कोलकाता में एक बड़े एटीएम फ्रौड का खुलासा हुआ है. पांच लोगों के गैंग ने स्कीमर्स के जरिए दर्जनों लोगों को लाखों रुपये की चपत लगा दी. इससे एक बार फिर एटीएम सुरक्षा को लेकर चिंता गहरा गई है. आखिर कैसे होता है स्कीमर्स से फ्रौड और कैसे करें इससे बचाव…

क्या है एटीएम स्कीमिंग?

एटीएम स्कीमिंग असल में डेबिट-क्रेडिट कार्ड की डेटा चोरी है. स्कीमर नाम के एक छोटे डिवाइस को एटीएम से जोड़ दिया जाता है. जैसे ही कार्ड को एटीएम में स्वाइप किया जाता है, इसके मैगनेटिक स्ट्रिप पर स्टोर डेटा को स्कीमर कौपी कर लेता है.

कैसे किया जाता है यह?

चोर स्कीमर को एटीएम कार्ड स्वाइपिंग मेकनिजम से जोड़ देते हैं. हालांकि, केवल स्कीमर ही काफी नहीं है. चोरों को कार्ड डेटा के साथ ही आपके पिन की भी जरूरत पड़ेगी. इसे हासिल करने के लिए वे एटीएम में एक कैमरा लगा देते हैं या पहले से एटीएम में लगे कैमरे को हैक कर लेते हैं. कार्ड डेटा और पिन हासिल करने के बाद कार्ड की क्लोनिंग कर पैसे निकाले जाते हैं या औनलाइन खरीदारी कर ली जाती है.

कैसे पकड़ें स्कीमर?

स्कीमर को पकड़ना आसान है. आपको बस इतना करना है कि एटीएम इस्तेमाल से पहले इसे जरा ध्यान से देख लें. मशीन में कार्ड रीडर और कीपैड पर नजर डालिए. यदि कार्ड रीडर सेक्शन आगे बढ़ा, बिगड़ा, अव्यवस्थित या निकला हुआ दिख रहा है या कीपैड उभरा हुआ है तो समझ लें कुछ गड़बड़ है. यदि मशीन से किसी तरह की छेड़छाड़ का अहसास हो तो इस्तेमाल ना करें.

​​बचाव और उपाय

एटीएम पिन एंटर करते समय हमेशा एटीएम कीपैड को कवर कर लें. अपने बैंक ट्रांजैक्शन का एसएमएस अपडेट पाने के लिए मौजूदा मोबाइल नंबर को रजिस्टर कराएं. यदि आपके कार्ड से कोई संदिग्ध ट्रांजैक्शन होता है तो आपको मोबाइल पर अलर्ट मिल जाएगा.

एटीएम डीटेल चोरी होने पर क्या करें?

फ्रौड की जानकारी जल्द से जल्द बैंक को दें. उदाहरण के तौर पर आपका ‘बैंक ए’ में अकाउंट है और आपने ‘बैंक बी’ के एटीएम से नकदी निकाली. ‘बैंक ए’ को तुरंत शिकायत दें. आरबीआई के मुताबिक, बैंक को जितनी देर से सूचना देंगे, नुकसान का रिस्क उतना ही अधिक होगा.

फ्रौड हो गया तो कौन देगा पैसे?

ऐसे मामलों में कार्ड जारी करने वाले बैंक को पीड़ित को पैसे देने पड़ते हैं. प्राथमिक जांच में यदि यह साबित हो जाता है कि आप स्कीमिंग फ्रौड के शिकार हैं तो बैंक नुकसान की भरपाई करता है. आरबीआई के मुताबिक ऐसी स्थिति में कस्टर की जवाबदेही शून्य है. बैंक और ग्राहक की गलती नहीं होने पर यानी थर्ड पार्टी ब्रीच के मामले में बैंक को भुगतान करना होता है.

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