लेखक व निर्देशक सीमा कपूर की फिल्म ‘‘मि.कबाड़ी’’ 25 अगस्त को प्रदर्शित होने जा रही है. जो कि उनके पूर्व पति स्व.ओम पुरी की अंतिम फिल्म है. इसलिए इस फिल्म को वह स्व.ओम पुरी को ही समर्पित भी कर रही हैं. आज ओम पुरी हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन ओम पुरी ने 2009 में फिल्म ‘‘मि.कबाड़ी’’ के सफल होने के दावे किए थे, जब ओम पुरी और सीमा कपूर के बीच पति पत्नी के रूप में अच्छे संबंध थे.

खुद सीमा कपूर बताती हैं-‘‘हमने फिल्म ‘मि.कबाड़ी’ की पटकथा 2009 में उस वक्त लिखी थी, जब हमारे अच्छे दिन थे. हम साथ में रहते थे. इस पटकथा को पढ़कर वह काफी खुश हुए थे. उन्होंने कहा, ‘सीमा तुम्हारा हीरो तो शौचालय का मालिक है. फिल्म तो कबाडी बदबू पर है, लेकिन इसमें से मुझे अच्छी खुशबू आ रही है. फिल्म सफल होगी.’’

शायद यही वजह रही कि संबंध खत्म होने के बावजूद उस वक्त ओम पुरी को अपनी फिल्म ‘‘मि.कबाड़ी’’ से जोड़ा, जब स्व.ओम पुरी निजी जिंदगी में परेशान चल रहे थे. ओम पुरी के साथ फिल्म की शूटिंग के दिनों की चर्चा करते हुए सीमा कपूर कहती हैं-‘‘जब यह फिल्म बन रही थी, उस वक्त जब भी वक्त मिलता था, ओमपुरी साहब लखनऊ पहुंच जाते थे. भले ही उनकी शूटिंग न हो. उस वक्त वह बहुत मानसिक वेदना से गुजर रहे थे. उन्हें सांत्वना और शांति मेरे ही पास मिलती थी. उस वक्त मैं उनका हौसला बढ़ाती थी. उन्हे जीवन दर्शन का पाठ पढ़ाने का प्रयास करती थी. कई बार सेट पर शूटिंग के दौरान उन्होंने कहा कि सीमा मैं यह सीन नहीं कर पाउंगा. तब मैंने उन्हें समझाया कि वह कर सकते हैं. मैं स्प्रिच्युली भी समझाती थी. जबकि भगवान में उनकी आस्था नहीं थी. पर उन्होंने अपनी सोच किसी पर नहीं थोपी. वह बहुत परेशान रहते थे. मैं सुबह छह बजे से शूटिंग को लेकर व्यस्त रहती थी, फिर भी जितना संभव हो पाता था उतना समय उन्हें देती थी. इसके अलावा उन्हे अपनी दूसरी फिल्म की शूटिंग के लिए बार बार मुंबई आना पड़ता था.’’

ईश्वर को लेकर सीमा कपूर और ओम पुरी की सोच में विरोधाभास रहा है. पर जब तक ओम पुरी व सीमा कपूर के बीच संबंध अच्छे रहे, तब तक ओम पुरी ने धर्म को लेकर उन पर अपने विचार नहीं थोपे. खुद अपने अच्छे दिनों को याद करते हुए सीमा कपूर बताती हैं-‘‘मैं तो बुद्धिजम में विश्वास करती हूं. उपनिषद भी पढ़ती हूं. मैं योग करती हूं. मेडीटेशन करती हूं. फिर भी वह मुझे हर जगह लेकर गए. मुझे बुद्ध बहुत प्रिय हैं, तो वह मुझे लेकर बौद्ध गया गए थे. जब वहां भाव में मेरे आंसू निकले, तो उस वक्त उनकी आंखें से भी आंसू निकले थे. वह भाव में तो आ जाते थे. पर समझ में नहीं पाते थे कि ईश्वर को किस रूप में या किस भाव में देखा जाए. जब तक ओम पुरी साहब के साथ मेरे संबंध अच्छे रहे, तब तक हर जगह वह मेरा साथ देते रहे.’’

Tags: