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सरकार ने कारोबार को और पारदर्शी बनाने के लिए अति लघु, लघु तथा मझोले उद्योग (एमएसएमई) की नई परिभाषा तय की है. इन तीनों श्रेणियों के उद्यमियों को अब नई परिभाषा के तहत परखा जाएगा और उसी आधार पर उन की श्रेणी तय की जाएगी. अब उन्हें उनके सालाना कारोबार के आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा.

नई परिभाषा के तहत सालाना 5 करोड़ रुपए तक के कारोबार वाला उद्योग अति लघु श्रेणी, 5 से 75 करोड़ रुपए तक के राजस्व अर्जन करने वाले कारोबारी लघु तथा 75 करोड़ से 250 करोड़ रुपए तक का काम करने वाले मझोले श्रेणी के कारोबारी होंगे.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एमएसएमई के लिए 250 करोड़ रुपए तक के कारोबार पर 25 प्रतिशत कौर्पाेरेट टैक्स का प्रस्ताव किया है. पहले यह कर 30 प्रतिशत था. इस से पहले रिजर्व बैंक ने एमएसएमई के लिए रिपेमैंट की अवधि 90 दिन से बढ़ा कर 180 दिन कर दी है.

सरकार मानती है कि इस से उद्यमिता क्षेत्र में पारदर्शिता आएगी और आसान कारोबार की कार्यशैली को बढ़ावा मिलेगा. इस के अलावा इन उद्योगों में निरीक्षण आदि का झंझट भी साफ हो जाएगा. पहले अपने संयंत्र पर 25 लाख रुपए तक का निवेश करने वाले उद्यम अति सूक्ष्म, 25 लाख से 5 करोड़ रुपए तक का निवेश करने वाले लघु तथा 10 करोड़ रुपए तक का निवेश करने वाली उद्यम मझोले उद्योग की श्रेणी में आते थे. पहले निरीक्षण करने के लिए इन कंपनियों का वर्गीकरण किया जाता था जिस में तरहतरह के घपले होते थे और एक तरह का इंस्पैक्टरराज कायम रहता था, लेकिन अब सबकुछ वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी में दी गई सूचनाओं के आधार पर स्वत: निर्धारित हो जाएगा. इस से पारदर्शिता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा.

जीएसटी में उद्यमी द्वारा दिए गए आंकड़ों को उस के उद्यम की श्रेणी का आधार माना जाएगा. एमएसएमई का निर्धारण अब उन के सालाना राजस्व के आधार पर होगा.