कितना महंगा दौरा

7 जून को जबलपुर के हवाई अड्डे का नजारा देखने लायक था, सैकड़ों कर्मचारियों, अधिकारियों, छोटेबड़े नेताओं सहित हजारों सुरक्षाकर्मी वहां मौजूद थे. दर्जनों एंबुलैंस और फायर ब्रिगेड की गाडि़यां खड़ी थीं. एअरपोर्ट पर तकरीबन 300 सरकारी और 3 हजार गैरसरकारी वाहन खड़े थे.

बात सिर्फ इतनी थी कि इसी दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को महज 5 मिनट वहां रुकना था. वे शंकराचार्य स्वरूपानंद के आश्रम में आंखों के एक अस्पताल का उद्घाटन कर के लौट रहे थे. अंदाजा लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति की तीनदिवसीय मध्य प्रदेश यात्रा पर कितने करोड़ रुपए खर्च हुए होंगे. यह फुजूल खर्च है और जनता के पैसों की बरबादी. यह ब्रिटिशकाल की याद दिलाती है. वे तो गैर थे पर ये तो अपने हैं जिन्हें इस तरफ ध्यान देना चाहिए. सिर्फ नाम के आगे से महामहिम शब्द हटवा देने के अलावा भी करने को बहुत कुछ है.

काश ऐसा कर पाते मुलायम

‘मैं अगर सीएम होता तो यूपी को 15 दिन में ठीक कर देता.’ मुलायम सिंह के इन शब्दों में उत्तर प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था की स्वीकारोक्ति भी थी. अब कौन मुलायम सिंह को बताए कि यूपी तो शुरू से ही ऐसा है. वजह, वहां पसरा जातिवाद, भेदभाव और गुंडागर्दी है. लोगों ने बहुजन समाज पार्टी को मौका दिया तो वह भी कांगे्रसी संस्कृति की निकली. सब के सब लाइन से लूटखसोट में लगे रहे. नेताओं और बाबुओं ने पेट भर खाया.

यूपी ठीक हो न हो, पर विदेश में पढ़े अपने देशी बेटे को मुलायम ठीक कर एक आदर्श पिता की भूमिका निभा पाएं तो जरूर यूपी पर उपकार करेंगे. चमकदमक पर सादगी का रैपर लपेट कर जीने वाले अखिलेश दरअसल चाटुकार अधिकारियों और नेताओं से घिरे रहते हैं. ऐसे में यूपी की हालत तो और भी बिगड़ना तय है.

लौट आए लालू

उपचुनाव सप्लीमैंटरी इम्तिहान की तरह होते हैं, मिला मौका भुना लिया तो ठीक, वरना साल खराब होना तय है. 2014 में आम चुनाव होने के मद्देनजर यह साल राजनेताओं के लिए बेहद अहम है जिस में लालू यादव चूके नहीं. राजद ने महाराजगंज लोकसभा सीट जीत कर नीतीश को अचंभित कर दिया.

आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के प्रति मतदाताओं का झुकाव ज्यादा रहता है, लेकिन यह अपवाद है, नियम नहीं. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो नीतीश कुमार फेल हो गए हैं. लालू जोश में हैं क्योंकि इस जीत की उन्हें सख्त जरूरत थी. उम्मीद है इस नतीजे से मुद्दत से सुस्त पड़े उन के साथी रामविलास पासवान भी जल्द ट्रैक पर आ जाएंगे. बिहार बदले न बदले पर लालू का भविष्य जरूर बदलता दिख रहा है.

अभी दिल्ली दूर है

आम आदमी पार्टी यानी आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ नई दिल्ली विधानसभा से चुनाव लड़ने का ऐलान कर सनसनी फैलाने की असफल कोशिश की तो बाछें सिर्फ सटोरियों की खिलीं क्योंकि इस सीट पर तगड़ा दांव लगेगा. यों शीला दीक्षित उतनी भ्रष्ट हैं नहीं जितना उन्हें यह नवजात पार्टी बता रही है और इस बताने भर से मतदाता नहीं मानने वाला. शीला दीक्षित की अपनी जमीनी पकड़ काफी मजबूत है.

बेहतर तो यह होता कि केजरीवाल पहले अपना विधानसभा पहुंचना सुनिश्चित करते जिस से वे अपनी लड़ाई सदन में भी जारी रख पाते जो सड़कों पर फ्लौप सी हो गई है. अन्ना हजारे की यात्रा अब खबर भी नहीं बनती, यह भी उन्हें ध्यान रखना चाहिए. पहले झपट्टे में केजरीवाल का शेर के शिकार का ख्वाब पूरा होगा या नहीं, इस के लिए थोड़ा इंतजार सभी को करना ही होगा.