हौलीवुड में फिल्मों का निर्माण स्टूडियो सिस्टम के तहत ही हो रहा है. वहां ‘डिजनी स्टूडियो’, ‘बीबीसी 4 स्टूडियो’, ‘फौक्स स्टार स्टूडियो’ काफी सक्रिय हैं. हौलीवुड सिनेमा ने तो पूरे यूरोप पर कब्जा करके यूरोपीय देशों के सिनेमा का अंत कर दिया है. पिछले कुछ वर्षों से भारत में कुछ कारपोरेट कंपनियां सिनेमा से जुड़कर स्टूडियो की तरह फिल्में बनाती आ रही हैं. मगर बौलीवुड के कलाकारों की अपनी दादागीरी, कारपोरेट कंपनियां द्वारा अपनी बैलेंस सीट पर ध्यान देने, कंपनी के शेयर के भाव कैसे बढ़े इस पर ध्यान देने, फिल्मों के निर्माण का निर्णय करने का दायित्व सिनेमा को समझने वाले को देने की बनिस्बत एमबीए करके आने वाले रंगरूटों को दिए जाने के कारण भारत में कारपोरेट या स्टूडियो के तहत बनी फिल्में सुपर फ्लाप हो रही हैं.

जिसकी वजह से हमारे यहां स्टूडियो सिस्टम असफल होता जा रहा है. इतना ही नहीं सिनेमा भी गुड़गोबर हो रहा है. इसी के चलते 2016 में अचानक पांच छह स्टूडियो बंद हो गए. कुछ ने हिंदी फिल्मों के निर्माण से तौबा कर ली. जो स्टूडियो कार्यरत हैं, उनकी हालत भी पतली है.

कई स्टूडियो की पतली हालत के बीच ‘‘वायाकौम 18’’ स्टूडियो निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है. हालात ऐसे हो गए हैं कि अब ‘‘वायकौम 18’’ स्टूडियो ने अपना विस्तार करते हुए क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की तरफ भी कदम बढ़ा दिए हैं. ‘‘वायकौम 18 स्टूडियो’’ निर्मित मराठी भाषा की फिल्म ‘‘आणि मी काशीनाथ घाणेकर’’, जो कि दिवाली के अवसर पर पूरे महाराष्ट् में हिंदी फिल्म ‘‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ के साथ ही सिनेमाघरों में पहुंची, बाक्स आफिस पर जबरदस्त कमाई करने के साथ ही समीक्षकों की भी प्रशंसा बटोर रही है.

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हाल ही में ‘‘वायाकौम 18 स्टूडियो’’ के सी.ओ.ओ अजीत अंधारे ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका के साथ एक्सक्लूसिव बात की, जो कि इस प्रकार रही….

सिनेमा के बदलाव में स्टूडियो सिस्टम की भूमिका को आप किस तरह से देख रहे हैं?

हम खुद एक स्टूडियो हैं. ऐसे में अपने मुंह अपनी प्रशंसा करना ठीक नहीं लगता. पर मेरी सोच यह है कि सिनेमा में जो पूरा बदलाव आया, वह कारपोरेट कंपनियों यानी कि स्टूडियो से ही संभव हुआ है. इसमें ‘वायाकौम 18’, ‘जी स्टूडियो’, ‘यूटीवी डिज्नी’, ‘फौक्स’ सभी का योगदान है. सिनेमा में जो बदलाव आया है, उसका नेतृत्व इन स्टूडियो ने ही किया है.

देखिए, स्टूडियो सिस्टम शुरू होने से पहले से ही बौलीवुड में काम कर रहे इंटेंस लोग थे, उनसे इतर नए लोगों को भी बौलीवुड से जुड़ने का मौका मिला. नए नए लेखक, नई नई कहानियां, नए नए निर्देशक आए. इसी कारण ‘वायाकौम 18’ ने ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ जैसी फिल्में बनायी, जो कि ट्रेडिशनल बौलीवुड की परिभाषा में नहीं आती है.

जहां तक ‘वायाकौम 18’ का सवाल है, तो हम लोगों ने तो इसे अपना डीएनए ही बनाया हुआ है. हमने अलग तरह के विषयों पर फिल्में बनायीं. क्योंकि हमें यकीन था कि मल्टीप्लैक्स का  सिनेमा देखने को इच्छुक है. हमने सोचा कि मल्टीप्लैक्स का एक नया दर्शक वर्ग है, जिसके लिए हम अलग तरह के सेगमेंट की फिल्में दे सकते हैं. तो हमने बौलीवुड मसाला व फार्मूला से हटकर फिल्मों का निर्माण किया. फिर चाहे वह ‘गैंग औफ वासेपुर’ हो या ‘कहानी’ हो ‘स्पेशल 26’ हो. इनमें हमने आम बौलीवुड मसाला फिल्मों से कुछ हटकर कहानी देने की कोशिश की. अक्षय कुमार की ईमेज एक्शन हीरो की थी, जिसे हमने अपनी फिल्मों में बदला. हमने अक्षय कुमार से कौमेडी किरदार करवाए. ‘स्पेशल 26’ और ‘ओह माय गौड’ जैसी फिल्मों में दर्शकों ने अक्षय कुमार को एक नए रूप में पसंद किया. कुछ समय पहले उनकी आयी फिल्म ‘‘टॉयलेटः एक प्रेम कथा’ भी आपको याद होगी. इसे भी हम ही लेकर आए. तो हमने सामाजिक मुद्दों को मनोरंजन की चाशनी में भिगोकर देते हुए एक नया सिनेमा दिया.

