दवाएं बहुत बड़े स्तर पर नकली मिलती हैं, इसलिए कई ग्राहक दवा की खरीद का बिल मांगते हैं. दवा विक्रेता बिल देने से कतराता है या अतिरिक्त पैसे की मांग करने लगता है. उस का तर्क होता है कि बिल पर कर लगता है, इसलिए वह ज्यादा पैसे लेता है. अब सरकार दवा की कीमतों पर नियंत्रण के लिए बड़ा कदम उठा रही है.

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय इस संबंध में मसौदा तैयार कर रहा है. मंत्रालय यह मसौदा दवा मानक एवं नियंत्रण संगठन के उस प्रस्ताव पर तैयार कर रहा है जिस में सुझाव दिया गया है कि दवा पैकेट पर अधिकतम मूल्य के साथसाथ उस के निर्माण पर आई लागत भी लिखनी होगी. इसे फैक्टरी लागत कह सकते हैं.

फैक्टरी लागत दवा के पैकेट पर लिखने से दवा विक्रेता मनमानी नहीं कर सकेंगे और दवाओं के ज्यादा दाम भी नहीं वसूल पाएंगे. इस पर कर कितना लगा है, जीएसटी में इस का प्रावधान है, इसलिए उपभोक्ता आसानी से हिसाब लगा सकता है. इसी तरह से आयात की गई दवा पर देश में पहुंचने के समय उस दवा की कीमत लिखी होगी.

दवा बाजार में पारदर्शिता लाने की यह कोशिश मनमाने दाम वसूलने वाले दवा विक्रेताओं को पसंद नहीं आ रही है. दवा कारोबारी इस से बहुत परेशान हैं. वे नहीं चाहते हैं कि दवा कौस्मेटिक अधिनियम में बदलाव हो, हालांकि यह कदम करोड़ों उपभोक्ताओं के हित में है.

वर्ष 1996 में बने इस कानून में बदलाव लाने से दवा बाजार में और पारदर्शिता आएगी. दवा की एमआरपी और फैक्टरी लागत के बीच का अंतर ग्राहक को दिखेगा तो दवा की कीमत नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.