होने में अपनी बेहतरी समझेगा. उमर अब्दुल्ला जैसे नेता भी ममता को समर्थन दे सकते हैं, दक्षिण भारत के बीच क्षेत्रीय दल भी ममता की मोदी उखाड़ो मुहिम का हिस्सा बन सकते हैं. लेकिन यह आसान काम नहीं है, यह ममता को भी मालूम है, इसलिए तय है वे कोई नया फार्मूला निकालेंगी.  

क्या दलालतंत्र खत्म हो पाएगा?

प्रधानमंत्री के 500 और 1,000 रुपए के नोटों के बाद किए जाने की घोषणा के बाद रोज कमानेखाने वाले गाहेबगाहे यही पूछते रहे कि अच्छा, मोदीजी ने नोट रद्द कर के वाकई अच्छा किया? क्या वाकई देश में साम्यवाद आ गया है? दलालतंत्र खत्म हो पाएगा? क्या इस से महंगाई कम होगी? देश से कालाधन पूरी तरह खत्म हो जाएगा? यह और बात है कि इन सवालों का जवाब तो अभी तक धुरंधर राजनीतिज्ञों या अर्थशास्त्र के जानकारों के पास भी नहीं है.

प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद पूरे देश में जो वस्तुस्थिति बनी वह कुछ इस तरह की थी, जिन के पास भी अतिरिक्त मात्रा में पुराने नोट थे वे सब के सब उन्हें खपाने या ठिकाने लगाने की  जुगत में लग गए. इसी क्रम में कोलकाता के बड़ाबाजार से ले कर बहू बाजार ही नहीं, देशभर के झवेरी बाजार में कारोबार सारी रात चला. ज्वैलरी दुकानों में पुराने नोट के बदले सोनेहीरे के जेवर, बिस्कुट की खरीदफरोख्त होती रही. काले पैसे के लेनदेन में सोना आसमान छू बैठा. यही नहीं, विदेशी मुद्रा का बाजार भी ‘रुक्का’ के जरिए गरमा गया. रुक्का यानी कागज के टुकड़े में सांकेतिक भाषा में एक नंबर लिख कर मोटे कमीशन के बल पर रुपए की तरक्की परवान चढ़ी. जानकार बताते हैं कि यह काम दरअसल, सोई पड़ी कंपनी की आयकर फाइल में रकम डाल कर उस रकम को दूसरे रास्ते से निकाल लेना है. कारोबारी दुनिया में यह तिकड़म पुरानी है. अब इस का इस्तेमाल नोट बदलने के लिए हो रहा है. और तो और, पुराने नोट में अग्रिम वेतन चुकाने के भी मामले सामने आए हैं.

चार्टर्ड अकाउंटैंट पिंकी दवे का कहना है कि अगर इस तरह से वेतन, बोनस या अन्य मद में अग्रिम के तौर पर पुराने नोट खपाए जा रहे हैं तो निसंदेह कारोबारियों ने अपनी तिजोरी में 500 व 1,000 रुपए के नोटों की नकदी की मौजूदगी को कम करने के मकसद से यह जुगत लगाई है. कालाधन को सफेद करने की यह भी प्रक्रिया है. इन मदों में दिए गए पैसों का हिसाब आयकर विभाग की नाराजगी का कारण नहीं बनेगा. निजी दुकानदार या कारखाने की बात तो जाने दें, नकदी संकट के समय केंद्र सरकार ने भी गु्रप सी और गु्रप डी के कर्मचारियों को नवंबर महीने के वेतन से अग्रिम 10 हजार रुपए नकदी ले लेने की छूट दे दी. खबर है कि अन्य कई  राज्यों के सरकारी कर्मचारियों ने भी ऐसी ही सहूलिहत की मांग की. बहरहाल, कालेधन को सफेद बनाने के इस तरीके को इन दिनों अपनाया जा रहा है.

हां, इतना जरूर है कि आयकर विभाग सवाल कर ही सकता है कि पेशगी के तौर पर कर्मचारियों को पैसे आखिर क्यों दिए गए? जवाब में बीमारी, पढ़ाई और ब्याह जैसी कर्मचारियों की निजी जरूरतों का बहाना बनाया जा सकता है. लेकिन बहुत बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आड़ ली गई तो इसे साबित करना कठिन हो सकता है. वैसे, अपने हिसाबकिताब को साफसुथरा करने के लिए कारोबारियों के पास अभी मार्च 2017 तक का समय है.