हमने उन फिल्मों को भी प्राथमिकता दी, जिन्हें लोग नारी प्रधान फिल्में कहते हैं. यह वह फिल्में हैं, जिनमें हीरोईजम पुरूष नहीं, बल्कि महिला किरदारों व कलाकारों से आया. हमारा यह प्रयोग भी काफी सफल रहा. इतना ही नही हमने नई कहानियों को नए अंदाज में पेश करने की कोशिश की. मसलन, आप हमारी नई फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ को लें. ‘‘अंधाधुन’’ में ट्रेडिशनल कहानी का कोई हिस्सा नहीं है. तो हम स्टूडियोज का मकसद रहा है कि हम कुछ अलग तरह की कहानियों को लेकर आएं और चिरपरिचित बौलीवुड मसाला फिल्मों की शैली को तोड़ते हुए दर्शकों को कुछ नया प्रदान करें, जिसमें हम सभी सफल हैं.

पर जब आप मल्टीप्लैक्स के दर्शकों को ध्यान में रखकर फिल्में बनाते हैं, तो आप शहरी दर्शक वर्ग तक सीमित रह जाते हैं. आपकी फिल्में सिंगल थिएटर व गांव तक नही पहुंच पाती ?

हमारे कहने का अर्थ यह नहीं है कि हमने सिंगल थिएटर को एकदम से नजरंदाज कर दिया है. मेरे कहने का अर्थ यह है कि जब हम एक नई राह बनाते हैं, तो उसके लिए नया दर्शक वर्ग भी तैयार करने की कोशिश करते हैं. हमने सिंगल थिएटर के लिए ‘सन औफ सरदार’, ‘भाग मिल्खा भाग’, ‘मैरी कौम’ सहित कई फिल्में बनायी हैं. यह सारी फिल्में ‘वायाकौम 18’ की हैं. हम सिर्फ मल्टीप्लैक्स के दर्शकों के लिए सिनेमा नही बना रहें हैं. बल्कि हम हर तरह के दर्शक के लिए फिल्में बना रहे हैं. लेकिन कटु सत्य यह भी है कि मल्टीप्लैक्स का दर्शक हमें एक नई कहानी को नए अंदाज में कहने का अवसर देता है. और हमने उस नए मौके के इर्दगिर्द अपनी पूरी कार्यशैली को रचा व बुना है.

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यदि आपकी बात सच है, तो फिर 80 प्रतिशत स्टूडियो बंद क्यों हो गए? उनसे जो गलती हुई, उससे आप लोगों ने कोई सबक सीखा?

मैं आपकी बात से सहमत हूं कि बीच में कुछ स्टूडियो बंद हुए हैं. पर हमारा 7-8 वर्षों का बहुत अलग अनुभव रहा. हम लगातार फिल्में बना रहे हैं, जिन्हें दर्शक पसंद भी कर रहे हैं. फिल्में बिजनेस कर रही हैं. हमारी सोच यह रही है कि आप फिल्में ‘डील ओरिएंटेड’ बनाएंगे यानी कि फिल्म एक बिजनेस है. उसी हिसाब से सारी चीजें मैन्यूप्युलेट होकर फिल्म बनाएंगे, तो नुकसान होना स्वभाविक है. क्योंकि फिल्म निर्माण एक रचनात्मक प्रतिक्रिया है. इसे रचनात्मकता के चश्मे से समझना बहुत जरूरी है. स्क्रिप्ट सामने आने पर जब हम क्रिएटीविटी के चश्मे से उसे देखते हैं, तो हमें अहसास हो जाता है कि यह किस तरह का व्यापार करेगी? मेरा मानना है कि यदि आप फिल्म निर्माण को ‘डील ओरिएंटेड’ या ‘चेक ओरिएंटेड’ मानकर चलाएंगे, तो किसी भी सूरत में अच्छे परिणाम नहीं आएंगे. कुछ स्टूडियों के साथ ऐसा हुआ है,आप स्वयं इसका अंदाजा लगा सकते हैं.

जहां तक ‘वायाकौम 18’ का सवाल है, तो हमने संख्या गिनाने के लिए फिल्मों का निर्माण नहीं किया. हमारा यह ध्येय कभी नहीं रहा कि हमें हर तिमाही इतनी फिल्में रिलीज करनी हैं. मैंने कई बार कहा है कि फिल्में ‘एसेंबल’ वाली नही है. यह कार, फ्रिज या टीवी नही है, जिसे एसेंबल किया और बेच दिया. फिल्में शैम्पू की तरह एक बड़ी संख्या में हर तिमाही नहीं बन सकती. एक कलाकृति जब स्वयं एक रूप लेती है, तभी वह बनती है. कुछ स्टूडियो ने एक रिदम को फौलो किया कि हर तिमाही इतनी फिल्में लेकर आएंगे, उस रिदम ने भी नुकसान पहुंचाया. यह बहुत अच्छा अप्रोच साबित नहीं हुआ. हमने रिदम वाला अप्रोच कभी नहीं रखा. हम शुरू से इस ढर्रे पर चले हैं कि यदि कोई फिल्म रचनात्मक और आर्थिक दृष्टिकोण से सही नही बन सकती है, तो उसे हम नहीं बनाएंगे.

