ईंधन आयात निर्यात कम करने और वाहन उत्सर्जित प्रदूषण को रोकने के लिए स्वच्छ ईंधन बढ़ाने के जो प्रयास किए जा रहे हैं उन में इलैक्ट्रिक वाहनों का भविष्य ज्यादा उम्मीद बांध रहा है. बैटरीचालित रिकशा तो धूम मचा चुके हैं, अब बैटरीचालित छोटे वाहन भी धीरेधीरे लोकप्रिय हो रहे हैं. इस से एक कदम आगे बढ़ कर इलैक्ट्रिक बसों के संचालन की दिशा में काम चल रहा है और वाहन निर्माता कुछ कंपनियों ने इस का परीक्षण भी शुरू कर दिया है.

सबकुछ यदि ठीक रहा तो आने वाला समय इलैक्ट्रिक वाहनों का होगा. इस के उज्जवल भविष्य की संभावना को देखते हुए पर्यावरणप्रेमी तो खुश हैं लेकिन आटो पार्ट्स निर्माता इस से परेशान हैं. उन का कारोबार इस से प्रभावित होगा और कई को इलैक्ट्रिक वाहनों के कारण अपना कारोबार बंद होता भी नजर आ रहा है.

आटोनिर्माता संगठन इस पर चिंता जता चुका है. उन सब का कहना है कि इलैक्ट्रिक वाहनों के कारण इंजन, ट्रांसमिशन, एल्युमिनियम आदि का कारोबार ठप हो जाएगा. वाहन उद्योग क्षेत्र का आधा राजस्व इसी से अर्जित होता है. लेकिन क्या कुछ कारोबारियों के चलते अच्छे कदम नहीं उठाए जाने चाहिए. स्वच्छ ईंधन या कम प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की संख्या बढ़ेगी तो उन का नया कारोबार भी तो बढ़ेगा. उन्हें तो सिर्फ नए वाहनों के अनुकूल पुर्जे तैयार करने हैं. बाजार में मांग बढ़ेगी तो नए कलपुर्जों का उन का कारोबार भी उसी गति से बढ़ेगा. आखिर नए इलैक्ट्रिक वाहन भी तो कलपुर्जों पर ही आधारित होंगे.

कलपुर्जें विक्रेताओं को सिर्फ डीजलपैट्रोल संचालित वाहनों के कलपुर्जों की जगह इलैक्ट्रिक वाहनों के कलपुर्जें रखने हैं. यह तो विरोध का सिर्फ बहाना है. हर कारोबारी सिर्फ अपने हित पर केंद्रित रहता है. उसे समाज या पर्यावरण से कोई सरोकार नहीं होता जबकि वह सब के लिए होता है.

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