अपराध

बदनामी का दाग

11 January 2017

7 अगस्त, 2016 की सुबह 7 बजे सायरा ने अपनी छत से पड़ोस में रहने वाली सुनीता की छत पर देखा तो वहां का नजारा देख कर वह सन्न रह गई. छत पर सुनीता के देवर राजेश की लाश खून से लथपथ पड़ी थी. उस ने शोर मचाया तो आसपड़ोस के लोग इकट्ठा हो गए. सायरा ने 100 नंबर पर फोन कर के इस बात की सूचना पुलिस को भी दे दी थी. पीसीआर वैन कुछ ही देर में आ गई. यह स्थान दक्षिणपश्चिम दिल्ली के थाना रनहौला के अंतर्गत आता था, इसलिए कंट्रोल रूम की सूचना पर के एसआई ब्रह्मप्रकाश हैडकांस्टेबल संजय एवं कांस्टेबल नरेश कुमार के साथ सुनीता के घर पहुंच गए थे.

जैसे ही ये सभी दूसरी मंजिल पर पहुंचे, बरामदे में सुनीता की लाश पड़ी मिली. उस की हत्या चाकू से गला रेत कर की गई थी. वह चाकू लाश के पास ही पड़ा था. उन्हें सुनीता के मकान की दूसरी मंजिल की छत पर उस के देवर की लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी, इसलिए वह छत पर गए तो छत पर बिछी चटाई पर सुनीता के देवर राजेश की लाश पड़ी थी.

राजेश का सिर फटा हुआ था. लाश के पास ही हथौड़ा पड़ा था, जिस पर खून लगा था. इस का मतलब हत्या उसी हथौड़े से की गई थी. चटाई पर शराब की एक बोतल, 2 गिलास, एक लोटे में पानी तथा एक कटोरी में तली हुई कलेजी रखी थी. इस से साफ लग रहा था कि यहां बैठ कर 2 लोगों ने शराब पी थी.

पड़ोसियों ने बताया कि मृतक राजेश कुमार हरियाणा के जिला सोनीपत के गांव हुमायूंपुर में रहता था. वह अकसर सुनीता के घर आता रहता था. पड़ोसियों ने एक बात यह भी बताई कि राजेश जब भी यहां रात को ठहरता था, सुनीता की छोटी बेटी ज्योति अपनी सहेली के घर सोने चली जाती थी. ब्रह्मप्रकाश के दिमाग में यह बात बैठ गई कि चाचा राजेश के आने पर ज्योति अपना घर छोड़ कर किसी और के यहां सोने क्यों चली जाती थी?

ब्रह्मप्रकाश ने इस दोहरे हत्याकांड की सूचना थानाप्रभारी सुभाष मलिक को भी दे दी थी. थोड़ी देर में वह भी अपने कुछ मातहतों के साथ आ गए थे. उन्होंने फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट और डौग स्क्वायड टीम को भी बुला लिया था. थानाप्रभारी की सूचना पर एसीपी (नांगलोई) आनंद राणा भी आ गए थे.

निरीक्षण के बाद जब ज्योति से पूछा गया कि अपना घर होते हुए भी वह अपनी सहेली के घर सोने क्यों गई थी तो जवाब देने के बजाय वह शरमाने लगी. इस से आनंद राणा समझ गए कि मामला कुछ ऐसा होगा, जिसे वह बताना नहीं चाहती. सारी कारवाई निपटा कर लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

डीसीपी ने इस मामले को सुलझाने के लिए एसीपी आनंद राणा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी सुभाष मलिक, इंसपेक्टर एस.एस. राठी, हैडकांस्टेबल नरेंद्र, कांस्टेबल विक्रांत, अनिल, वीरेंद्र, नरेश, प्रवीण, संजीव, महिला कांस्टेबल परमिंदर आदि को शामिल किया गया.

टीम में शामिल महिला कांस्टेबल परमिंदर ने ज्योति से पूछा कि चाचा के आने पर वह उस रात दूसरे के यहां सोने क्यों गई थी तो ज्योति ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘चाचा और मम्मी शराब पी कर अश्लील बातें ही नहीं, अश्लील हरकतें करने लगते थे. कल रात भी जब दोनों नशे में एकदूसरे से अश्लील हरकतें करने लगे तो मैं रात 10 बजे के करीब गुस्से में सहेली के घर चली गई थी.’’