तीसरा अप्रोच यह होना चाहिए कि आपको स्क्रिप्ट के आधार पर लागत तय करनी होनी चाहिए. यानी कि फिल्म की लागत क्या हो? इसकी अच्छी समझ होनी चाहिए. आप किसी भी लागत पर फिल्म बनाएंगे, ओवर प्रमोशन, ओवर मार्केटिंग करेंगे, तो नुकसान होना ही है. देखिए, फिल्म एक ऐसा व्यापार है, जहां लोग बहुत जल्द उत्साहित या उतावले हो जाते हैं. यह उतावलापन स्टार कलाकार के दबाव में या उन लोगों के दबाव में आता है, जिन्हें फिल्म व्यापार की समझ नही है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें होर्डिंग से लगाव है. यह चाहते हैं कि फिल्म की रिलीज से पहले फिल्म के बडे़ बडे़ होर्डिंग्स लगें.

कहने का अर्थ यह है कि फिल्म की मार्केटिंग की समझ बहुत कम लोगों को है, पर हर कोई दावा करता है कि वही फिल्म की मार्केटिंग को सही ढंग से समझता है. देखिए, यह कई तरह के दबाव हैं, जो कि स्टूडियो के उपर हावी रहते हैं. ऐसे में हमें बिजनेस के फंडामेंटल और कहानी की मांग इन दोनों का समन्वय बनाकर काम करना होता है. हमारी पहली कोशिश यह रहती है कि निर्देशक को क्रिएटिव/रचनात्मकता के स्तर पर फिल्म बनाने की पूरी छूट दें. यही हमारा तर्जुबा है. इसलिए हम आगे बढ़ते जा रहे हैं.

क्या आप मानते हैं कि स्टूडियो सिस्टम शुरू होने पर कलाकारों को बेतहाशा पारिश्रमिक राशि देना भी गलती थी?

शायद आप उस दौर की बात कर रहे हैं, जब स्टूडियो सिस्टम की शुरूआत हुई थी. 2001 में ‘गदरःएक प्रेम कथा’ के निर्माण के साथ ही स्टूडियो सिस्टम शुरू हुआ था. उस समय एक नया दौर शुरू हो रहा था. तब तमाम स्टूडियो को फिल्म व्यवसाय से जुड़ना था. तो शायद उन लोगों ने स्टार अटरैकष्ण के चक्कर में कलाकारों को खुलकर पैसे बांटे होंगे, पर इसका सही जवाब तो उस दौर के लोग ही दे सकते हैं कि वह अपने इस कृत्य को कैसे सही ठहराएंगे. देखिए, मैंने पहले भी कहा कि इस तरह की अप्रोच के साथ आप फिल्म उद्योग से जुड़ तो सकते हैं यानी कि चक्रव्यूह में घुस तो जाएंगे, मगर फिर चक्रव्यूह से निकलना आसान नही होगा. तमाम स्टूडियो के साथ वही परिणाम हुआ. आपको अपनी सीमाओं में रहकर, कहानी के अनुसार उसकी लागत को ध्यान में रखकर ही सिनेमा बनाना पड़ेगा.

आप स्टूडियो सिस्टम का हिस्सा हैं. इस वजह से आप दूसरे स्टूडियो की कार्यप्रणाली पर नजर तो रखते होंगे, जिससे आपके यहां वह गलती ना होने पाए?

मुझे लगता है कि मैं इस सवाल का जवाब आपको पहले दे चुका हूं. जब भी आप अधिक से अधिक फिल्म बनाने की सोच रखेंगे, बड़े बजट की फिल्में बनाने के लोभ का शिकार रहेंगे, तो स्वाभाविक तौर पर गलती होगी. यदि आप इस सोच के साथ बौलीवुड में उतरते हैं कि फिल्मी परदा बड़ा होता है, ऐसे में बड़े बजट की आलिशान फिल्म बनानी चाहिए. बड़े स्टारों के साथ काम करने की आपके अंदर उत्तेजना है, तो गड़बड़ी होने की संभावना बढ़ जाती हैं. मेरी राय में इस तरह की उत्तेजना या उतावलेपन से हर स्टूडियो को दूर रहना चाहिए. मेरी राय मे हर कहानी अपने साथ एक बजट लेकर आती है. हमने इन सब चीजों को बहुत ध्यान में रखकर फिल्में बनायी. हमारी कुछ फिल्मों को बौलीवुड से जुड़े लोगों ने छोटी फिल्मों का नाम दिया. पर उनके परिणाम बहुत बड़े हुए. हमारी कुछ फिल्मों ने इस फिल्म इंडस्ट्री को नई राह दिखायी. बौलीवुड के लोगों ने ‘‘मांझीः द माउंटेनमैन’, ‘क्वीन’ या ‘अंधाधुन’ को छोटी फिल्म कहकर बुलाया. इन फिल्मों के परिणाम आपके सामने हैं.

