मिलावट हमारे बाजारतंत्र का अभिन्न हिस्सा बन गई है. खाद्य पदार्थों में खतरनाक रसायनों की मिलावट की जा रही है. घूस और रिश्वत के सामने ईमानदारी और लोगों के स्वास्थ्य की चिंता घुटने टेक रही है. सब्जियों और फलों को खतरनाक कैमिकलों से धो कर उन को पकाया व चमकाया जा रहा है.

दालों, तेल आदि में मिलावट की खबरें आम हो चुकी हैं. त्योहारी सीजन पर मिलावटी मावा बरामद किए जाने की खबरें आती हैं. देशी घी में मिलावट की खबरें पुरानी पड़ चुकी हैं. जब मिलावट होती है, खबरें आती हैं तो सामान्य सी खबर सोच कर उस पर कोई खास ध्यान नहीं देता है. दूध रोज के इस्तेमाल की वस्तु है, लेकिन उस में तरहतरह की मिलावट की जाती है.

ऐसा नहीं है कि इन सब पर नियंत्रण की हमारे यहां व्यवस्था नहीं है. कागजी कार्यवाही को दुरुस्त रखने की कला हमारे बाबुओं से ज्यादा किसी को नहीं आती. नियामक प्राधिकरण भी हैं, लेकिन वहां भी कागज एकदम दुरुस्त मिलते हैं.

खाद्य वस्तुओं पर सुरक्षा नियामक है जो नियम बनाता है और उसे लागू करता है. उस के लिए खाद्य सुरक्षा एवं स्टैंडर्ड अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसएआई) है. हाल ही में इस संगठन ने हिंदुस्तान यूनिलीवर, नेस्ले, एमटीआर, ब्रिटानिया, पतंजलि, आईटीसी सहित 15 कंपनियों से अपने खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक तथा फैट की मात्रा घटाने को कहा है. सभी संस्थान नियामक की सलाह से सहमत हैं और आने वाले वक्त में इसे पैकेट के बाहर लिख भी देंगे, क्योंकि खाद्य पदार्थ के पैकेट पर मिश्रण की मात्रा लिखना अनिवार्य है.

यह कदम अच्छा है, साथ ही, मिलावट की जांच या शिकायत के लिए उपभोक्ता कहां जाएं, इस की जानकारी भी पैकेट पर होनी चाहिए. पैकेट पर शिकायत करने के लिए नंबर होना चाहिए जहां आसानी से उपभोक्ता शिकायत दर्ज करा सके.