सरिता विशेष

देश में मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या एक अरब के पार पहुंच चुकी है और निरंतर इस संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. सेवाप्रदाता कंपनियां इस का फायदा उठाने में जुटी हुई हैं. सभी कंपनियां ग्राहकों से हर रोज मोटी कमाई कर रही हैं. इस संबंध में खुद सरकार का दावा है कि 2009 से अब तक मोबाइल फोन के ग्राहकों के आधार में 61 फीसदी की वृद्धि हुई है.

मोबाइल कंपनियां हर साल मोबाइल कौल के जरिए उपभोक्ताओं से एक लाख करोड़ रुपए कमा रही हैं. दूरसंचार कंपनियों की रोजाना कमाई 250 करोड़ रुपए से ज्यादा है. लेकिन ये कंपनियां अपने ग्राहकों को सुविधाएं देने में ज्यादा खर्च नहीं कर रही हैं. मोबाइल फोन पर कौल ड्रौप सब से बड़ा संकट बना हुआ है. बड़े लोग उस संकट से ज्यादा परेशान हैं, इसलिए यह संकट सरकार के लिए नाक का सवाल बना हुआ है.

कौल ड्रौप का जिन्न सरकार के भरसक प्रयास के बावजूद भागने का नाम नहीं ले रहा है. इस की वजह है कि दूरसंचार कंपनियां अपनी सेवाओं में सुधार लाने के लिए तैयार नहीं हैं. भारतीय संचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई ने इस संकट पर नियंत्रण के लिए कई कदम उठाए और जुर्माना भी लगाया लेकिन स्पैक्ट्रम की कमी का बहाना किया जा रहा है.

ग्राहकों को कौल ड्रौप पर मुआवजा देने के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई. अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का सब को हक है लेकिन सेवाओं में सुधार लाने का काम तो सेवाप्रदाता को सुविधाओं का स्तर बढ़ा कर करना ही होगा. इस से बचने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना उचित तरीका नहीं है. आप ने अवैध तरीके से पैसा बनाया है तो जुर्माना भी भरना होगा.

सब से बड़ी बात यह है कि दूरसंचार कंपनियां सरकार के आदेशों को मानने को तैयार ही नहीं हैं. कौल ड्रौप के अतिरिक्त ये कंपनियां बिन मांगे कुछ सेवाएं दे कर उपभोक्ताओं को लूट रही हैं. कौलरट्यून सेवा मांगी नहीं जाती है, फिर भी उन्हें यह सेवा थोपी जा रही है. नैट बैलेंस का भी कोई पारदर्शी तरीका नहीं है.