केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की योजना लघु, सूक्ष्म और मध्यम (एमएसएमई) उद्यमिता को बढ़ा कर देश में रोजगार के बेशुमार अवसर उपलब्ध कराने की है. चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 करोड़ लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने की घोषणा की थी. शायद उन के इन वादों की बुनियाद में इसी उद्योग को प्रोत्साहित कर के बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देने की सोच थी.

सरकार बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में तेज कदम बढ़ाए और सब से पहले बैंकों को इस तरह के उद्योग शुरू करने में मदद देने के वास्ते प्रोत्साहित किया. गैरनिष्पादित राशि यानी एनपीए के बोझ तले दबे बैंक इस उत्साह से भागीदार बनने में ज्यादा उत्सुक नजर नहीं आए तो सरकार ने उन के लिए ऋण उपलब्ध कराने का एक लक्ष्य तय किया.

आश्चर्य की बात यह है कि इस वर्ष जून तक सरकारी क्षेत्र के 27 बैंकों में इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, बैंक औफ महाराष्ट्र, विजय बैंक, स्टेट बैंक औफ इंडिया, त्रावणकोर तथा हैदराबाद, बैंक औफ बड़ौदा, पंजाब नैशनल बैंक तथा महिंद्रा बैंक ही सरकार के इस लक्ष्य को हासिल कर सके हैं. मतलब यह है कि 75 फीसदी सरकारी बैंक सरकार के इस लक्ष्य को हासिल करने में चूके हैं.

सरकार मानती है कि एमएसएमई 10 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध करा कर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 37 फीसदी और निर्यात में 40 फीसदी की हिस्सेदार है. इस स्थिति में सरकारी बैंकों की यह निराशाजनक भूमिका चौंकाने वाली है. सही बात यह है कि बैंक ऋण देने के मामले में मनमानी करते हैं.

हर जिले में अनुसूचित बैंकों की शाखाएं खुल रही हैं. इस के बावजूद ये बैंक आम आदमी को फायदा पहुंचाने वाले ऋण के बजाय बैंक का फायदा करने वाले ऋण पर ज्यादा केंद्रित रहते हैं. यह मनमानी स्थानीय प्रबंधन की होती है जबकि इन्हीं बैंकों से 9 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले कर विजय माल्या फरार हो जाता है.

बैंकों की दोहरी नीति जनसामान्य के लिए परेशानी देने वाली है. इस नीति पर सख्ती होनी चाहिए और सख्ती तब ही होगी जब सामान्य लोग शिकायत करेंगे और उन पर ध्यान दिया जाएगा. एमएसएमई के जरिए देश में सचमुच रोजगार के प्रचुर अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं.