जल्दी ही बिहार में पैदा होने वाले खास जैव उत्पाद बिहार ब्रांड के नाम से दुनिया भर में डंका बजाएंगे. राज्य में जैविक खेती में आई तेजी को देखते हुए जैव उत्पादों की ब्रांडिंग की कवायद शुरू की गई है. बिहार में उपजाए गए जैव उत्पादों की ब्रांडिंग और उन के सर्टिफिकेशन की कवायद शुरू की गई है. इस के लिए बिहार राज्य बीज एवं जैविक प्रमाणीकरण एजेंसी का गठन किया जाएगा. कृषि विभाग का दावा है कि एजेंसी के गठन का काम अंतिम चरण में है.

किसी भी कृषि उत्पाद के जैविक होने पर पहले उसे सी 1 और उस के बाद सी 2 सर्टिफिकेट दिया जाएगा. तीसरे साल उसे सी 3 का सर्टिफिकेट मिलेगा. उस के बाद से जैविक उत्पाद किसी भी बड़े बाजार में भेजे जा सकेंगे या उन का इंटरनेशनल लेबल पर निर्यात किया  जा सकेगा. इस से बिहार में जैविक खेती कर रहे किसानों को अच्छा मुनाफा मिलेगा और बाकी किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहन मिलेगा.

फिलहाल अपने जैव उत्पादों को बाजार में भेजने के लिए किसानों को केंद्रीय एजेंसी ‘एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट एजेंसी’ से सर्टिफिकेट लेना पड़ता है. यह सर्टिफिकेट हासिल करने का काम काफी पेचीदा होने की वजह से किसान इस से कन्नी काटते रहे हैं. जल्द ही बिहार समेत पूरे देश में बिहार ब्रांड का गेहूं और चावल मिलने लगेगा. बिहार सरकार चावल और गेहूं के आटे की ब्रांडिंग कर के देश भर में इस की पहचान बनाने की मशक्कत में लगी हुई है.

बिहार से काफी मात्रा में गेहूं और चावल दूसरे राज्यों में जाते हैं, पर उन की ब्रांडिंग नहीं हो पाती. कृषि विभाग और राज्य  के उद्यमियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद कतरनी, बासमती, आनंदी, गोविंदभोग और बादशाहभोग किस्म के चावलों की ब्रांडिंग पर सहमति बन गई है. राज्य सरकार इस बात पर भी जोर दे रही है कि जिन इलाकों में जिस अनाज, सब्जी और फल का ज्यादा उत्पादन होता है, वहां उन्हीं उत्पादों पर आधारित उद्योग लगाए जाएं. जो उद्यमी इसे ध्यान में रख कर उद्योग लगाएंगे उन्हें खास रियायत दी जाएगी. पिछले 6 सालों में 16 चावल मिलों, 5 गेहूं मिलों व 3 मकई मिलों के अलावा 4 फल आधारित, 2 शहद आधारित और 1 मखाना आधारित उद्योग लगाए गए हैं, जिन में उत्पादन चालू हो गया है.

इसी तरह बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की मशहूर शाही लीची बिहार ब्रांड के तहत विश्व बाजार में चीन और थाईलैंड को टक्कर देने की तैयारी में है. शाही लीची की क्वालिटी और उत्पादन में सुधार की कवायद का बेहतर नतीजा मिला है. इस के लिए किसानों को स्पेशल ट्रेनिंग दी गई है, जिस के बाद किसानों को प्रति हेक्टेयर 10 लाख रुपए तक की आमदनी हो सकेगी. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र से मिली जानकारी के मुताबिक बिहार के लीची उत्पादकों के लिए साल भर की योजना तैयार की गई है. इस के तहत फसल काटने के दूसरे दिन से ही अगली फसल की तैयारी शुरू कर दी जाएगी. क्वालिटी में सुधार के लिए मिट्टी की सेहत और कीटप्रबंधन का पुख्ता इंतजाम किया गया है. इस योजना पर काम करने वाले किसानों को सरकार माली मदद भी देगी.

गौरतलब है कि बिहार की शाही लीची पश्चिमी देशों में खूब पसंद की जाती है. सूबे में 30 लाख हेक्टेयर में लीची की खेती होती है और 10 लाख टन लीची का उत्पादन होता?है. वैज्ञानिक सलाहों की कमी और नई तकनीकों को नहीं अपनाने की वजह से शाही लीची चीन की लीची के मुकाबले क्वालिटी में थोड़ी कमजोर साबित होती है और 20 से 25 फीसदी लीची का नुकसान भी हो जाता है.

