विश्व के आर्थिक मंच पर तेजी से उभर रहे भारत को अर्थशास्त्री विदेशों में छवि पर विशेष ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं. यह ठीक है कि विश्व बैंक जैसी प्रमुख संस्थाएं भारत की विकास गतिविधियों से बहुत प्रभावित हैं लेकिन हमें इस से भी आगे जा कर देश के राजनीतिक हालात से बनने वाली छवि में सुधार लाने की जरूरत है. यह सुझाव 2001 में अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले अर्थशास्त्री जोसेफ ई स्टिगिल्ट्ज ने हाल में बेंगलुरु में प्रायोजित एक कार्यक्रम में दी.

स्टिगिल्ट्ज खुद भारत की आर्थिक तरक्की की रफ्तार से प्रभावित हैं लेकिन उन का विश्वास है कि भारत को अपनी छवि में, विदेशों में विशेष रूप से, सुधार लाना है. उन का कहना है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय विवाद जैसी घटनाओं के कारण दुनिया में भारत की छवि संकुचित हो रही है. खुद सरकार को इस तरह की घटनाओं पर अपनी स्थिति साफ करनी जरूरी है. उन का यह भी मत है कि भारत के स्वयंसेवी संगठनों यानी एनजीओज के बारे में भी विदेशों में अच्छी राय नहीं है. इस बाबत भारत की छवि रूस, मिस्र और तुर्की जैसे देशों के समान ही नजर आती है. इस से माहौल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. नतीजतन, अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है.

एनजीओज सचमुच एक बड़ी समस्या है. विदेश ही नहीं, देश में भी इन के प्रति लोगों की अवधारणा ठीक नहीं है. कुछ संगठनों को छोड़ दें, ज्यादातर एनजीओज सिर्फ मोटी कमाई का जरिया बने हुए हैं. कई संगठन प्रभावशाली आईएएस अफसरों की पत्नियां और रिश्तेदार चला रहे हैं. बड़े राजनेता एनजीओज से मिली कमाई पर राजनीति कर रहे हैं. वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल अपने करीबियों द्वारा संचालित एनजीओज को फंड देने के लिए कर रहे हैं. इस से एनजीओज की अवधारणा ध्वस्त हो रही है. इसलिए इन पर रोक लगाने की सख्त जरूरत है.