इंजीनियरिंग हमेशा ही एक प्रशिक्षित पेशा रहा है. हर मातापिता का सपना बच्चे को इंजीनियर या डाक्टर बनाने का रहा है. लेकिन आज इस अवधारणा को धक्का लगता नजर आ रहा है.

लोग बच्चों को इंजीनियर बनाने के बजाय किसी और पेशे में भेजना चाहते हैं.

जिन के बच्चे इंजीनियरिंग कर रहे हैं वे इसे महज स्नातक डिगरी के लिए पढ़ा रहे हैं और कंपीटिशन के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता के रूप में ले रहे हैं.

पहले इक्कादुक्का बच्चा इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता सुना जाता था लेकिन अब बाढ़ जैसी आ गई है.

हर बच्चा बीटैक करता नजर आ रहा है. यह सब ठीक है. नौकरी के अवसर इन बच्चों के लिए अब भी कम नहीं हैं लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ी है. प्रतिभाशाली बच्चे नौकरी कर रहे हैं और अच्छा वेतन पा रहे हैं लेकिन ज्यादातर खाली हैं.

कारण, इंजीनियरिंग की डिगरी के बाद भी छात्रों का ज्ञान शून्य है. अंगरेजी बिलकुल नहीं आती और अब बीटैक की पढ़ाई कर बेरोजगार हैं.

इस हालत के लिए जिम्मेदार कुक्करमुत्तों की तरह खुले इंजीनियरिंग कालेज हैं. वहां पढ़ाई नहीं होती और ढांचागत व्यवस्था चौपट है. इसलिए बच्चे बेकार निकल रहे हैं.

भ्रष्टाचार के कारण इंजीनियरिंग कालेज कुकरमुत्तों की तरह खुलते गए और अब हालात यह है कि इस साल औल इंडिया काउंसिल फौर टैक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) को डेढ़दो सौ संस्थान बंद करने के आदेश देने पड़ रहे हैं.

करीब 1 हजार संस्थान जल्दी ही बंद होने के कगार पर हैं. सैकड़ों कालेज ऐसे हैं जहां न अच्छे शिक्षक हैं और न ही अच्छे छात्र. कई इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिले ही नहीं हुए हैं.

यह स्थिति दुखद है लेकिन ये हालात सरकार ने ही पैदा किए हैं. जो संस्थान मानक के अनुसार नहीं थे उन्हें खोलने की अनुमति क्यों दी गई?

अनुमति देने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. सरकारी संस्थानों की हालत भी सुधारी जानी चाहिए और योग्य शिक्षक रख कर इस पेशे की प्रतिष्ठा को बहाल किया जाना चाहिए.