‘‘सुबह तुम्हें घटना की खबर कैसे मिली?’’

‘‘करीब 8 बजे सहेली के पापा ने मुझे बताया.’’ कह कर ज्योति रोने लगी.

इंसपेक्टर एस.एस. राठी ने उसे सांत्वना दे कर पूछा, ‘‘तुम्हारे खयाल से तुम्हारी मम्मी और चाचा की हत्या कौन कर सकता है?’’

‘‘साहब, पता नहीं इन्हें किस ने मारा है, मुझे सिर्फ इतना पता है कि पापा की मौत के बाद मम्मी बेलगाम हो गई थीं.’’

एस.एस. राठी को इस हत्याकांड की वजह समझ में आ गई. उन्होंने सुनीता के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर देखी तो उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उन्हें संदेह हुआ. वह नंबर ज्योति के पति कप्तान सिंह का था. कप्तान के नंबर पर घटना वाली रात पौने 2 बजे सुनीता के फोन से फोन किया गया था.

एस.एस. राठी की समझ में यह नहीं आया कि जब कप्तान के संबंध सास और पत्नी से ठीक नहीं थे तो उतनी रात को सुनीता ने कप्तान को फोन क्यों किया? इस बारे में उन्होंने ज्योति से बात की तो उस ने बताया कि उस के और मम्मी के कप्तान से कोई संबंध नहीं थे, इसलिए फोन पर बात करने वाली बात संभव नहीं है. उन्होंने ज्योति से कप्तान का पता ले लिया. वह हरियाणा के भालगढ़ का रहने वाला था. पुलिस ने उस के यहां छापा मारा और उसे हिरासत में ले कर दिल्ली आ गई.

कप्तान सिंह से जब इस दोहरे हत्याकांड के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि राजेश और सुनीता की हत्या उस के छोटे भाई अमित ने अपने दोस्त सुमित शर्मा के साथ मिल कर की थी. इस के बाद कप्तान सिंह की निशानदेही पर पुलिस ने रोहतक के गांव बिचपड़ी से सुमित शर्मा और सोनीपत से अमित को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उन दोनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

रामकुमार मूलरूप से हरियाणा के सोनीपत जिले के हुमायूंपुर के रहने वाले जिले सिंह का बेटा था. उस के पास खेती की 7 एकड़ जमीन थी. उस के परिवार में 2 बेटियों के अलावा एक बेटा अंकित था. बाद में उस ने दिल्ली के रनहौला में मकान बनवा लिया और परिवार के साथ वहीं रहने लगा.

सुनीता हरियाणा के रोहतक की रहने वाली थी. शादी से पहले ही उस के कदम बहक गए थे. जब परिवार की बदनामी होने लगी थी तो पिता ने उस का विवाह रामकुमार से कर दिया था. रामकुमार की कुछ जमीन अच्छे पैसों में बिकी थी, इसलिए वह जम कर शराब पीने लगा था. बाद में सुनीता को भी उस ने अपने रंग में रंग लिया था. लगातार ज्यादा शराब पीने से रामकुमार की बड़ी आंत में कैंसर हो गया, जिस से उस की मौत हो गई. सुनीता को पति के मरने का कोई गम नहीं हुआ, इस के बाद वह और भी स्वच्छंद हो गई. इलाके के कई युवकों से उस के नाजायज संबंध बन गए.

शराब पी कर वह रात में अपने किसी प्रेमी को बुला लेती. बड़ी बेटी का विवाह रामकुमार के सामने ही हो चुका था. छोटी बेटी ज्योति ने मां की अय्याशी पर लगाम लगाने की कोशिश की तो उस ने उस का विवाह कप्तान सिंह से कर के उसे दूर कर दिया. कप्तान सिंह सोनीपत में संगमरमर का व्यापार करता था. वह भी पक्का शराबी था. शराब पी कर वह ज्योति से मारपीट करता था. पति से तंग आ कर वह मायके आ कर रहने लगी. सुनीता के अवैध संबंध अपने सगे देवर राजेश से भी थे. शादीशुदा राजेश की नजर सुनीता की संपत्ति पर थी. इसलिए वह उसे दूसरी पत्नी के रूप में रखना चाहता था.