इन कुछ दिनों में कोलकाता में एशिया के बड़े थोक बाजार बड़ाबाजार में दुकानदार कहने को तो मक्खी मार रहे हैं, लेकिन पिछले दरवाजे से ‘कट मनी’ का कारोबार अच्छा चल रहा है. इस काम में कारोबारी से ले कर ठेकेदार, प्रमोटर, मजदूर और बिल्डर लग गए. इन के रेटकार्ड तक रातोंरात तैयार हो गए. रेटकार्ड के हिसाब से 10 लाख रुपए से कम की रकम 20 प्रतिशत, 10 से 19 लाख की रकम पर 25 प्रतिशत, 20 से 29 लाख पर 30 प्रतिशत और 30 लाख से अधिक की रकम पर 35 प्रतिशत का कट मनी यानी कमीशन.

दरअसल, ऊपरी तौर पर देखा जाए तो कारोबार में सबकुछ कानूनी नजर आता है, लेकिन परदे के पीछे दूसरों से ली गई 500 व 1,000 रुपए के नोटों वाली रकम दबे पांव कारोबार में शामिल होती है. इस तरीके से 10 से 20 लाख रुपए आराम से बदले जा सकते हैं. पर 30 लाख रुपए की रकम में थोड़ी परेशानी पेश आएगी. लेकिन सक्रिय दलालतंत्र इतना भी मैनेज कर सकता है. पर इस से ज्यादा के लिए दलालतंत्र बमुश्किल ही तैयार हो रहा है.

अब इस का पुख्ता हिसाब कैसे लगेगा कि कहां व कितनों ने अपनीअपनी छिटपुट जुगत और दलालतंत्र के जरिए काले पैसों को सफेद किया. ऐसे में लगता है कि जहां से चले थे, इतनी सारी हुज्जत के बाद फिर से देश वहीं आ कर रूक गया. एक वृत्त पूरा हुआ. हासिल कुछ खास नहीं हुआ.

बंदी के कगार पर उद्योगधंधे

नोटबंदी का सरकारी फरमान कालेधन वालों का बाल भले ही न बांका कर पाया हो लेकिन उस ने उद्योगधंधों की कमर जरूर तोड़ कर रख दी है. नोटबंदी से बंदी के कगार पर पहुंचे देश के उद्योगधंधों की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

कालाधन बन रहा पार्टीधन

देश को कालाधन से मुक्त कराने की राह में सब से बड़ी बाधा खुद राजनीतिक पार्टियां हैं. सभी राजनीतिक पार्टियों के पास चंदे के रूप में बंद हो चुके 500 और 1,000 रुपए के नोट उन के खातों में जमा हो रहे हैं. ये रकमें अलगअलग कार्यकर्ताओं द्वारा जमा कराई जा रही हैं.

लखनऊ में राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी के अध्यक्ष प्रताप चंद्रा कहते हैं, ‘‘कालाधन सब से बड़ी मात्रा में नेताओं, अफसरों और बड़े बिजनैसमेन के पास है. ये लोग राजनीतिक दलों को चंदा देते रहे हैं. अब पुराने नोट बंद होने के बाद ये लोग बैंकों में पुराने नोट जमा करा रहे हैं. ये लोग इस जमा पैसे के एवज में पार्टी से चुनावीखर्च के रूप में कुछ पैसा वापस भी पा जाएंगे. ऐसे में कालाधन पार्टियों में जमा हो कर सफेद हो रहा है.

‘‘राजनीतिक दल आयकर की सीमा से बाहर हैं. आयकर की सीमा में वे लोग आते हैं जो आय करते हैं. राजनीतिक दलों की कोई आय नहीं है, इसलिए वे आयकर सीमा में नहीं आते. राजनीतिक दलों पर जनसूचना अधिकार कानून लागू नहीं है. ऐसे में वे यह बताने के लिए बाध्य नहीं हैं कि उन को कितना पैसा मिला है. राजनीतिक दल केवल चुनाव आयोग को अपनी सालाना बैलेंस शीट देते हैं जिस में यह लिखा होता है कि कितना पैसा आया और कितना खर्च हुआ. ऐसे में यह पता ही नहीं चल पाएगा कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ. यही वजह है कि कालेधन को पार्टी फंड में डाल कर सफेदधन बनाने का काम धड़ल्ले से किया जा रहा है.’’

अगर कालाधन रोकना है, चुनाव में कालाधन के प्र्रभाव को खत्म करना है तो राजनीतिक दलों को आयकर कानून और जनसूचना अधिकार कानून के तहत लाना होगा. जब तक ये सुधार नहीं होंगे तब तक कालेधन को खपाने में पार्टी फंड सब से कारगर उपाय की तरह प्रयोग होता रहेगा. नेता ही नहीं, अफसर भी अपने कालेधन को खपाने के लिए पार्टियों की शरण में जाते रहेंगे.