हम लगातार पढ़ रहे हैं कि भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है. उस को ले कर भ्रम की स्थिति कभी नहीं रही. लेकिन हाल ही में अमेरिकी अर्थशास्त्री तथा 2008 का नोबेल पुरस्कार पाने वाले पौल कु्रगमैन ने भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में जो बात कही है उसे देख कर लगता है कि हमें सिर्फ गुमराह किया जा रहा है कि भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.

क्रुगमैन का कहना है कि भारत में गरीबी और असमानता साफ दिखती है. गरीबी यहां खत्म नहीं हो रही है, इसलिए तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का भ्रम पालना ठीक नहीं है. यह सच है कि भारत में पहले की तुलना में गरीबी की संख्या घटी है और लोगों की खरीद क्षमता बढ़ी है. और यह भी सही है कि ब्रिटेन ने जिस अमीरी को पाने में 150 वर्ष लगा दिए, भारत यह स्तर महज ढाई-तीन दशकों में ही हासिल कर चुका है लेकिन स्थिति अब भी बहुत अच्छी नहीं है.

उन्होंने बेरोजगारी को भारत का सब से बड़ा मौजूदा संकट बताया और कहा कि उस के  लिए विनिर्माण क्षेत्र पर फोकस करना जरूरी है. अकेले सेवा क्षेत्र के बल पर स्थायी तरक्की हासिल नहीं की जा सकती. इस के लिए विनिर्माण क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना जरूरी है.

भारत में गरीबी उन्मूलन पर काम हुआ है लेकिन आर्थिक असमानता को दूर करने के प्रयास नहीं हुए हैं. इस स्थिति में आर्थिक विकास की सही तसवीर पेश नहीं की जा सकती. भारतीय युवा पीढ़ी के लिए रोजगार सृजन जरूरी है और यही आर्थिक विकास को गति दे सकता है.

रोजगार वास्तव में सब से बड़ा संकट है. बाजार में नौकरियां ही नहीं हैं. स्थायी नौकरी की अवधारणा खत्म हो चुकी हैं. अस्थायी नौकरी में अनिश्चितता बरकरार है. नौकरी पाने के लिए संघर्ष करने के बजाय युवाओं को स्वावलंबी बनाने की जरूरत है. युवा पीढ़ी स्वरोजगार की तरफ आकर्षित हो कर नौकरी पाने के सपने के बजाय नौकरी देने के सपने के साथ काम करे तो स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है और तब कु्रगमैन को कहना पड़ेगा कि भारत तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है.

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