सरिता विशेष

चालू मौसम में गेहूं की बोआई के समय एक बार फिर से खाद की बढ़ी कीमतों से किसानों की लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है. ऐसे में अगर किसान रासायनिक खाद की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग करें तो न केवल किसानों का मुनाफा बढ़ेगा, बल्कि खेत की सेहत भी ठीक रहेगी. रासायनिक खाद का प्रयोग खेत की मिट्टी की जांच के बाद ही जरूरत के अनुसार करें. अंधाधुंध रासायनिक खाद का प्रयोग करने से पैदावार बढ़ने के बजाय खेत को नुकसान होता है और खेती की लागत भी बढ़ती है. ऐसे में किसान को ही परेशान होना पड़ताहै.

जिस समय किसान अपने खेतों में बोआई कर रहे थे, उस समय खाद की दुकानों से डीएपी खाद गायब हो गई थी, जिस से किसानों को महंगे दामों पर खादें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा. जब किसान गेहूं की फसल काटने के लिए तैयार हो रहे थे और गेहूं की फसल में आखिरी बार खाद डालने की बारी आई तो दुकानों से यूरिया खाद गायब हो गई. यूरिया संकट ने किसानों के सामने समस्या खड़ी कर दी. रबी की फसलों विशेषकर गेहूं की फसल में जनवरीफरवरी के दौरान खाद डालने की जरूरत होती है. इस समय तक गेहूं में दूसरी और तीसरी सिंचाई की जरूरत होती है. इस के बाद यूरिया खाद डाली जाती है.

यूरिया खाद दुकानों में भरपूर मात्रा में न होने से किसानों को महंगे दामों पर इसे खरीदना पड़ रहा है. इस के चलते यूरिया के लिए मारामारी मची है. उत्तर प्रदेश के बहुत सारे जिलों में यूरिया खाद की कालाबाजारी शुरू हो गईहै. तमाम किसान कृषि विभाग को इस बारे में शिकायतें भी भेज रहे हैं, लेकिन विभाग इस बात को मान ही नहीं रहा है कि प्रदेश में यूरिया खाद की कोई कमी है. उत्तर प्रदेश में यूरिया खाद का भाव 3 सौ रुपए प्रति बोरी है. खाद की कमी के चलते किसानों को 375 से 400 रुपए प्रति बोरी खाद खरीदनी पड़ रही है. सब से बड़ी परेशानी उन जिलों में है, जहां पर सहकारी संस्थाएं काम नहीं कर रही हैं. मगर अब खाद की कमी से परेशान होने की जरूरत नहीं है. किसानों को इस की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए. इस से पैदावार बढ़ेगी और लागत मूल्य कम होगा.

रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद

गेहूं की बोआई के समय प्रदेश में डीएपी खाद की कमी हो गई थी, जिस का प्रभाव गेहूं की फसल पर पड़ रहा है. डीएपी खाद की कमी को पूरा करने के लिए किसान गेहूं में यूरिया ज्यादा डालना चाह रहे थे. अब यूरिया भी नहीं मिल रही है, जिस से गेहूं की पैदावार पर असर पड़ेगा. गेहूं की बोआई के समय ही आलू की बोआई भी होती है, इसलिए आलू किसान भी डीएपी खाद न मिलने से परेशान हुए थे. किसान सेवा केंद्रों पर आधी रात से लाइन लगाए खड़े किसान जब बेकाबू हो जाते थे, तो धरनाप्रदर्शन करने लगते थे, जिसे काबू करने के लिए पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती थीं. किसानों को खाद मिलने की जगह पर पुलिस की लाठियां खानी पड़ती थीं.

उस समय भी कृषि विभाग के अधिकारी खाद की कमी को नहीं मानते थे. अफसरों का कहना था कि किसान खाद को खरीद कर जमा कर रहे हैं, जिस से बाजार में खादों के दाम बढ़ गए हैं. किसान जबरदस्ती की हड़बड़ी दिखा कर परेशानी पैदा कर रहे हैं.

किसानों का कहना है कि जब तक गेहूं की बोआई चली तब तक खाद का संकट बना रहा. कृषि विभाग ने रबी फसलों की बोआई के लिए बहुत सारी योजनाएं तो पहले बना ली थीं, पर खाद संकट न हो इस की कोई योजना नहीं बनाई. इसी का नतीजा है कि डीएपी के बाद यूरिया खाद का संकट आ गया है.

कृषि विभाग ने हर जिले में खाद वितरण पर नजर रखने के लिए कंट्रोल रूप भी बनाए थे, जहां पर किसान अपनी शिकायत दर्ज करा सकते थे. यह व्यवस्था की गई कि खाद का वितरण सरकारी कर्मचारी की मौजूदगी में ही किया जाए. इस के लिए ब्लाक, तहसील या फिर विभाग का कर्मचारी वहां पर मौजूद रहे. इस के बाद भी जिलेवार हालात बहुत खराब दिखे.

जब बोआई का समय आता है तभी बाजार से खाद गायब हो जाती है. खाद की कमी से कालाबाजारी होने लगती है. किसानों को महंगे दामों पर खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

नए तरीके से बनाएं जैविक खाद

खाद की कमी केवल बड़े शहरों में ही नहीं है. छोटे शहरों का हाल भी बुरा है. जालौन जिले के माधौगढ़, आटा व जोल्हूपुर इलाके के किसान डीएपी और यूरिया खाद के न मिलने से परेशान हैं. जालौन के किसानों का कहना है कि मटर, चना, मसूर, तिलहन और गेहूं की बोआई के समय डीएपी खुले बाजार में मौजूद नहीं थी, जिस के कारण उन्हें बहुत परेशान होना पड़ा.

सरकार ने किसानों को राहत देने के नाम पर सरकारी कीमत पर खाद वितरण का काम पीसीएफ और सहकारी समितियों के द्वारा कराने की योजना भी बनाई, समितियों के जरीए उन किसानों को खाद मिल रही है,जो समितियों के सदस्य हैं. जरूरत इस बात की है कि रासायनिक खाद की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाए. किसानों को नए तरीके से जैविक खाद बनाने के तरीके बताए जाएं, जिस से उन को लाभ हो.

समितियों के कर्मचारियों के द्वारा भी खाद की बिक्री में मनमानी की जा रही है. ये लोग मनचाहे तरीके से खाद बांटते हैं. कुछ समितियां लाइसेंस धारक खाद विक्रेताओं को अधिक पैसे ले कर खाद बेच देती हैं. समितियों द्वारा 1 एकड़ खेत के लिए 1 बोरी खाद दी गई थी, जो जरूरत से काफी कम थी. फतेहपुर और कानपुर जिलों में भी खाद की कमी नजर आती है. साधन सहकारी समितियों में खाद की खेप आते ही दबंग और बड़े किसान उस पर कब्जा कर लेते हैं. इस से छोटे किसानों को खाद का संकट पैदा हो जाता है. बाजार में खाद की कीमत उछाल मारने लगती है. अफरातफरी में किसान खाद को ज्यादा खरीद लेते हैं. खाद की कमी की परेशानी को दूर करने का एकमात्र उपाय है कि जैविक खाद का प्रयोग बढ़ाया जाए. इस से ही किसानों को लाभ होगा.