बौलीवुड में एक मुद्दा और है. हर इंसान आपको बड़े स्टार/ फिल्म की तरफ आकर्षित करता है. एक सफल स्टूडियो के लिए जरूरी होता है कि आप खुद को उस आकर्षण से कैसे बचाकर रखें. मैं बड़ी फिल्मों की खिलाफत नहीं कर रहा हूं. बड़ी फिल्में भी बननी चाहिए, मगर उनकी कहानी और उनकी गणित अलग होनी चाहिए. हमने कई बड़ी फिल्में ठुकरायी हैं. आपके अंदर एक बडे़ बजट की फिल्म को ना कहने की ताकत और यकीन का होना बहुत जरूरी है. देखिए, यदि बड़े बजट की फिल्म में कुछ बहुत बड़ी रचनात्मकता नजर नहीं आती है, तो ऐसी फिल्मों को ना कहने के लिए बहुत बड़ी दिलेरी चाहिए. हम ऐसा करते आए हैं और हमें इसके अच्छे प्रतिसाद मिले हैं. अक्सर हम उन फिल्मों की बातें नहीं कर पाते हैं, जिन्हें हमने छोड़ दी थी. पर मैं आज दावे के साथ कह सकता हूं कि हमारे स्टूडियो द्वारा छोड़ी फिल्में ही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि हैं.

आपने ‘‘बुधिया सिंह’’, मंटो, मांझी जैसी कुछ बेहतरीन छोटे बजट की फिल्में बनायीं. पर इन फिल्मों को आप विशाल दर्शक वर्ग तक पहुंचा नहीं पाए?

मैं मानता हूं कि हमारी कुछ बेहतरीन फिल्में विशाल दर्शक वर्ग तक नहीं पहुंच पायीं. क्योंकि इस तरह की फिल्मों को लेकर चुनौतियां बहुत होती हैं. इसमें दो खास मुद्दे हैं. पहला यह कि फिल्म की कहानी कितनी सशक्त है? और दूसरा फिल्म में कलाकारों का वजन कितना है? देखिए, हम चाहे जितनी बातें कर लें, पर आज भी सिनेमा स्टार कलाकार का माध्यम बना हुआ है. दर्शक सिनेमा घर में टिकट लेकर कलाकार के नाम पर पहले आता है, बाद में कहानी देखता है. कई बार कहानी में वजन होता है, पर वह अंडरवेट हो जाती है, जब उसमें अभिनय करने वाले कलाकार वजनदार ना हों. मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा. आप दौड़ में देखते हैं कि एक धावक दूर से दौड़ते हुए आता है, फिर डंडे का सहारा लेकर लंबी छलांग लगा देता है. तो जिस तरह से वह दौडे़गा, वह उस फिल्म की कहानी की गुणवत्ता है और जिस डंडे को लेकर दौड़ते हुए छलांग लगाएगा, वह है स्टार. यानी कि वह जो डंडा या कोल्ड वार लेकर कूदता है, वह है स्टार यानी कि कलाकार. यदि आपका डंडा छोटा रह गया, तो आप लंबी छलांग नहीं लगा सकते. यदि आपकी दौड़ में तेजी नही है, यानी कि कहानी कमजोर है, तो आप पीछे रह जाएंगे. आपने जिन फिल्मों का नाम लिया यह सारी फिल्में हमारे दिल के काफी करीब हैं. पर मैं मानता हूं कि फिर भी वह नतीजा नही निकला, जो निकलना चाहिए था. तो हमें समझ आया कि हम डंडे में छोटे रह गए.

लेकिन अब यह भी देखने में आ रहा है कि स्टार के नाम पर फिल्में नही चल सकतीं?

आप यह भी एकदम सही फरमा रहे हैं. सिर्फ स्टार के नाम पर तो कोई भी फिल्म नहीं चल सकती. आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूं कि हाल ही में स्टार के नाम पर बनी फिल्म थिएटर में एक दिन भी नही चली. मैं बेवजह उसका नाम नही लेना चाहता. इसीलिए हम कहते हैं कि स्टार व कहानी दोनों में सामंजस्य बहुत बेहतरीन होना चाहिए. मसलन, फिल्म ‘‘मैरी कॉम’’ को लें. इसमें हमने प्रियंका चोपड़ा को लिया था. तो एक बेहतरीन वजनदार कहानी के साथ स्टार का वजन भी बढ़ गया था. इन दोनों का कॉम्बीनेशन ऐसा बना कि फिल्म ने सफलता के कई रिकॉर्ड बना डाले. मैं यह कहना चाहूंगा कि आप अपनी फिल्म के साथ जिस कलाकार को चुन रहे हैं, उसके व कहानी के बीच संतुलन होना जरूरी है.

‘‘वायाकौम 18’’ को ‘‘जलेबी’’ और ‘‘फोर्स 2’’ जैसी फिल्में बनाने की जरूरत क्यों पड़ जाती है?

हंसते हुए…. जैसा कि आपने शुरूआत में ही कहा कि यहां हर तरह के दर्शक हैं और हमें हर तरह के दर्शकों के लिए फिल्में बनानी चाहियें. तो हम वही कर रहे हैं. यह जरूरी नही है कि हर बार दर्शक को प्रेरणा देने वाली ही कहानी पसंद आए. या संदेश देने वाली फिल्म बनाएं. स्टूडियो के तौर पर हमारे लिए जरूरी होता है कि हम सभी नौ रसों का उपयोग करते हुए दर्शकों का मनोरंजन करें. इसी के चलते ‘सन ऑफ सरदार’, ‘जलेबी’ या ‘फोर्स 2’ फिल्मों के लिए भी जगह है. ‘सन ऑफ सरदार’ और ‘फोर्स 2’ दोनों सफल रहीं. हम अलग अलग फिल्में अलग अलग फिल्मकारों के साथ बनाते आए हैं. इसलिए यह सारी फिल्में हमने बनायी. दर्शक का एक वर्ग इस तरह की फिल्मों को सपोर्ट करता है.

‘वायकौम 18’’ की अब तक की उपलब्धि क्या रही?

पिछले सात आठ वर्षों के अंतराल में हमने जो गुणवत्ता प्रधान अच्छे कंटेंट पर आधारित फिल्में बनाईं, उन पर हमें गर्व है. हमें गर्व है कि हम टिपिकल बौलीवुड हीरो वाली फिल्मों से दूरी बनाकर रखने में सफल हुए. हमने स्टार कलाकार की बजाय कहानी को प्रधानता दी. हमें ‘‘क्वीन’’, ‘‘मांझी : द माउंटेन मैन’’, ‘‘ट्वायलेट : एक प्रेम कथा’’, ‘‘पद्मावत’’, ‘‘मंटो’’, ‘‘अंधाधुन’’, ‘‘बाजार’’ जैसी मनोरंजक व अर्थपूर्ण फिल्मों के निर्माण पर गर्व है. अब हम क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ भी कदम बढ़ा चुके हैं.

क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की तरफ मुड़ने की कोई खास वजह?

हम क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ मुड़े नहीं हैं, बल्कि ‘‘वायाकौम 18 स्टूडियो’’ ने अब अपना विस्तार क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की तरफ भी करा है. हम ऐसी कहानियों व प्रतिभाओं के साथ फिल्में बना रहे हैं, जिनसे उस भाषा का स्थानीय दर्शक जुड़ सके. हम स्थानीय सिनेमा के बाजार के साथ खुद को जोड़ रहे हैं.
दूसरी बात ब्रॉडकास्ट का जो विस्तार हुआ है, उसकी वजह से भी हमने क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ रूख किया है. आप जानते हैं कि हमारा मनोरंजन प्रधान ‘कलर्स’ चैनल अब कई अलग अलग भाषाओं में आ रहा है. इससे उस क्षेत्रीय भाषा की विकसित हो रही समझ के आधार पर हम क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ बढ़ रहे हैं. मैं मानता हूं कि हर क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की पूरी समझ बहुत जरूरी है. वहां कहानी कहने के तरीके, स्टार सिस्टम, कार्यशैली और स्थानीय रूचि आदि की जानकारी होनी चाहिए.

क्षेत्रीय सिनेमा में भी हम रोचक कथानक वाली फिल्में ला रहे हैं. तमिल भाषा में ‘‘कर्थी’’ और तमिल के सुपरस्टार सूर्या के साथ फिल्में बना रहे हैं. तेलगू में ‘‘वैजयंती मूवीज’’ के अष्विनी दत्त गारू के साथ ‘‘देवदास’’कर रहे हैं.

मराठी में हम पुल देशपांडे व काशीनाथ घाणेकर की बायोपिक फिल्में लेकर आ रहे हैं. काशीनाथ घाणेकर की बायोपिक फिल्म ‘‘आणि ..मी काशीनाथ घाणेकर’’ दिवाली के अवसर पर सिनेमाघर पहुंची, जिसे अच्छी सफलता मिली है.

मराठी में ही हम व्यंगात्मक रोमांटिक हास्य फिल्म ‘‘खटला बटला’’ ला रहे हैं, जिसका निर्देशन राष्ट्रीय. इसमें ज्योति वायदांडे व अभिजीत पवार की मुख्य भूमिका है. जबकि गुजराती में हमारी फिल्म ‘‘दह’’ 28 सितंबर को प्रर्दिशत होकर सफलता दर्ज करा चुकी है.

हम तमिल में एक अनाम रोमांचक फिल्म कर्थी के संग बना रहे हैं, जिसका निर्देशन जीतू जोसेफ कर रहे हैं. तो वहीं मलयालम में बी युन्नी कृष्णान निर्देशित कॉमेडी ड्रामा फिल्म ‘‘विकीपीडिया’’ में सुपरस्टार दिलीप की मुख्य भूमिका है. जबकि बंगाली सिनेमा में ‘‘घूमकेतु’’ बना रहे हैं. कौशिक गांगुली निर्देशित यह फिल्म एक शादीशुदा इंसान की कहानी है, जो कि अपने मकसद और अपने परिवार के बीच पिस रहा है. इसी के साथ हमने अंग्रेजी फिल्मों के लिए पैरामाउंट के साथ हाथ मिलाया है. इनमें बंबल बी, जेमिनी मैन, टाप गन मावरिक फिल्मों का समावेश है.

