देश का ईकौमर्स बाजार इन दिनों सुर्खियां बटोर रहा है. इस की वजह देश की औनलाइन कारोबार करने वाली प्रमुख कंपनी फ्लिपकार्ट का बिकना है. फ्लिपकार्ट देश के लिए जानापहचाना नाम बन चुका था और औनलाइन खरीदारों में यह कंपनी काफी लोकप्रिय बनी हुई थी. फ्लिपकार्ट का अमेरिकी कंपनी वालमार्ट ने अधिग्रहण कर लिया है. दोनों कंपनियों के बीच 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा में सौदा हुआ. इस सौदे के तहत वालमार्ट फ्लिपकार्ट के 77 फीसदी शेयर खरीदेगी. वालमार्ट की भारतीय ईकौमर्स बाजार में घुसने की यह लंबी हसरत पूरी हुई है. इस सौदे की खबर के बाद ईकौमर्स क्षेत्र में खलबली मच गई है. चीनी कंपनी अलीबाबा भी भारत में ईबैंकिंग क्षेत्र की प्रमुख कंपनी पेटीएम तथा स्नैपडील के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की फिराक में है.

वालमार्ट के इस सौदे से सब से ज्यादा परेशान औनलाइन कंपनी अमेजन है. उसे मालूम है कि वालमार्ट भारतीय बाजार में उस के लिए सब से बड़ी चुनौती देने वाली है. वालमार्ट और फ्लिपकार्ट के बीच अधिग्रहण संबंधी सौदा होने से पहले ही अमेजन भारत में 500 करोड़ डौलर के निवेश की घोषणा कर चुकी है. बहरहाल, इस सौदे से बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और ईकौमर्स मार्केट में नई क्रांति आएगी. इस का सीधा लाभ ग्राहकों को मिल सकता है. बड़ी कंपनियों के बीच बाजार में बने रहने की प्रतिस्पर्धा बढ़ने से वे ग्राहकों को लुभाने के लिए औफर देंगी.

महानगरों के ग्राहक आज की भागमभाग जिंदगी में औनलाइन कौमर्स पर काफी हद तक निर्भर हो गए हैं. इस स्थिति को वालमार्ट समझता है और उस ने भारतीय कंपनी के अधिग्रहण के जरिए भारतीय ईमार्केट पर कब्जा करने का रास्ता अख्तियार किया है. उम्मीद यह है कि ईकौमर्स क्षेत्र में भी ग्राहकों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीच की कारोबारी प्रतिस्पर्धा का उसी तरह से फायदा मिलेगा जैसा भारतीय उपभोक्ता दूरसंचार क्षेत्र में उठा रहे हैं. इस के साथ ही, सरकारी तंत्र भी कर संग्रहण को ले कर सतर्क हो गया है और वह अब वोडाफोन के समय बनी स्थिति को दोहराना नहीं चाहता है.