सरिता विशेष

मैं 35 वर्षीया विवाहिता, 12 साल के बेटे की मां हूं. मेरा बेटा पढ़ाईलिखाई में अच्छा है. आजकल उस के व्यवहार में कुछ बदलाव आ गया है. कुछ समय से वह बड़ों की तरह व्यवहार कर रहा है. जब हम ने इस की वजह जानने की कोशिश की तो पता चला कि मेरी देवरानी, जिस के विवाह को 6 साल हो गए हैं, मेरे बेटे के साथ कुछ अजीब व्यवहार करती है. वह मेरे बेटे को जबरदस्ती अपने साथ सुलाती है और उस के साथ अश्लील व्यवहार करती है. एक बार मेरे पति ने भी उसे ऐसा करते हुए देखा. जब हम ने बेटे से इस बारे में पूछा तो उस ने बताया कि चाची ऐसा 2-3 सालों से कर रही हैं. जब हम ने इस बारे में देवर और सासससुर से बात की तो वे डर कर बोले कि अगर हम कुछ कहेंगे तो वह दहेज के झूठे केस में फंसवा देगी. घर में सभी उस से डरते हैं. वह अपनी मनमरजी करती है. इस समस्या से कैसे निकलें?

इस तरह की बातें कम होती हैं पर नहीं होतीं, कहा नहीं जा सकता. इस तरह का पीडोफीलिया दुनियाभर में होता है. अब जब आप को अपनी देवरानी की अश्लील हरकतों का पता चल गया है तो अपने बेटे को उस से दूर रखें. बेटे के उज्ज्वल भविष्य के लिए चाहें तो उसे होस्टल में भेजने का निर्णय लें. देवरानी को घर से अलग करने की बात कहें या फिर खुद अलग घर में चली जाएं. आप जितना उस से डरेंगी वह आप पर हावी होगी. जहां तक दहेज के झूठे केस में फंसाने की बात है, आप पहले ही किसी पुलिस अफसर से मिल कर सलाह ले लें. हो सकता है वह दहेज का झूठा केस बनाने की कोशिश में आप का साथ दे. यह समझना होगा कि आप का देवर भी अपनी पत्नी की बात को सही मानेगा और भतीजे की बात को झूठ.

मैं 67 वर्षीय पुरुष हूं. मृत्यु के बाद देहदान करना चाहता हूं. इस बारे में जानकारी दीजिए.

देहदान ऐसी प्रक्रिया है जिस में इंसान अपनी मृत्यु के बाद अपने अंगों का दान कर के किसी दूसरे शख्स की जिंदगी बचा सकता है. वे व्यक्ति जो यह समझते हैं कि मृत्यु के बाद उन की देह किसी के काम आए तो वे अपना पंजीकरण किसी भी मैडिकल शिक्षण संस्थान के एनाटोमी विभाग में करवा सकते हैं. इस के लिए हर मैडिकल संस्थान में एक सहमति फार्म निशुल्क उपलब्ध होता है. अंग रिट्रीवल बैंकिंग संगठन यानी ओआरबीओ मैडिकल साइंसेज के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स, नई दिल्ली में स्थित है. इस संगठन का संबंध अस्पतालों, संगठनों के साथ रहता है. यह अंगदाता और बीमार रोगियों की प्रतीक्षा सूची रखता है. आप यहां से भी देहदान के लिए फार्म ले सकते हैं. इस फार्म पर 2 गवाहों के हस्ताक्षर होने जरूरी होते हैं. आप भले ही किसी भी धर्म या जाति के हों, अपने दिल, फेफड़े, जिगर, गुर्दा, हड्डियां व त्वचा आदि का दान कर सकते हैं.

मैं 20 वर्षीया, मध्यवर्गीय अविवाहिता हूं. मेरे पिता नहीं हैं और मां एक सरकारी स्कूल में टीचर हैं. मैं देखने में सुंदर हूं और अभिनय में रुचि रखती हूं, अभिनेत्री बनना चाहती हूं पर मेरी मां और बौयफ्रैंड नहीं चाहते कि मैं फिल्मलाइन में जाऊं. आप मुझे अभिनेत्री बनने का कोई आसान रास्ता बताइए?

आप की अभिनय में रुचि है और आप अभिनेत्री बनना चाहती हैं. इस में कोई बुराई नहीं है. आप अभिनेत्री बनने के लिए आसान राह जानना चाहती हैं. देखिए, सफल होने की राह आसान नहीं होती फिर चाहे वह अभिनय की ही क्यों न हो. वहां भी संघर्ष करना पड़ता है. अपनी मां की मरजी के खिलाफ कोई रास्ता न अपनाएं. अगर आप समझती हैं कि आप में सचमुच काबिलीयत है तो अपनी मां को इस का विश्वास दिलाएं व उन की मरजी के अनुसार ही कोई निर्णय लें. इस क्षेत्र में जोखिम है पर सफलता उन्हें ही मिलती है जो जोखिम लेते हैं.

मैं 36 वर्षीय विवाहित, 2 बच्चों का पिता हूं. ससुराल में केवल सास हैं जो बीमार रहती हैं. मेरी पत्नी उन की इकलौती संतान है. सास की बीमारी के कारण मैं और मेरे घर वाले पत्नी को हर 10-15 दिन में मायके भेज देते थे. पत्नी अब बच्चों व घरपरिवार की जिम्मेदारी नहीं समझती. सास भी बेटी को समझाने के बजाय बारबार अपने पास बुलाती रहती हैं. एक बार तो पत्नी ने हद ही कर दी, 1 वर्षीय बेटी को मेरे पास छोड़ कर मां के पास चली गई और वहां से उन्हें उन की बहन के घर ले गई. मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया. जब मैं ने फोन किया तो फोन काट दिया. मुझे कहीं से असलियत पता चली तो मैं उन के घर गया. सास की तबीयत खराब थी.  मैं ने इलाज करवाया व पत्नी को समझाबुझा कर घर ले आया. लेकिन पत्नी के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया. सास भी बारबार फोन कर के बेटी को सिखाती रहती हैं कि घर का काम मत करना आदि. पत्नी गैरजिम्मेदार होती जा रही है. जिंदगी बहुत तनावपूर्ण हो गई है. आप ही राह सुझाइए.

आप की पत्नी आप की उदारता व आजादी का गलत फायदा उठा रही है. मां की बीमारी को हथियार बना कर वह घरपरिवार की जिम्मेदारियों से भाग रही है, जो सरासर गलत है. ऊपर से आप की सास भी बेटी को सही सीख देने के बजाय गलत राह दिखा रही हैं. आप को अपनी पत्नी से सीधेसीधे बात करनी चाहिए. पत्नी से कहें कि आप उसे मायके तभी भेजेंगे जब वहां वास्तव में जरूरत होगी और घर की जिम्मेदारी समझने के लिए भी पत्नी से कड़े शब्दों में कहें. आप पत्नी से कहें कि जिस तरह आप अपनी सास के बारे में सोचते हैं उसी तरह उसे भी आप के परिवार के बारे में सोचना होगा, तभी गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर आएगी.