क्या यह माना जाए कि रचनात्मकता के स्तर पर और कंटेंट के आधार पर हिंदी की बनिस्बत क्षेत्रीय सिनेमा ज्यादा समृद्ध है?

मैंने पहले ही कहा कि कई क्षेत्रीय सिनेमा में बेहतरीन कहानी मौजूद हैं. तो कुछ क्षेत्रीय सिनेमा ऐसे हैं, जो प्रशंसकों के बल पर चल रहे हैं. यह भीड़ वाला सिनेमा है. मसलन, आप तेलगू सिनेमा को लें. तेलगू सिनेमा में आज भी स्टार कलाकार को लेकर पागलपन नजर आता है. वह एक ट्रेडिशनल सिनेमा का मार्केट है. तेलगू सिनेमा की अपनी एक खूबी है. उस खूबी के अनुसार हम उस सिनेमा में प्रवेश कर रहे हैं.

आपने सिनेमा पर बहुत अच्छी पकड़ बना रखी है.

आपका यह कहना बहुत सही है. मराठी व मलयालम सिनेमा में कंटेंट बहुत अच्छा है. मलयालम व मराठी भाषा में कहानियां ही नहीं बेहतरीन तकनीशियन भी मौजूद हैं. तो उस बाजार से हम बहुत प्रेरित हैं. हम चाहते हैं कि उस बाजार से कहानी व प्रतिभा को लाकर हिंदी में भी उनका उपयोग करें. तथा जो हिंदी में अच्छी कहानी व प्रतिभा है, उसे क्षेत्रीय भाषा के दर्शकों से परिचित कराएं.

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हर क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा से जुडे़ लोगों ने हमारी सफल हिंदी फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ को अपनी भाषा में रीमेक करने की मंशा जाहिर की है.

क्या आप क्षेत्रीय भाषा की अपनी फिल्मों को बाद में हिंदी में भी लेकर आएंगे?

यह निर्णय तो कहानी के आधार पर होगा. अक्सर क्षेत्रीय भाषा की कहानी स्थानीय स्वभाव संस्कृति के अनुरूप होती है. यानी कि उस कहानी का उस क्षेत्र में ही विशेष महत्व है. मसलन, हमने एक मराठी फिल्म बनायी है – ‘‘मी काशीनाथ घाणेकर.’’ काशीनाथ घाणेकर मराठी थिएटर के सुपरस्टार रहे हैं. तो इस फिल्म का दूसरी भाषा में सफल होना मुश्किल है. पर हम एक फिल्म बना रहे हैं – ‘‘ठाकरे’’, जो कि बाला साहेब ठाकरे की बायोपिक फिल्म है. इसे हमने हिंदी व मराठी दो भाषाओं में फिलहाल बनाया है. इस फिल्म का विषय ऐसा है, जिसे किसी भी भाषा में पसंद किया जा सकता है. तो कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो दूसरी भाषाओं में यात्राएं कर सकती है, जबकि कुछ नहीं कर सकतीं.

फिल्म ‘‘ठाकरे’’ में कथानक के स्तर पर शिवसेना के लोग हावी होंगे. ऐसे में यह फिल्म एकपक्षीय नहीं हो जाएगी?

देखिए, फिल्म बन चुकी है. हमने फिल्म को पूरी ईमानदारी के साथ बनाया है. आपको जिस तरह की आशंका है, वैसा कुछ भी नहीं है. बालासाहेब ठाकरे के जीवन की कहानी बहुत खुले मन से कही गयी है. शुरूआत में आपकी तरह हमें भी आशंका थी. पर बाला साहेब ठाकरे से जुडे़ हर इंसान ने बडे़ खुले मन से ईमानदारी से ही हमें कहानी कहने की स्वतंत्रता दी. कहानी के साथ पूरा न्याय किया गया है. हम इस फिल्म को लेकर आश्वस्त भी हैं.

कन्नड़ और पंजाबी सिनेमा की तरफ ध्यान कम जाता है. इसकी कोई खास वजह है?

पंजाबी में तो हम लोग कुछ काम कर रहे हैं. पंजाबी सिनेमा का मार्केट इसलिए नहीं उभरा, क्योंकि उसके सेटेलाइट राइट्स बिकने की संभावनाएं नही हैं. मगर पंजाबी फिल्में थिएटर में बहुत अच्छा बिजनेस करती हैं. कन्नड़ में भी हम लोगों की कुछ योजनाएं हैं. मजेदार बात यह है कि कन्नड़ में हमारे चैनल बहुत सशक्त हैं. इसलिए वहां के दर्शकों तक पहुंच और मार्केट की समझ हमें है.

पिछले 4-5 वर्षों में एक नया ट्रेंड आ गया है. हौलीवुड की फिल्में भारतीय भाष में डब होकर आ रही हैं. तो उससे भारतीय सिनेमा को कितना खतरा है?

