इस साल मई में दिल्ली में बिजली की मांग सर्वाधिक यानी रिकौर्ड स्तर पर रही. मई में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बिजली की मांग 6,650 मेगावाट से अधिक पहुंच गई है जबकि पिछले वर्ष बिजली की मांग 6,000 से 6,500 मेगावाट तक रही थी. इस बार इस के 7,000 मेगावाट तक पहुंचने का अनुमान भी लगाया जा रहा है.

विशेष जरूरत के वक्त यानी पीक आवर में बिजली की मांग दिल्ली में लगातार बढ़ रही है. मांग की तुलना में आपूर्ति के लिए कई राज्यों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. दिल्ली सरकार के लिए बिजली खपत एक बड़ी चुनौती बन गई है. राजकोष पर बिजली खपत का बोझ कम करने के लिए बिजली दरों को उचित मूल्य पर लाने के बजाय वोटबैंक की राजनीति और लोकलुभावन फैसलों के तहत निशुल्क बिजलीपानी दिए जाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं.

उपभोक्ता को सस्ती दर पर बिजली मिले, लेकिन यह इतनी सस्ती न हो कि आपूर्तिकर्ता के चिथड़े निकलने लगें. राजनेता अपनी राजनीति के तहत लोकलुभावन फैसले ले कर जनता को फायदा दें, लेकिन कदम ऐसे उठाए जाने चाहिए कि फायदा बारबार और शक्ति के अनुरूप ही दिया जाए. दिल्ली में बिजली की मांग किस कदर बढ़ रही है, इस का एक नमूना यह है कि 1905 में शहर को महज 2 मेगावाट बिजली की जरूरत थी. आज हालत यह है कि मौल जैसे बिजनैस प्रतिष्ठान को इस से तीनगुना ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ रही है. बिजली की मांग इतनी जबरदस्त है कि पिछले कुछ सालों से मई में महज एक या

2 दिन ही 6,000 मेगावाट से ज्यादा की मांग रहती थी लेकिन इस बार मई में 8 बार 6,000 मेगावाट से ज्यादा बिजली की मांग आई है. मांग को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा खपत पर ज्यादा मूल्य देने की व्यवस्था की जानी चाहिए और जिन की जरूरत कम है, उन्हें राहत मिलनी चाहिए.