सरिता विशेष

दूरसंचार कंपनियों में इन दिनों मोबाइल सेवाप्रदाता रिलायंस जियो इंफो कौम लिमिटेड और उस के द्वारा निशुल्क दिया जा रहा उस का सिमकार्ड ‘जियो’ ही चर्चा में हैं. जनसामान्य के लिए ‘जियो’ इंटरनैट दुनिया का आनंद लेने का सब से बड़ा जरिया बन गया है. मिस्डकौल कर के दूसरी तरफ से कौलबैक का इंतजार करने वाले भी अब खूब बातें करते हैं और ‘जियो’ का सिम है, इसलिए फोन नहीं काटने की हिदायतें देते हैं.

पिछले वर्ष सितंबर में जब रिलायंस ने जियो सिम 3 माह के लिए निशुल्क जारी किया तो इस के लिए लंबी कतारें लग गईं. क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में निशुल्क सुविधा वाला यह सिम ब्लैक में बिकने लगा. अब फिर इस निशुल्क सेवा की अवधि 31 दिसंबर से 31 मार्च तक बढ़ा दी गई है. हर हाथ तक लगभग जियो की पहुंच हो चुकी है. ऐसे में अन्य सेवाप्रदात्त कंपनियों में प्रतिस्पर्धा आ गई और उन्हें दरों में कटौती के प्लान पेश करने को मजबूर होना पड़ा.

देश की सब से बड़ी सेवाप्रदाता एयरटेल को दिसंबर में जियो के कारण 55 फीसदी का नुकसान हुआ. 3 साल में कंपनी का यह सब से बड़ा नुकसान है. उस का कुल राजस्व भी 3 फीसदी तक घटा है, उस का तीसरी तिमाही का मुनाफा पिछले वर्ष इस अवधि के 1,108. 2 करोड़ रुपए से घट कर 503.6 करोड़ रुपए रह गया है. दूसरी सेवाप्रदाता कंपनियों का भी ऐसा ही हाल है.

फ्री की सेवा का लाभ उठाने में सब को आनंद आता है और हमारे लिए फ्रीसेवा तो ज्यादा ही लुभावनी होती है. इसी का फायदा राजनीतिक दल चुनाव के समय भी उठाते हैं. निशुल्क चावल, कंप्यूटर, बिजली आदि की बात कर के मतदाताओं को लुभाया जाता है.

हमें यह जरूर विचार करना चाहिए कि  निशुल्क सेवा देने की बात करने वाला इस का कैसे फायदा उठा रहा है. कोई भी बिजनैसमैन तब तक फ्री कुछ नहीं दे सकता जब तक उसे लाभ नहीं मिल रहा हो वरना उस का कारोबार ठप हो जाएगा. हमें फ्री पाने की मानसिकता से परहेज करना होगा और स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए सेवा के बदले शुल्क अदा करने की आदत विकसित करनी होगी.