बजट की प्रिंटिंग शुरू हो गई है. वित्त मंत्री अरुण जेटली देश का आम बजट 1 फरवरी को पेश करेंगे. आम आदमी से लेकर इंडस्ट्री को इस बार के बजट से काफी उम्मीदें हैं. हालांकि, बजट आने के बाद ही पता चलेगा कि ये कितना उम्मीदों पर खरा उतरता है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि बजट में कुछ ऐसे शब्दों की प्रयोग किया जाता है, जिनका मतलब बहुत ही कम लोगों को पता होता है. आइए, जानते हैं बजट से जुड़े कुछ ऐसे शब्द जिनके बारे में बहुत कम लोगों को ही पता होता है.

जानिए कौन से हैं ये शब्द

सेंट्रल प्लान आउटले (Central plan outlay)

यह बजटीय योजना का वह हिस्सा होता है, जिसके तहत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के लिए संसाधनों का बंटवारा किया जाता है.

डायरेक्ट टैक्स (Direct tax)

डायरेक्ट टैक्स वह टैक्स होता है, जो व्यक्तियों और संगठनों की आमदनी पर लगाया जाता है, चाहे वह आमदनी किसी भी स्रोत से हुई हो, जैसे निवेश, वेतन, ब्याज आदि. इनकम टैक्स, कौरपोरेट टैक्स आदि डायरेक्ट टैक्स के तहत ही आते हैं.

इनडायरेक्ट टैक्स (Indirect tax)

ग्राहकों द्वारा सामान खरीदने और सेवाओं का इस्तेमाल करने के दौरान उन पर लगाया जाने वाला टैक्स इनडायरेक्ट टैक्स कहलाता है. कस्टम्स ड्यूटी और एक्साइज ड्यूटी आदि इनडायरेक्ट टैक्स के तहत ही आते हैं.

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कस्टम्स ड्यूटी और एक्साइज ड्यूटी (Custom Duty and Excise Duty)

कस्टम्स ड्यूटी वह चार्ज होता है जो देश में आयात होने वाले सामानों पर लगाया जाता है. एक्साइज ड्यूटी वह चार्ज होता है जो देश के भीतर बनाए जाने वाले सामानों पर लगाया जाता है.

आम बजट और अंतरिम बजट (Union Budget and Interim Budget)

बजट सरकार के सालाना खर्च का ब्यौरा होता है. इसके जरिए सरकार की प्राप्तियों और खर्च का लेखा-जोखा पेश किया जाता है. चुनाव वाले साल के दौरान अंतरिम बजट पेश किया जाता है, अन्यथा केंद्र सरकार हर साल आम बजट पेश करती है.

अनुदान मांगें

बजट में शामिल सरकार के खर्चों के अनुमान को लोक सभा अनुदान की मांग के रूप में पारित करती है. हर मंत्रालय की अनुदान की मांगों को सिलसिलेवार तरीके से लोक सभा से पारित कराया जाता है.

लेखानुदान मांगें

बजट को संसद में पारित कराने में लंबा समय लगता है और ऐसे में सरकार एक अप्रैल से पहले पूरा बजट पारित नहीं करा पाती. इस स्थिति में अगले वित्त वर्ष के शुरुआती दिनों के खर्च के लिए सरकार संसद की मंजूरी लेती है. इन मांगों को लेखानुदान मांगें कहते हैं.

योजनागत व्यय और गैर योजनागत व्यय

सरकारी व्यय को दो हिस्सों में बांटा जाता है- प्लान्ड एक्सपेंडिचर (योजनागत व्यय) और नौन प्लान्ड एक्सपेंडिचर (गैर योजनागत व्यय). इनमें से योजनागत व्यय का एस्टिमेट विभिन्न मंत्रालयों और योजना आयोग द्वारा मिल कर बनाया जाता है. इसमें मोटे तौर पर वे सभी व्यय आते हैं, जो विभिन्न विभागों द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर किया जाता है.

गैर योजनागत व्यय के दो हिस्से होते हैं- गैर योजनागत राजस्व व्यय और गैर योजनागत पूंजीगत व्यय. गैर योजनागत राजस्व व्यय में जो व्यय आते हैं, उनमें शामिल हैं- ब्याज की अदायगी, सब्सिडी, सरकारी कर्मचारियों को वेतन की अदायगी, राज्य सरकारों को अनुदान, विदेशी सरकारों को दिए जाने वाले अनुदान आदि. गैर योजनागत पूंजीगत व्यय में शामिल हैं- रक्षा, पब्लिक इंटरप्राइजेज को दिया जाने वाला कर्ज, राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और विदेशी सरकारों को दिया जाने वाला कर्ज.