हम हर भाषा में काम कर रहे हैं. भारत विविध भाषा व संस्कृति का देश है. तो यहां पर अंग्रेजी फिल्मों के भी अपने दर्शक हैं. क्षेत्रीय सिनेमा के भी अपने दर्शक हैं. हिंदी सिनेमा के भी दर्शक हैं. अगर आप इस व्यवसाय में हैं, तो आपको हर मार्केट को ध्यान में रखकर चलना पडे़गा. हमारी रणनीति यही है. पर हम कोशिश यह करेंगे कि फिल्मों का आपस में क्लैश/ टकराव ना होने पाए. यदि कोई हौलीवुड की बड़ी फिल्म रिलीज हो रही हैं, तो हम उसके सामने अपनी कोई बड़ी फिल्म लेकर ना आएं, ऐसी कोशिश हो सकती है.

पर हौलीवुड सिनेमा जिस तरह से हावी हो रहा है,उससे मुकाबला कैसे करेंगे?

हौलीवुड फिल्में तब हावी होती हैं, जब भारतीय सिनेमा उससे क्लैश/ टकराव करता है. जैसा कि मैंने पहले ही कहा हम कोशिश करते हैं कि जब कोई बेहतर या बड़ी हौलीवुड/ अंग्रेजी फिल्म रिलीज हो रही हो, तो हिंदी की फिल्म को रिलीज ना करें. आप हौलीवुड को हलके में नहीं ले सकते हैं. क्योंकि अब भारत में भी उसका आकर्षण बढ़ चुका है. इसके अलावा हमें यह नही भूलना चाहिए कि भारतीय सिनेमा (हिंदी व क्षेत्रीय) के अपने कमिटेड दर्शक हैं. क्षेत्रीय सिनेमा के भी अपने कमिटेड दर्शक हैं. तो फिल्मों की रिलीज में भी चतुरायी से कदम उठाना पड़ेगा. ऐसा करने से हर मार्केट विकसित हो सकती है.

जब यूरोप में हौलीवुड सिनेमा हावी हो रहा था, तब वहां के लोगों की भी यही सोच थी. पर बाद में हौलीवुड सिनेमा के कारण यूरोपीय सिनेमा खत्म हो गया. क्या इस तरह का संकट भारतीय सिनेमा के साथ आपको नजर नही आ रहा है?

मेरी समझ यह कहती है कि भारतीय सिनेमा की जो परंपरा है, जो पुरानी धरोहर है, वह काफी सशक्त है. उसकी नींव इतनी मजबूत है कि हौलीवुड की वजह से हिल नहीं सकता. दूसरी बात भारतीय सिनेमा तेजी से विकसित हो रहा है. अब हालात यह हैं कि विदेशों में भी भारतीय सिनेमा लोकप्रियता बटोर रहा है. हमारे सामने दो रास्ते होते हैं – एक हम यह रूख कर लें कि हमें हौलीवुड से कैसे बचना है? दूसरा रूख होता है कि भारतीय सभ्यता संस्कृति से ओत प्रोत जो हमारा भारतीय सिनेमा है, उसे किस तरह विदेशों में अधिक से अधिक प्रदर्शित करें. अब हमने ‘पद्मावत’ को पूरे में 80 देशों में रिलीज किया. आप देखिए कि चीन में भारतीय फिल्में और खासकर हिंदी फिल्में सबसे ज्यादा प्रदर्शित हो रही हैं. बिजनेस कर रही हैं. मेरी सोच यह कहती है कि भारतीय सिनेमा को पूरे विश्व में फैलाने का नजरिया ज्यादा कारगार उपाय है.

देखिए, हौलीवुड एक खास तरह का सेगमेंट है, उनकी कथा कथन की एक अपनी शैली है. हां! उनके विजुअल्स काफी दर्शनीय व आकर्षित करने वाले होते हैं. उसमें उनकी अपनी एक ताकत है, जो कि रहेगी. जबकि हम लोगों की ताकत ड्रामा व इमोशंस में है. कला, संगीत, नृत्य आदि भारतीय सिनेमा में कई रंग हैं, जो कि भारतीय सिनेमा को एक अलग पहचान देते हैं. इसलिए हम काफी सुरक्षित हैं. पर हमें अपने सिनेमा को और अधिक विकसित करते रहना पड़ेगा.

इन दिनों वुमन इम्पावरमेंट की बहुत बातें हो रही हैं. इस दिशा में भारतीय सिनेमा में क्या हो रहा है?

देखिए, सिनेमा तो समाज का ही आइना है. और समाज में आ रहे बदलाव के ही कारण या यूं कहें कि वुमन इम्पावरमेंट का ही कारण है कि अब हम नायिका प्रधान सिनेमा बना रहे हैं. समाज में जिस तरह से महिलाओं की उपलब्धियां बढ़ी हैं, अब वह भारतीय सिनेमा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. यह सिनेमा में आना आवश्य्क है. सदियों से पितृसत्तात्मक समाज में जो असमानता रही है, वह धीरे धीरे सही हो रही है. अब एक संतुलन बन रहा है. जो कि हमारे सिनेमा में भी रिफलेक्ट हो रहा है.