कप्तान का परिवार खानदानी और रईस था. कप्तान और घर वालों को सुनीता के चालचलन की जानकारी हो चुकी थी, इसलिए कप्तान के मातापिता नहीं चाहते थे कि ज्योति मायके में रहे. उन्हें इस बात का अंदेशा था कि सुनीता कहीं ज्योति को भी अपनी तरह न बना दे. इसलिए उन्होंने ज्योति को लाने के लिए कप्तान और छोटे बेटे अमित को कई बार रनहौला भेजा.

मांबेटी ने दोनों भाइयों को हर बार अपमानित कर के भगा दिया था. कप्तान और उस के घर वालों को सुनीता की हर खबर मिलती रहती थी. लोग उस की अय्याशी के किस्से सुना कर उन की हंसी उड़ाते थे. इस से अमित का खून खौल उठता था. वह अकसर भाई से कहा करता था कि उस की सास की वजह से उन लोगों की बड़ी बदनामी हो रही है. देखना एक दिन वह उसे मार देगा.

एक दिन अमित सुनीता के घर गया और सुनीता को काफी समझाया. यही नहीं, उस ने चेतावनी भी दी कि वह सुधर जाए वरना अंजाम बुरा होगा. सुनीता ने उस की धमकी पर गौर करने के बजाय उसे धक्के मार कर घर से भगा दिया. अपमानित हो कर अमित घर तो लौटा आया, लेकिन उस ने तय कर लिया कि वह उसे जीवित नहीं छोड़ेगा. अपने दोस्त सुमित शर्मा के साथ मिल कर उस ने सुनीता की हत्या की योजना बना डाली.

रोज की तरह 6 अगस्त, 2016 की रात करीब 12 बजे अमित सुमित शर्मा को ले कर सुनीता के घर पहुंचा. सुनीता ने गुस्से में कहा, ‘‘इतनी रात को तुम लोग यहां क्या लेने आए हो?’’

अमित उसे धक्का दे कर अंदर ले गया तो नशे में धुत सुनीता उसे गालियां देने लगी. दूसरी मंजिल की छत पर शराब पी रहे राजेश को पता चला कि अमित आया है तो वह भी अमित को ऊपर से गालियां देने लगा. अमित का पारा चढ़ गया. वह छत पर पहुंचा और राजेश के चेहरे पर घूंसे मारने लगा.

सुमित भी ऊपर पहुंचा. वहां रखा हथौड़ा उठा कर पूरी ताकत से उस ने राजेश के सिर पर मारा, जिस से उस का सिर फट गया और थोड़ी देर में उस की मौत हो गई. सुनीता डर कर नीचे अपने कमरे की ओर भागी तो अमित और सुमित भी उस के पीछे दौड़े. सुमित ने बरामदे में सुनीता को दबोच लिया. अमित ने रसोई से सब्जी काटने वाली छुरी ला कर सुनीता का गला रेत दिया. सुनीता भी कुछ देर में मर गई.

इस के बाद अमित ने कहा, ‘‘सुमित, अपना फोन देना. पुलिस को हमारी लोकेशन का पता न चले, इसलिए मैं अपना फोन नहीं लाया.’’

अमित की नजर बैड पर रखे सुनीता के मोबाइल पर गई तो उस ने फोन उठा कर बड़े भाई कप्तान का नंबर मिला कर कहा, ‘‘मैं ने उस कुलटा को सबक सिखा दिया है.’’

इस के बाद सुमित के साथ मकान से बाहर आया और पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचा, जहां से सुबह 5 बजे ट्रेन से सोनीपत चला गया. अमित निश्चिंत था कि किसी को पता नहीं चलेगा कि राजेश और सुनीता की हत्या किस ने की है मगर सुनीता की हत्या उस ने की है, लेकिन सुनीता के फोन से कप्तान को फोन कर के उस ने जो भूल की, उसी ने उसे कानून के फंदे में फंसा दिया.

8 अगस्त को पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड का मुकदमा अमित और सुमित के खिलाफ दर्ज कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. चूंकि कप्तान हत्याकांड में शामिल नहीं था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया. मामले की जांच एस.एस. राठी कर रहे हैं.      

- उमेश त्रिवेदी

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