पूंजीगत व्यय और राजस्व व्यय

कैपिटल एक्सपेंडिचर या कैपेक्स (पूंजीगत व्यय) किसी सरकार द्वारा किया जाने वाला वह व्यय होता है, जो भविष्य के लिए लाभ का सृजन करता है. कैपेक्स का इस्तेमाल संपत्तियां या इक्विपमेंट आदि खरीदने के लिए किया जाता है. इसके अलावा विभिन्न इक्विपमेंट के अपग्रेडेशन के लिए भी इसका उपयोग होता है. सरकार के रेवेन्यू अकाउंट से खर्च होने वाली राशि को रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (राजस्व व्यय) कहा जाता है. इसमें सरकार के रोजमर्रा के खर्च शामिल होते हैं.

सब्सिडी (Subsidies)

किसी सरकार द्वारा व्यक्तियों या समूहों को नकदी या कर से छूट के रूप में दिया जाने वाला लाभ सब्सिडी कहलाता है. भारत जैसे कल्याणकारी राज्य (वेलफेयर स्टेट) में इसका इस्तेमाल लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए किया जाता है. भारत सरकार ने आजादी के बाद से अब तक विभिन्न रूपों में लोगों को सब्सिडी दी है, चाहे वह डीजल सब्सिडी हो या फूड सब्सिडी.

राजस्व कर (Tax revenue)

कोई सरकार टैक्स लगा कर जो रेवेन्यू हासिल करती है, उसे टैक्स रेवेन्यू कहा जाता है. सरकार विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाती है, ताकि वह योजनागत और गैर योजनागत व्यय के लिए धन एकत्र कर सके. यह सरकार की आय का प्राथमिक और प्रमुख स्रोत है.

गैर राजस्व कर (Non tax revenue)

नौन टैक्स रेवेन्यू वह राशि है, जो सरकार टैक्स के अतिरिक्त अन्य साधनों से एकत्र करती है. इसमें सरकारी कंपनियों के विनिवेश से मिली राशि, सरकारी कंपनियों से मिले लाभांश और सरकार द्वारा चलाई जाने वाली विभिन्न आर्थिक सेवाओं के बदले मिली राशि शामिल होती है.

चालू खाते का घाटा (Current account deficit)

चालू खाते का घाटा यानी करंट अकाउंट डे‍फिसिट देश में विदेशी मुद्रा की कुल आवक व निकासी का अंतर बताता है. विदेशी मुद्रा की आवक निर्यात, पूंजी बाजार में निवेश, प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश और विदेश रह रहे लोगों द्वारा स्‍वदेश भेजे गए पैसे यानी रेमिटेंस के जरिए होती है. जब विदेशी मुद्रा की निकासी आवक से ज्‍यादा होती है, तो घाटा होता है.

राजस्व घाटा (Revenue Deficit)

राजस्व घाटे का मतलब सरकार की अनुमानित राजस्व प्राप्ति और व्यय में अंतर होता है. किसी वित्त वर्ष के लिए सरकार राजस्व प्राप्ति और अपने खर्च का एक अनुमान लगाती है. लेकिन जब उसका व्यय उसके अनुमान से बढ़ जाता है, तो इसे राजस्व घाटा कहा जाता है.

वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit)

वित्तीय घाटा बताता है कि किसी वित्त वर्ष के दौरान सरकार की कुल आमदनी (उधार को छोड़ कर) और कुल खर्च का अंतर कितना है. वित्तीय घाटे के बढ़ने का मतलब है कि सरकार की उधारी बढ़ेगी. यहां ये भी समझना जरूरी है कि अगर उधारी बढ़ेगी तो ब्याज की अदायगी भी बढ़ेगी. ब्याज का बोझ बढ़ने से सरकार के राजस्व घाटे पर नकारात्मक असर पड़ेगा.

प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)

देश के वित्तीय घाटे और ब्याज की अदायगी के अंतर को प्राथमिक घाटा कहते हैं. प्राथमिक घाटे के आंकड़े से इस बात का पता चलता है कि किसी भी सरकार के लिए ब्याज अदायगी कितनी बड़ी या छोटी समस्या है.

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)

आय और खर्च के अंतर को दूर करने के लिए हर साल सरकार की ओर से लिया जाने वाला अतिरिक्त कर्ज राजकोषीय घाटा कहलाता है. देखा जाए तो राजकोषीय घाटा घरेलू कर्ज पर बढ़ने वाला अतिरिक्त बोझ ही है.

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