कृषि वैज्ञानिक वीएन सिंह कहते हैं कि वर्ल्ड मार्केट में बने रहने और बेहतर स्थिति बनाने के लिए बिहार सरकार ने कमर कसी है. आमतौर पर लीची उत्पादक फसल के समय ही खेतों पर ध्यान देते हैं, जबकि क्वालिटी के लिए पूरे साल काम करने की दरकार है. क्वालिटी में सुधार होने से बाजार में लीची  की मांग निश्चित रूप से बढ़ेगी और किसानों की आमदनी भी बढ़ेगी. यूरोपीय देशों में 700 से 1500 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से लीची की बिक्री होती है. लीची के साथ ही बिहार में पिछले एक दशक से बड़े पैमाने पर मशरूम का उत्पादन हो रहा है. राज्य में फिलहाल 1500 टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है. किसानों को इस के उत्पादन के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल करने के लिए ट्रेंड किया जा रहा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कई मौकों पर कहते रहे हैं कि बिहार के किसानों ने धान और आलू के उत्पादन का वर्ल्ड रिकार्ड तोड़ा है और अब हाई क्वालिटी के मशरूम उत्पादन की बारी है. बिहार के भागलपुर जिले के कतरनी चावल के दीवाने देशविदेश में हैं. यह एक किस्म का खुशबूदार चावल है, जिस के दाने लंबे व पतले होते हैं. भागलपुर के किसान इस चावल को सैकड़ों सालों से पैदा कर रहे हैं. इस किस्म के धान की रोपनी चाहे जब की जाए, मगर उस में फूल 20 अक्तूबर से 30 अक्तूबर के बीच ही आते हैं. दिसंबर के पहले हफ्ते तक फसल तैयार हो जाती है.

कृषि वैज्ञानिक ब्रजेंद्र मणि बताते हैं कि कतरनी धान के पौधे 140 से 160 सेंटीमीटर लंबे होते हैं. खुशबूदार होने की वजह से इस का चावल और चूड़ा देश भर में काफी पसंद किया जाता है. इस के खुशबूदार पुलाव और बिरयानी का जायका लाजवाब होता है. विदेशों में इस की खासी मांग है. किसान और कतरनी चावल के व्यापारी सरकार से मांग कर रहे हैं कि भागलपुर में कतरनी चावल एक्सपोर्ट जोन बनाया जाए, जिस से विदेशों में आसानी से इस की सप्लाई की जा सके. बिहार में पैदा होने वाली देसी मछलियों की भी ब्रांडिंग का काम शुरू किया गया है. बिहार में मछली का उत्पादन भले ही कम हो, पर विदेशों में बिहार की देसी मछलियों की काफी मांग है. ‘पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग’ से मिली जानकारी के मुताबिक पूर्वी और पश्चिमी चंपारण से कतला और रोहू मछलियां नेपाल भेजी जा रही हैं, जबकि दरभंगा में पैदा होने वाली बुआरी और टेंगरा मछलियां भूटान में खूब पसंद की जा रही हैं. वहीं भागलपुर और खगडि़या जिलों में पैदा की जाने वाली मोए और कतला मछलियां सिलीगुड़ी भेजी जा रही हैं. मुजफ्फरपुर और बख्तियारपुर से बड़ी तादाद में मछलियां चंडीगढ़ और पंजाब के व्यापारियों के द्वारा मंगवाई जा रही हैं.

दरभंगा के मछलीउत्पादक रामचंद्र झा बताते हैं कि बिहार की मछलियों के लाजवाब स्वाद की वजह से दूसरे राज्यों और देशों के लोग इन के दीवाने बन रहे हैं. इस से जहां बिहार की मछलियों की दुनिया में डिमांड बढ़ रही है, वहीं उत्पादकों को तगड़ी कीमत भी मिल रही है. इसी वजह से मछलीउत्पादक भी मछलियों को दूसरे देशों और राज्यों में भेजने में दिलचस्पी ले रहे हैं. गौरतलब है कि बिहार में मछली की सालाना खपत 5 लाख 80 हजार टन है, जबकि सूबे का अपना उत्पादन 4 लाख 30 हजार टन है. बाकी मछलियों को आंध्र प्रदेश समेत दूसरे राज्यों से मंगवाया जाता है.