तेलगू फिल्म से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री इशिता दत्ता को बचपन से इच्छा थी कि उन्हें अभिनय का मौका मिले और ये प्रेरणा उन्हें अपनी अभिनेत्री बहन तनुश्री दत्ता से मिली, जो उन्हें हमेशा अपनी इच्छा से जुड़ी काम करने की सलाह दिया करती थीं. इतना ही नहीं आज भी किसी काम को करने से पहले इशिता अपनी बहन की राय अवश्य लेती हैं. झारखण्ड के जमशेदपुर की रहने वाली इशिता अभी अपने माता-पिता के साथ मुंबई में रहती हैं. हंसमुख और विनम्र स्वभाव की इशिता इन दिनों कौमेडी और ड्रामा फिल्म ‘फिरंगी’ को लेकर व्यस्त हैं, उनसे मिलकर बात करना रोचक था पेश है अंश.

इस फिल्म को करने की वजह क्या है?

इससे पहले मैंने हिंदी फिल्म ‘दृश्यम’ किया था, जिसमें मैंने अजय देवगन की बेटी की भूमिका निभाई थी. उस फिल्म में कास्टिंग डायरेक्टर विकी सदाना ने मेरी कास्टिंग करवाई थी. इसमें भी उन्होंने मुझे मेरी भूमिका के बारे में बताया और औडिशन के लिए तैयार होने को कहा. कई औडिशन के बाद अंत में मैं चुनी गयी. ये फिल्म साल 1920 की कहानी है, जिसमें मैंने पंजाबी लड़की की भूमिका निभाई है. ये लुक मुझसे काफी अलग है और मैं ऐसे अलग चरित्र करने में चुनौती महसूस करती हूं. इसके अलावा जब मैं टीम से मिली, तो पहली मुलाकात में इसकी कहानी मुझे रोचक लगी. साथ ही इतने दिनों तक ब्रेक के बाद मुझे एक अच्छी फिल्म करने का औफर मिल रहा था, जो बड़ी बात थी.

इससे पहले आपने टीवी में भी काम किया है, टीवी से फिल्मों में आना कैसे हुआ? दोनों में क्या अंतर महसूस करती हैं?

दरअसल मैंने पहले फिल्म फिर टीवी में काम किया है. ‘दृश्यम’ फिल्म के बाद मुझे हर कोई वैसी ही छोटी लड़की की भूमिका की औफर दे रहा था और मुझे वैसा नहीं करना था, इसलिए मैं मना करती रही. उसी दौरान मुझे टीवी धारावाहिक ‘एक घर बनाऊंगा’ का औफर मिला, मुझे वह पसंद आई और मैंने कर लिया. मुझे काम करते रहना पसंद है, बैठकर समय का दुरुपयोग नहीं करना चाहती थी और ये सही था मुझे टीवी के जरिये लोगों के घर तक पहुंचने का मौका भी मिला. आजकल फिल्म से टीवी और टीवी से फिल्मों में जाना आम बात है. बड़े-बड़े कलाकार भी टीवी पर आ रहे हैं. इसके अलावा आजकल टीवी की शूटिंग फिल्मों के जैसे ही हो रही है.

दोनों के माध्यम में कोई अंतर नहीं है. टीवी में समय की कमी की वजह से ‘शिड्यूल हेक्टिक’ होता है, जबकि फिल्म में काम आराम से होता है.

क्या अभिनय एक इत्तफाक थी, या बचपन से इच्छा रही है?

मेरे लिए अभिनय जौब नहीं, बल्कि एक इच्छा थी, जिसे बहन ने बल दिया और मैं इस क्षेत्र में चली आई. मैंने मास मीडिया में पढ़ाई पूरी करने के बाद कई जगहों पर अपनी पोर्टफोलियो भेजी और मुझे पहले तेलगू फिल्म में काम करने का मौका मिला, यहीं से मेरे अंदर प्रेरणा जगी और अब मैं इसी क्षेत्र में अच्छा काम करना चाहती हूं. मेरे कैरियर की सपोर्ट सिस्टम मेरी दीदी ही है, जिसने मुझे इस इंडस्ट्री की बारीकियों को समझाया है. दीदी कहती है कि जब भी कोई काम करने की इच्छा हो, तो उसे कर लेना चाहिए, ताकि बाद में अफसोस न हो. अगर वह गलत निकला तो उसे छोड़ आगे बढ़ जाना चाहिए.

यहां तक पहुंचने में परिवार का सहयोग कितना रहा?

उन्होंने बहुत सहयोग दिया है, जमशेदपुर से वे मुंबई रहने चले आये, ताकि हमें सुविधा हो. मैंने हमेशा काम के साथ परिवार का बैलेंस रखा है. समय मिलते ही उनके साथ समय बिताना पसंद करती हूं. काम मेरे ऊपर इतना हावी नहीं होता है कि मैं परिवार और दोस्तों को भूल जाऊं. इसलिए मुझे कभी तनाव नहीं होता.

कितना संघर्ष यहां तक पहुंचने में रहा?

मैंने अधिक संघर्ष नहीं किया. ये सही है कि कोई बड़ा काम नहीं मिला, लेकिन समय-समय पर मुझे जो काम मिला, उसमें मैं धीरे-धीरे ग्रो कर रही हूं और अपने काम से संतुष्ट हूं.

फिल्मों में इंटिमेट सीन्स करने में आप कितनी सहज होती हैं?

अभी तक तो कोई फिल्म ऐसी नहीं की है, लेकिन स्क्रिप्ट की जरूरत अगर है तो करना पड़ेगा, पर मैं सहज नहीं हूं. ग्लैमर के लिए इंटिमेट सीन्स नहीं कर सकती.

आगे किस तरह की फिल्में करने की इच्छा रखती हैं?

मैंने अभी तो शुरुआत की है. एक एक्शन फिल्म करने की इच्छा है. निर्देशक इम्तियाज अली के निर्देशन में फिल्म करना चाहती हूं.

कितनी फूडी और फैशनेबल हैं?

मैं बंगाली हूं और हर तरह का खाना पसंद करती हूं. मिठाई खूब पसंद है. समय मिले तो खाना भी बना लेती हूं. चिकन बिरयानी और आइसक्रीम मैं बना लेती हूं.

कम्फर्ट लेबल को ध्यान में रखकर ड्रेस पहनती हूं. इंडियन और वेस्टर्न हर तरह के पोशाक पहनती हूं. मुझे ब्राइट कलर के परिधान पसंद हैं, जिसमें पीला रंग मेरा पसंदीदा है.

मेकअप कितना पसंद करती हैं?

पहले मुझे मेकअप का शौक था, अब नहीं है, क्योंकि हमेशा लगाना पड़ता है. मौइस्चराइजर हमेशा लगाती हूं. रात को सोने से पहले अच्छी तरह से मेकअप उतरना नहीं भूलती.

खाली समय में क्या करना पसंद करती हैं?

मुझे पेट्स से बहुत लगाव है. मेरे पास एक डौग है, जिसका नाम मैंने ‘हैप्पी’ रख दिया है. उसके साथ मैं खेलती हूं. जब भी मैं काम से घर लौटती हूं, तो वह मेरा सत्कार खुशी से करता है, जिससे मेरी पूरी थकान दूर हो जाती है. इसके अलावा खाली समय में दोस्त और परिवार के साथ समय बिताती हूं.