स्वांतः सुखाय कविताएं लिखने वाली अदाकारा कीर्ति कुल्हारी ने अभिनय जगत में काफी लंबी यात्रा तय की है. थिएटर व टीवी से होते हुए वह फिल्मों में अपनी पकड़ बना चुकी हैं. हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘‘इंदू सरकार’’ में वह शीर्ष भूमिका निभा चुकी हैं. कीर्ति कुल्हारी पर कोई भी किरदार ज्यादा समय तक थोपा नही रहता. क्योंकि वह खुद को ‘स्विच आन और स्विच आफ’ कलाकार मानती हैं.

खुद कीर्ति कुल्हारी कहती हैं-‘‘मैं किरदार में घुसने और उससे अलग होने को अंतर को समझ चुकी हूं. कब कीर्ति किरदार बन जाती है और कब किरदार से कीर्ति बन जाती है, यह चरित्र चित्रण का एक खूबसूरत प्रोसेस है. ऐसा हमेशा होता है कि हम कुछ चीजें किरदार से रिलेट कर पाते हैं और कुछ चीजें नहीं कर पाते हैं. पर हमारे अंदर हर किरदार की संभावनाएं होती हैं. उन संभावनाओं को तलाशना ही मेरा काम है. शूटिंग के दौरान मेरे अंदर एक अलग एनर्जी होती है. मेरी खुशकिस्मती यह रही है कि मेरी हर फिल्म एक ही शिड्यूल में खत्म होती हैं. वैसे भी मैं स्विच आन और स्विच आफ वाली कलाकार हूं. हर दिन पैकअप के बाद मैं कीर्ति बन जाती हूं.’’

 इसी तरह फिल्मों की सफलता या असफलता से भी खुद को अलग कर आगे बढ़ना उन्हे आता है. वह बताती हैं-‘‘ईमानदारी से कहूं तो मैंने अपनी जिंदगी में बहुत जल्दी यह सीख लिया है कि चीजों से खुद को कैसे अलग किया जाए. अब मैं ‘कर्म करो, फल की इच्छा मत करो’ के सिद्धांत पर चलने लगी हूं. जब मैं काम करती हूं, तो पूरी तरह से उससे जुड़ी होती हूं. पर जब रिजल्ट का समय आता है, तो हमें उसका अहसास होने लगता है. एक कलाकार के तौर पर फिल्म निर्माण के दौरान हमें अहसास होने लगता है कि चीज किस तरह की बन रही है. उसके बाद जब हम पहली बार फिल्म देखते हैं, तो उसको लेकर हमारे मन में बहुत कुछ साफ हो जाता है. फिल्म पूरी होने के बाद जब हम फिल्म का प्रमोशन करना शुरू करते है. तो धीरे धीरे हमें फिल्म के भविष्य का अहसास भी होने लगता है. हमें अंदाजा हो जाता है कि प्रोडक्ट में दम है या नहीं. फिल्म के असफल होने पर तकलीफ तो होती है, पर उसके बाद हमें आगे बढ़ना ही होता है.

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