मेरे हिसाब से अप्रोच यह होनी चाहिए कि समाज में जो बदलाव आ रहे हैं, उसे सिनेमा में मनोरंजक तरीके से दिखाया जाए. तो वह कारगर होगा. जैसे कि हमने फिल्म ‘ट्वॉयलेटः एक प्रेम कथा’ में शौचालय निर्माण का युनीक मुद्दा उठाया. यानी कि सिनेमा के परदे पर वुमन इम्पावरमेंट पर एक मुहीम ना बनाते हुए सिर्फ समाज के प्रतिबिंब के रूप में दिखाएं, तो अच्छा होगा. जैसा कि हमने ‘क्वीन’ या ‘मैरी कॉम’ में पेश किया. इसी तरह हम अपने बिजनेस के उत्तरदायित्व के साथ साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी बेहतर तरीके से निभा लेते हैं.

पर इस तरह का काम बहुत कम हो रहा है?

देखिए, काफी फिल्में बनी हैं. मैं दूसरे स्टूडियो की भी बात करना चाहूंगा. ‘नीरजा’ व ‘राजी’ बेहतर फिल्में बनी हैं. तो पिछले कुछ वर्षों से नायिका प्रधान फिल्मों का टे्ंड बहुत मजबूत हुआ है. पिछले 5-6 वर्षों में वुमन इम्पावरमेंट को लेकर सिनेमा ने अहम भूमिका निभायी है.

इन दिनों रील सिनेमा को सुरक्षित करने की मुहीम चल रही है. इरानी फिल्मकार माजिद मजीदी का मानना है कि डिजिटल सिनेमा की वजह से सिनेमा मर रहा है?

हम लोग भी इस मुद्दे से परिचित हैं. आप भी समझ सकते हैं कि ग्रामोफोन पर गाने सुनने वालों को एमपी 3 पर गाने सुनने में मजा नहीं आ सकता. इसी तरह रील सिनेमा का जो विजुअल चार्म है, वह डिजिटल सिनेमा में नहीं मिल सकता. रोमांटिक व रोमांचंक किस्म के लोगों को डिजिटल सिनेमा मजा नही देता. लेकिन डिजिटल सिनेमा के जो फायदे हैं, उसे भी आप नकार नहीं सकते. तो यह दोनों मीडियम हैं और मुझे लगता है कि कहानी कहने के तरीके के आधार पर दोनों मीडियम का उपयोग किया जा सकता है. हकीकत यह है कि आर्थिक पक्ष से लेकर कई पक्षों को तक डिजिटल मीडियम के इतने फायदे हैं कि आप उसे नजरंदाज नही कर सकते. पर आप भी जानते हैं और मैं भी कि कला में जब नई तकनीक का उद्भव होता है, तो कुछ अजीब सा लगता है. आज हम हाथ से लिखने की बजाए कम्प्यूटर पर टाइपिंग कर लेते हैं या औडियो रिकौर्डिग करते हैं. पर हाथ से लिखने का जो सुख है, वह कम्प्यूटर पर टाइपिंग के सुख के बराबर नहीं हो सकता. सोचने की बात यह है कि हम किस तकनीक का कितना अच्छा उपयोग कर सकते हैं.

कंपनी को चलाने और रचनात्मकता को बरकरार रखने का जो चक्रव्यूह है, उसके चलते ऐसा कोई विषय है, जिस पर आप फिल्म नहीं बना पा रहे हैं?

जी हां!! ऐसा है. हम काफी समय से कोशिश कर रहे हैं कि हम लोग ‘स्पेस/अंतरिक्ष’ पर फिल्म बनाएं. हकीकत यह है कि हिंदी फिल्में ‘स्पेस’ पर नहीं पहुंची हैं. यह एक नया आयाम है. हमने इस पर अपनी तरफ से काफी काम किया है. हम कल्पना चावला की बायोपिक बनाना चाहते हैं. उनका जीवन बहुत उम्दा रहा है. इसको लेकर हम हमारे स्टूडियो से जुड़े सभी लोग बहुत उत्साहित हैं. लेकिन आप भी जानते हैं कि फिल्म निर्माण की यात्रा में काफी चुनौतियां होती हैं. यह चुनौतियां हमारे सामने आज भी बरकरार हैं. लेकिन अभी तक हमने हार मानी नही है. लेकिन यह फिल्म कब शुरू होगी, आज की तारीख में दावे से नहीं कह सकता. पर कोशिश जारी है.

अब आप देखें, हौलीवुड में लोग स्टार वार हो या उनके दूसरे कौमिक कल्चर हों, उसका जश्न सिनेमा में मना रहे हैं. मगर हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को लेकर कुछ नही कर पाए हैं. हौलीवुड सिनेमा के पास सांस्कृतिक धरोहर नही है, इसलिए उन्होंने अपने यहां की कौमिक बुक्स का सहारा लिया है. हमारी सांस्कृतिक धरोहर हमें विरासत में मिली है. हमारे पास ‘महाभारत’ जैसा महाकाव्य है, जिसके हर चरित्र पर बेहतरीन फिल्में बन सकती हैं. मैं निजी स्तर पर इस तरह के विषयों पर काम करना चाहता हूं. मेरा मानना है कि यदि हम अपने देश की सांस्कृतिक धरोहर का पूरा उपयोग कर उसे सिनेमा में उतार सकें, तो हमारा सिनेमा पूरे विश्व में राज कर सकता है. हमारे पास ऐसा बहुत कुछ है, जो कि चीन या अमरीका के लोगों को भी पसंद आएगा.

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